प्रयागराज महाकुंभ में चर्चित हुई मोनालिसा की शादी पर बड़ा खुलासा, जांच में नाबालिग निकली, पति फरमान खान पर केस दर्ज 

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के महेश्वर की रहने वाली मोनालिसा भोसले की शादी को लेकर बड़ा मोड़ सामने आया है। प्रयागराज महाकुंभ में रुद्राक्ष बेचते हुए चर्चा में आई मोनालिसा को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की जांच में नाबालिग पाया गया है। इस खुलासे के बाद मामले ने नया कानूनी रूप ले लिया है और शादी करने वाले युवक फरमान खान के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया है। जानकारी के अनुसार, पारधी जनजाति से ताल्लुक रखने वाली मोनालिसा भोसले ने 11 मार्च को केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित अरुमनूर नैनार मंदिर में उत्तर प्रदेश के रहने वाले फरमान खान से विवाह किया था। यह शादी उस समय चर्चा में आई थी क्योंकि मोनालिसा के परिवार ने इस रिश्ते का विरोध किया था। 

परिवार के लोगों का कहना था कि यह शादी उनकी जानकारी और सहमति के बिना हुई है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों ने इस मामले को लव जिहाद से भी जोड़कर देखा, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया। मोनालिसा के पिता ने इस पूरे मामले को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी नाबालिग है और उसे बहला-फुसलाकर शादी कराई गई है। शिकायत मिलने के बाद आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की। जांच के दौरान मोनालिसा की उम्र से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की गई और अस्पताल रिकॉर्ड समेत अन्य प्रमाण जुटाए गए।

जांच में सामने आया कि मध्य प्रदेश के अस्पताल रिकॉर्ड के अनुसार मोनालिसा की जन्म तिथि 30 दिसंबर 2009 दर्ज है। इस आधार पर जब शादी हुई, उस समय उसकी उम्र करीब 16 वर्ष थी। यानी वह कानूनी रूप से नाबालिग थी। यह तथ्य सामने आने के बाद पूरे मामले ने कानूनी मोड़ ले लिया। आयोग के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फरमान खान के खिलाफ मामला दर्ज किया। आयोग के अध्यक्ष अंतर सिंह आर्या की पहल पर संबंधित अधिकारियों को जांच के निर्देश दिए गए थे। दस्तावेजों की पुष्टि होने के बाद पुलिस को कार्रवाई के लिए कहा गया। इसके बाद संबंधित थाने में फरमान खान के खिलाफ POCSO एक्ट सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया। साथ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी प्रकरण दर्ज किया गया है, क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित है।

परिवार के विरोध से लेकर कानूनी कार्रवाई तक मामला पहुंचा

मोनालिसा भोसले उस समय सुर्खियों में आई थीं जब प्रयागराज महाकुंभ के दौरान वह रुद्राक्ष बेचते हुए सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थीं। उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से फैलने के बाद उनकी पहचान बनी। इसी दौरान फरमान खान से उनकी मुलाकात हुई और बाद में दोनों ने शादी कर ली। बताया जाता है कि शादी के बाद दोनों केरल चले गए थे, जहां मंदिर में विवाह संपन्न कराया गया। परिवार को जब इस शादी की जानकारी मिली तो उन्होंने इसका विरोध किया। मोनालिसा के पिता का आरोप था कि उनकी बेटी को बहकाकर शादी कराई गई है और उसकी उम्र भी 18 वर्ष से कम है। इसके बाद उन्होंने आयोग में शिकायत की। मामले के संवेदनशील होने के कारण आयोग ने तुरंत संज्ञान लिया और उम्र से जुड़े रिकॉर्ड की जांच शुरू कराई। 

जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने कानून के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी। POCSO एक्ट के तहत नाबालिग से विवाह या संबंध बनाने के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एससी-एसटी एक्ट की धाराएं जुड़ने से मामला और गंभीर हो गया है। पुलिस अब फरमान खान की भूमिका, शादी की परिस्थितियों और नाबालिग होने के बावजूद विवाह कराने वालों की भी जांच कर रही है।

अधिकारियों के मुताबिक, यह भी देखा जा रहा है कि शादी के समय लड़की की उम्र से संबंधित दस्तावेज किस आधार पर प्रस्तुत किए गए थे। यदि गलत जानकारी देकर शादी कराई गई है तो इसमें शामिल अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि शादी स्वेच्छा से हुई या किसी तरह का दबाव या प्रलोभन दिया गया था। मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र में भी चर्चा तेज हो गई है। परिवार ने बेटी को वापस लाने और कानूनी कार्रवाई की मांग की है। वहीं पुलिस ने कहा है कि सभी तथ्यों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अब यह मामला पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है और आने वाले दिनों में जांच के बाद और खुलासे हो सकते हैं।

चिल्ड्रेन एजुकेशन अलाउंस पर सरकार की नई स्पष्टता : स्कूल फीस से हॉस्टल तक मिलेगा फायदा, नई शिक्षा नीति और सस्पेंशन मामलों में भी नियम साफ

केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्च को लेकर चिल्ड्रेन एजुकेशन अलाउंस (CEA) पर नई स्पष्टता जारी की है। ताजा FAQs में सरकार ने विस्तार से बताया है कि किन परिस्थितियों में कर्मचारियों को रीइम्बर्समेंट मिलेगा और किन मामलों में दावा स्वीकार नहीं होगा। इस स्पष्टीकरण के बाद स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और हॉस्टल जैसे खर्चों को कवर करने वाले इस भत्ते को लेकर लंबे समय से चल रही उलझन काफी हद तक दूर होने की उम्मीद है। खासतौर पर नई शिक्षा नीति (NEP-2020), सस्पेंशन अवधि और कोर्ट के आदेश से बहाली जैसे संवेदनशील मामलों में भी नियमों को साफ कर दिया गया है। चिल्ड्रेन एजुकेशन अलाउंस केंद्र सरकार के कर्मचारियों को दिया जाने वाला एक आर्थिक लाभ है, जिसका उद्देश्य बच्चों की स्कूली शिक्षा का खर्च कम करना है। 

यह सुविधा परिवार के अधिकतम दो सबसे बड़े बच्चों के लिए लागू होती है। हालांकि, यदि दूसरे बच्चे के जन्म के समय जुड़वां या एक साथ एक से अधिक बच्चे पैदा होते हैं, तो ऐसी स्थिति में सभी बच्चों को इस भत्ते का लाभ मिल सकता है। यह व्यवस्था कर्मचारियों को बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्चों को संभालने में राहत देती है और शिक्षा पर होने वाले वित्तीय बोझ को कम करती है। CEA के तहत कर्मचारी साल में एक बार क्लेम कर सकते हैं। फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के बाद संबंधित स्कूल या संस्थान के प्रमुख से प्रमाण पत्र लेना होता है, जिसमें यह उल्लेख होता है कि बच्चा पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान संस्थान में पढ़ रहा था। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर रीइम्बर्समेंट प्रोसेस किया जाता है। इस व्यवस्था से कर्मचारियों को हर महीने अलग-अलग बिल जमा करने की जरूरत नहीं पड़ती और पूरी प्रक्रिया सरल बन जाती है। राशि की बात करें तो वर्तमान नियमों के अनुसार प्रत्येक बच्चे के लिए 2,812.5 रुपये प्रति माह की दर से CEA का लाभ दिया जाता है। वहीं, यदि बच्चा हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा है, तो 8,437.5 रुपये प्रति माह तक हॉस्टल सब्सिडी भी मिलती है। यह राशि तय है और वास्तविक खर्च पर निर्भर नहीं करती। यानी खर्च कम हो या ज्यादा, कर्मचारियों को निर्धारित रकम के आधार पर ही भुगतान किया जाता है। 

गणना मासिक आधार पर होती है, लेकिन भुगतान साल में एक बार किया जाता है। इससे कर्मचारियों को वित्तीय योजना बनाने में भी आसानी होती है और दस्तावेजी प्रक्रिया भी सीमित रहती है। इस भत्ते के लिए बच्चों की पात्रता भी स्पष्ट की गई है। सामान्य तौर पर बच्चे की उम्र 21 साल से कम होनी चाहिए। नर्सरी से लेकर 12वीं कक्षा तक पढ़ने वाले बच्चे इसके लिए पात्र हैं। इसके अलावा सर्टिफिकेट या डिप्लोमा कोर्स के शुरुआती दो वर्षों के लिए भी यह लाभ उपलब्ध है। दिव्यांग बच्चों के मामले में अधिकतम आयु सीमा 22 वर्ष तक रखी गई है। साथ ही, बच्चे का किसी मान्यता प्राप्त स्कूल, बोर्ड या संस्थान में पढ़ना जरूरी है। इसमें केंद्रीय या राज्य बोर्ड, जूनियर कॉलेज, डिप्लोमा संस्थान और अन्य अधिकृत शिक्षण संस्थान शामिल हैं। दूरस्थ शिक्षा या कॉरेस्पॉन्डेंस के माध्यम से पढ़ाई करने वाले बच्चों को भी इस भत्ते का लाभ मिल सकता है, बशर्ते संस्थान मान्यता प्राप्त हो।

NEP-2020, सस्पेंशन और कोर्ट से बहाली मामलों पर नया स्पष्टीकरण

सरकार ने अपनी नई FAQs में यह भी स्पष्ट किया है कि नई शिक्षा नीति (NEP-2020) लागू होने के कारण यदि किसी बच्चे को अतिरिक्त कक्षा दोहरानी पड़ती है, तो उसे एक बार की छूट दी जाएगी। यानी यदि नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी जैसे प्री-प्राइमरी चरणों में संरचना बदलने के कारण बच्चा अतिरिक्त साल पढ़ता है, तो उस वर्ष के लिए भी CEA और हॉस्टल सब्सिडी का क्लेम स्वीकार किया जा सकता है। यह छूट केवल एक बार के लिए होगी और अन्य सभी शर्तों का पालन जरूरी रहेगा। कोर्ट के आदेश से नौकरी में बहाली के मामलों को लेकर भी सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। यदि किसी कर्मचारी को सेवा से हटाया गया हो और बाद में अदालत के आदेश से बहाल किया जाए, तो उस अवधि के दौरान CEA मिलेगा या नहीं, यह संबंधित सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा। यह देखा जाएगा कि हटाए जाने और बहाली के बीच की अवधि को सेवा में माना गया है या नहीं। इसी आधार पर भुगतान का निर्णय लिया जाएगा। 

सस्पेंशन के दौरान मिलने वाले भत्ते को लेकर भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारी निलंबन में है, तब भी कुछ परिस्थितियों में CEA दिया जा सकता है। संबंधित नियमों के अनुसार यह भत्ता उस स्थिति में भी लागू हो सकता है जब कर्मचारी ड्यूटी पर हो, सस्पेंड हो या किसी प्रकार की छुट्टी पर हो, जिसमें असाधारण अवकाश भी शामिल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और कर्मचारी की पारिवारिक जिम्मेदारियां बनी रहें। नई गाइडलाइन के साथ सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि CEA को लेकर प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की जा रही है। स्पष्ट नियमों से कर्मचारियों को क्लेम करने में आसानी होगी और विभागों में भी व्याख्या से जुड़ी दिक्कतें कम होंगी। इससे लाखों केंद्रीय कर्मचारियों को बच्चों की शिक्षा से जुड़े खर्चों के लिए राहत मिलने की उम्मीद है और शिक्षा पर होने वाला आर्थिक दबाव कम होगा। 

कैश विवाद में घिरे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने छोड़ी कुर्सी, इस्तीफे से उठे बड़े सवाल

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उनके इस्तीफे ने न्यायिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। बताया जा रहा है कि जस्टिस वर्मा हाल ही में अपने सरकारी आवास पर कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने के विवाद में घिर गए थे। इस मामले के सामने आने के बाद से ही उनके पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे थे। अब इस्तीफा देने के बाद यह मामला और भी चर्चाओं में आ गया है। जस्टिस वर्मा ने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। शपथ लेने के लगभग एक साल के भीतर ही उनका नाम विवादों में आ गया। आरोप है कि उनके आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। हालांकि इस नकदी को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन खबर सामने आने के बाद न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई। इस्तीफा भेजते समय जस्टिस वर्मा ने अपने पत्र में इस पद पर सेवा करने को सम्मान की बात बताया। 

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें न्यायपालिका का हिस्सा बनने का अवसर मिला, यह उनके लिए गर्व की बात है। हालांकि उन्होंने इस्तीफा देने के पीछे की वजह का खुलासा नहीं किया। यही कारण है कि उनके इस्तीफे को लेकर अटकलें और तेज हो गई हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायाधीशों से उच्च स्तर की नैतिकता और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में यदि किसी जज का नाम किसी वित्तीय या अन्य विवाद में आता है, तो उससे न्यायपालिका की साख प्रभावित होती है। इसी वजह से कई बार न्यायाधीश जांच पूरी होने से पहले ही इस्तीफा देना उचित समझते हैं, ताकि संस्था की गरिमा बनी रहे। बताया जा रहा है कि नकदी मिलने के कथित मामले के बाद उच्च स्तर पर भी चर्चा हुई थी। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि मामले की प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया शुरू की गई थी। 

हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया। जस्टिस वर्मा का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब इस पूरे मामले पर स्पष्टता की मांग लगातार बढ़ रही थी। उनके इस्तीफे के बाद अब आगे की प्रक्रिया राष्ट्रपति और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के स्तर पर पूरी की जाएगी। आमतौर पर हाई कोर्ट के न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजा जाता है और स्वीकृति के बाद वह प्रभावी हो जाता है। इसके बाद संबंधित पद रिक्त माना जाता है और नए न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है।

जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिली थी 

जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा विवाद तब चर्चा में आया, जब उनके सरकारी आवास पर कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने की खबर सामने आई। इस खबर ने न्यायिक और राजनीतिक दोनों हलकों में हलचल पैदा कर दी। हालांकि नकदी की मात्रा, उसके स्रोत और बरामदगी की परिस्थितियों को लेकर आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन मामले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इस घटनाक्रम के बाद न्यायपालिका की छवि को लेकर चिंता जताई जाने लगी। कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि जनता का विश्वास बना रहे। वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। बताया जाता है कि इस बीच जस्टिस वर्मा पर दबाव भी बढ़ रहा था। 

मीडिया में लगातार खबरें आने लगीं और उनके इस्तीफे की संभावना जताई जाने लगी। अंततः उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया। उनके इस्तीफे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस मामले की आगे जांच जारी रहेगी और नकदी विवाद की सच्चाई सामने आएगी। जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे में पद पर सेवा करने को सम्मान बताया, लेकिन विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की। इससे अटकलों का दौर जारी है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस्तीफा देना नैतिक जिम्मेदारी का संकेत हो सकता है, जबकि अन्य का मानना है कि पूरी सच्चाई सामने आना अभी बाकी है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। यदि जांच आगे बढ़ती है तो नकदी मिलने के आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट हो सकती है। वहीं न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी यह मामला एक अहम उदाहरण बन सकता है।

क्या WhatsApp सुरक्षित नहीं? एलन मस्क और टेलीग्राम सीईओ पावेल डुरोव ने प्राइवेसी पर उठाए सवाल, Meta ने कहा- सब गलत

दुनिया के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मैसेजिंग ऐप WhatsApp की प्राइवेसी को लेकर एक नया विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के मालिक Elon Musk एलन मस्क और Telegram टेलीग्राम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Pavel Durov पावेल डुरोव ने व्हाट्सएप पर भरोसा न करने की सलाह दी है। दोनों का दावा है कि ऐप की प्राइवेसी उतनी सुरक्षित नहीं है, जितना कंपनी बताती है। यह विवाद अमेरिका में व्हाट्सएप के खिलाफ दायर एक क्लास-एक्शन मुकदमे के बाद और बढ़ गया। यह मुकदमा जनवरी में दो यूजर्स ब्रायन वाई. शीराजी और निदा सैमसन ने कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में दायर किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि व्हाट्सएप यूजर्स के मैसेज को बीच में ही इंटरसेप्ट करता है और उन्हें तीसरी कंपनियों के साथ साझा किया जाता है। इस मामले में Meta Platforms और Accenture को भी पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से ज्यूरी ट्रायल और हर्जाने की मांग की है। उनका कहना है कि कंपनी “एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन” का दावा करती है, लेकिन असल में मैसेज पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। 

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए एलॉन मस्क ने X पर पोस्ट कर लोगों से व्हाट्सएप की जगह X चैट का इस्तेमाल करने की अपील की। उन्होंने कहा कि X चैट में “असली प्राइवेसी” मिलती है। मस्क का कहना था कि यूजर्स को अपने निजी संदेशों की सुरक्षा के लिए ज्यादा सावधान रहना चाहिए। दूसरी तरफ पावेल डुरोव ने भी व्हाट्सएप पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि ऐप अरबों यूजर्स को गुमराह कर रहा है। उनके मुताबिक व्हाट्सएप का एन्क्रिप्शन मॉडल पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। डुरोव ने यह भी कहा कि टेलीग्राम ने कभी ऐसा दावा नहीं किया जिसे वह पूरा न कर सके।

हालांकि, इन आरोपों पर Meta ने तुरंत जवाब दिया। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि मुकदमे में लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत और बेतुके हैं। Meta का कहना है कि व्हाट्सएप पिछले कई सालों से सिग्नल प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करता है, जो दुनिया के सबसे सुरक्षित एन्क्रिप्शन सिस्टम में से एक माना जाता है। कंपनी के मुताबिक यूजर के मैसेज सिर्फ भेजने वाले और पाने वाले तक ही सीमित रहते हैं। कंपनी खुद भी इन संदेशों को नहीं पढ़ सकती। Meta ने यह भी कहा कि यूजर्स की प्राइवेसी उनकी प्राथमिकता है और इस तरह के दावे भ्रामक हैं।

एलन मस्क और जुकरबर्ग की पुरानी टक्कर, अब फिर बढ़ा विवाद

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब एलन मस्क और Meta के CEO Mark Zuckerberg आमने-सामने आए हों। दोनों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा चल रही है। मस्क द्वारा ट्विटर खरीदने के बाद जब उसे X में बदला गया, तब Meta ने जवाब में Threads लॉन्च किया था। इसके बाद भी दोनों के बीच कई बार बयानबाजी हुई। मस्क ने अपने AI चैटबॉट Grok को Meta AI से बेहतर बताया था। वहीं 2023 में मस्क ने जुकरबर्ग को “केज फाइट” की चुनौती भी दी थी, जिसने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। अब व्हाट्सएप की प्राइवेसी को लेकर नया विवाद सामने आने से दोनों कंपनियों के बीच टकराव फिर चर्चा में है। खास बात यह है कि भारत जैसे देशों में व्हाट्सएप सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ऐप है। करोड़ों लोग रोजाना निजी बातचीत, फोटो, वीडियो और दस्तावेज इसी के जरिए भेजते हैं। इसलिए प्राइवेसी से जुड़ी ऐसी खबरें यूजर्स को चिंतित कर सकती हैं।

लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ आरोप लगने से किसी ऐप को असुरक्षित नहीं माना जा सकता। कोर्ट में मामला चलने के बाद ही सच्चाई सामने आएगी। फिलहाल Meta अपने दावों पर कायम है और कह रहा है कि व्हाट्सएप सुरक्षित है।

आखिर क्या होता है एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन?

सरल शब्दों में समझें तो एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन एक ऐसी तकनीक है, जिसमें आपका मैसेज भेजते समय एक गुप्त कोड में बदल जाता है। यह कोड सिर्फ भेजने वाले और पाने वाले के फोन पर ही खुलता है। बीच में कोई भी चाहे इंटरनेट कंपनी हो, हैकर हो या ऐप देने वाली कंपनी उसे नहीं पढ़ सकती। यही वजह है कि व्हाट्सएप लंबे समय से दावा करता रहा है कि उसके मैसेज पूरी तरह सुरक्षित हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत में चल रहे इस मुकदमे में क्या निकलकर सामने आता है। फिलहाल यूजर्स के लिए जरूरी है कि वे किसी भी प्लेटफॉर्म पर संवेदनशील जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतें और ऐप की सिक्योरिटी सेटिंग्स को अपडेट रखें।

बिहार में सत्ता परिवर्तन की आहट तेज, नीतीश के राज्यसभा की शपथ के बाद नए सीएम पर आज मंथन, 15 अप्रैल को नई सरकार की संभावना

बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव होने के संकेत मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज 12:15 बजे राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। इसके साथ ही राज्य में सत्ता परिवर्तन को लेकर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में नए मुख्यमंत्री के चयन को लेकर दिल्ली में कोर ग्रुप की अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक में आगामी नेतृत्व को लेकर विस्तृत चर्चा की जाएगी। बैठक दोपहर 12 बजे के बाद होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें बीजेपी के वरिष्ठ नेता और बिहार से जुड़े प्रमुख चेहरे शामिल होंगे। जानकारी के मुताबिक, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा गुरुवार को ही दिल्ली पहुंच चुके हैं। इसके अलावा श्रेयसी सिंह को भी बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया गया है।

कोर ग्रुप की इस बैठक में बिहार प्रभारी विनोद तावड़े, प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी, केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय, संजय जायसवाल समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहेंगे। मंत्री दिलीप जायसवाल और मंगल पांडेय के भी बैठक में शामिल होने की संभावना है। संगठन स्तर पर भीखू भाई दलसानिया और नागेंद्र जैसे पदाधिकारी भी इसमें भाग ले सकते हैं। इधर, बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने साफ किया है कि नीतीश कुमार पहले राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेंगे। इसके बाद एनडीए नेतृत्व यह तय करेगा कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। 

उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में चल रही है और गठबंधन मिलकर अंतिम फैसला करेगा। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि शपथ के बाद नीतीश कुमार से डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने मुलाकात की है। इस मुलाकात को भी सत्ता परिवर्तन की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। एनडीए के भीतर लगातार बैठकों का दौर जारी है और सभी दल अपने-अपने स्तर पर रणनीति तैयार कर रहे हैं।

बिहार में 15 अप्रैल को नई सरकार बनने के संकेत

14 अप्रैल को खरमास समाप्त होने के बाद नई सरकार गठन का रास्ता साफ हो सकता है। इसी बीच 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र प्रस्तावित है, जिसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल पेश किया जाना है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व चाहता है कि 15 अप्रैल तक बिहार में नई सरकार का गठन हो जाए, ताकि सभी बड़े नेता संसद सत्र में शामिल हो सकें। बताया जा रहा है कि 10 अप्रैल को राज्यसभा की शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार 11 अप्रैल को बिहार लौट सकते हैं। इसके बाद 12 और 13 अप्रैल के बीच एनडीए के सभी घटक दल अपने-अपने विधायक दल की बैठक कर नेता का चयन करेंगे। 14 अप्रैल को एनडीए विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिए नेता के नाम का ऐलान होने की संभावना है। 

इसके बाद नीतीश कुमार राज्यपाल को इस्तीफा सौंप सकते हैं और 15 अप्रैल को नई सरकार के गठन की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और संभावित नामों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। उधर, बिहार सरकार में मंत्री रामकृपाल यादव ने भी संकेत दिए हैं कि राज्य में जल्द नई सरकार बनेगी। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार आज राज्यसभा सदस्य की शपथ लेंगे और उसके बाद बिहार में नई सरकार का गठन होगा। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस कुछ भी करे, उससे एनडीए को कोई फर्क नहीं पड़ता। गठबंधन पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है और जल्द ही नया नेतृत्व सामने आएगा।

दिल्ली से हरिद्वार-ऋषिकेश तक तेज रफ्तार कनेक्टिविटी की तैयारी, नमो भारत कॉरिडोर विस्तार का प्रस्ताव 

उत्तराखंड और दिल्ली के बीच यात्रा करने वाले लाखों लोगों के लिए जल्द ही बड़ी राहत का रास्ता खुल सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्र सरकार के सामने एक अहम प्रस्ताव रखते हुए नमो भारत (आरआरटीएस) कॉरिडोर को मेरठ के मोदिपुरम से आगे बढ़ाकर हरिद्वार और ऋषिकेश तक विस्तार देने की मांग की है। इस प्रस्ताव के साथ देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश के बीच अलग मेट्रो कॉरिडोर विकसित करने पर भी जोर दिया गया है। अगर यह योजना मंजूर होती है तो दिल्ली से उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन शहरों तक यात्रा समय में भारी कमी आएगी और क्षेत्रीय विकास को नई रफ्तार मिल सकती है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात कर इस परियोजना को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली से हरिद्वार और ऋषिकेश तक तेज रफ्तार रेल संपर्क बनने से चारधाम यात्रियों, पर्यटकों, छात्रों और रोजाना यात्रा करने वालों को बड़ा लाभ होगा। साथ ही इससे सड़क यातायात पर दबाव भी कम होगा और सुरक्षित, तेज और पर्यावरण अनुकूल परिवहन विकल्प उपलब्ध होगा।

फिलहाल नमो भारत ट्रेन दिल्ली के सराय काले खां से मेरठ के मोदिपुरम तक संचालित हो रही है। प्रस्तावित योजना के तहत इस कॉरिडोर को मोदिपुरम से आगे बढ़ाकर हरिद्वार और ऋषिकेश तक ले जाने की बात कही गई है। यह विस्तार मुख्य रूप से नेशनल हाईवे-58 के समानांतर विकसित किया जा सकता है, जिससे निर्माण में सुविधा मिले और प्रमुख शहरों को सीधे जोड़ा जा सके।

प्रस्तावित रूट में कई महत्वपूर्ण शहर और कस्बे शामिल होंगे। इनमें मोदिपुरम, दौराला-सकौती, खतौली, पुरकाजी (उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड सीमा), रुड़की, ज्वालापुर (हरिद्वार) और ऋषिकेश शामिल हैं। इस कॉरिडोर से आईआईटी रुड़की जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थान भी सीधे जुड़ जाएंगे। इससे छात्रों और कर्मचारियों के लिए आवागमन आसान हो जाएगा।

परियोजना के लागू होने पर दिल्ली से ऋषिकेश की दूरी बेहद कम समय में तय की जा सकेगी। अनुमान है कि यह सफर ढाई से तीन घंटे के भीतर पूरा हो सकता है। वर्तमान में सड़क मार्ग से यह यात्रा ट्रैफिक और मौसम के कारण अक्सर लंबी हो जाती है। तेज रफ्तार कॉरिडोर बनने से समय की बचत के साथ-साथ यात्रा अधिक आरामदायक होगी। इस परियोजना का असर केवल परिवहन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हरिद्वार और ऋषिकेश में होटल, हॉलिडे होम और सर्विस अपार्टमेंट की मांग बढ़ने की संभावना है। वहीं मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।

पर्यावरणीय मंजूरी और लागत बड़ी चुनौती

हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। रुड़की से ऋषिकेश के बीच का हिस्सा राजाजी नेशनल पार्क और अन्य पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऐसे में निर्माण कार्य के लिए वन और पर्यावरण से जुड़ी सख्त मंजूरियां लेनी होंगी। यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है और परियोजना की लागत भी बढ़ा सकती है। इसके अलावा जमीन अधिग्रहण भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है। कई शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों से गुजरने के कारण भूमि की उपलब्धता और पुनर्वास की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। पहाड़ी इलाकों में ट्रैक बिछाने और स्टेशन विकसित करने की लागत भी सामान्य मैदान क्षेत्रों की तुलना में अधिक होगी। इस परियोजना को बेहद अहम मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक परिवहन योजना नहीं, बल्कि दिल्ली-मेरठ-हरिद्वार-ऋषिकेश बेल्ट के लिए एक आर्थिक कॉरिडोर साबित हो सकती है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और धार्मिक स्थलों तक पहुंच आसान होगी।

देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश मेट्रो कॉरिडोर का प्रस्ताव भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत कर सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर यातायात की समस्या कम होगी और तीनों शहरों के बीच यात्रा सुगम बनेगी। विशेष रूप से तीर्थ सीजन और पर्यटन सीजन में यह सुविधा बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। अब इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकारों और एनसीआरटीसी द्वारा आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। यदि परियोजना को मंजूरी मिलती है तो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी और चरणबद्ध तरीके से निर्माण कार्य शुरू हो सकता है। उत्तराखंड और दिल्ली के बीच तेज रफ्तार रेल संपर्क बनने से न केवल यात्रा आसान होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिल सकती है।

सीजफायर के बाद फिर भड़का मिडिल ईस्ट, लेबनान पर इजरायली हमले, ईरान की जवाबी कार्रवाई से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर बढ़ा दबाव

अमेरिका और ईरान के बीच घोषित युद्धविराम की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि मिडिल ईस्ट में हालात फिर से विस्फोटक हो गए। सीजफायर लागू होने के कुछ ही घंटों बाद इजरायल ने लेबनान पर बड़ा हमला कर दिया, जिसके जवाब में ईरान ने मिसाइल दागते हुए क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया। इस घटनाक्रम ने युद्धविराम की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने आगे की रणनीति तय करना बड़ी चुनौती बन गया है। जानकारी के मुताबिक, बुधवार को इजरायल ने लेबनान के कई ठिकानों को निशाना बनाते हुए करीब 100 मिसाइलों से हमला किया। हमले में 254 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल बताए जा रहे हैं। यह हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर लागू हुआ ही था और क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन अचानक हुए इस हमले ने स्थिति को फिर से अस्थिर कर दिया। हमले के जवाब में ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। 

ईरान की ओर से इजरायल और खाड़ी देशों की दिशा में मिसाइलें दागी गईं। साथ ही तेहरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी फिर से शुरू करने का ऐलान किया। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है और तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। ईरान का कहना है कि किसी भी युद्धविराम या समझौते में लेबनान की स्थिति को शामिल करना जरूरी है। तेहरान का आरोप है कि लेबनान में जारी हमलों को नजरअंदाज कर शांति कायम नहीं की जा सकती। दूसरी ओर अमेरिका और इजरायल इसे अलग संघर्ष बताते हुए सीजफायर से सीधे तौर पर जोड़ने से बच रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा कि बेरूत और लेबनान में हुई झड़पें अलग घटनाएं हैं और उनका सीजफायर से सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि लेबनान का मुद्दा बाद में सुलझाया जाएगा और फिलहाल मुख्य ध्यान ईरान से जुड़े समझौते पर रहेगा। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ संकेत दिया है कि उनका लक्ष्य ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को कमजोर करना और लेबनान में हिज्बुल्लाह को पूरी तरह खत्म करना है। इस बीच क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। खाड़ी देशों ने भी सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिए हैं और कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के रूट बदले जा रहे हैं। समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। अगर यह टकराव जारी रहा तो युद्धविराम टिकना मुश्किल हो सकता है और संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने तीन रास्ते, कूटनीति या टकराव?

बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अब तीन बड़े विकल्प माने जा रहे हैं। पहला विकल्प है कि अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाए और युद्धविराम को समाप्त मानकर दबाव बनाए। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। दूसरा विकल्प कूटनीति को आगे बढ़ाने का है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को पाकिस्तान भेजने की योजना पर विचार किया जा रहा है, जहां ईरान से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की शुरुआत हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, ईरान वेंस को बातचीत के लिए अपेक्षाकृत भरोसेमंद मानता है। इस पहल के जरिए अमेरिका तनाव कम करने की कोशिश कर सकता है। तीसरा विकल्प इजरायल पर दबाव बनाकर लेबनान पर हमले रोकने का है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सबसे कठिन रास्ता है, क्योंकि इजरायल अपने सुरक्षा हितों को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। नेतन्याहू सरकार ने पहले ही संकेत दिया है कि वह हिज्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी। ऐसे में अमेरिका के लिए इजरायल को रोकना आसान नहीं होगा। 

अगर अमेरिका कूटनीतिक रास्ता चुनता है तो उसे एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। एक तरफ संभावित बातचीत के जरिए ईरान को शांत करना होगा, तो दूसरी तरफ इजरायल से हमले रोकने की अपील करनी होगी। ईरान की भी कई शर्तें बताई जा रही हैं, जिनमें अमेरिकी सैनिकों की वापसी, प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था शामिल है। इन मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा। इस पूरे घटनाक्रम का असर तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। सीजफायर की घोषणा के बाद तेल कीमतों में थोड़ी नरमी आई थी और ब्रेंट क्रूड तथा डब्ल्यूटीआई 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहे। लेकिन नई सैन्य गतिविधियों के बाद कीमतों में फिर उछाल की आशंका बढ़ गई है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ता है या आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा बन सकती है। पहले ही महंगाई और आपूर्ति संकट से जूझ रही दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। ऐसे में अब सबकी नजर अमेरिका की अगली रणनीति पर टिकी है। यदि कूटनीति सफल नहीं होती, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ सकता है।

‘धुरंधर’ विवाद पहुंचा बॉम्बे हाईकोर्ट : संतोष कुमार पर आरोप दोहराने से रोक, डायरेक्टर आदित्य धर को मिली अंतरिम राहत

फिल्म धुरंधर और उसके सीक्वल को लेकर उठे स्क्रिप्ट चोरी के विवाद ने अब कानूनी रूप ले लिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को फिल्ममेकर संतोष कुमार के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करते हुए उन्हें फिल्म धुरंधर और धुरंधर: द रिवेंज की स्क्रिप्ट चोरी के आरोपों को दोहराने से अस्थायी रूप से रोक दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि वह फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के खिलाफ कोई भी मानहानिकारक बयान न दें। न्यायमूर्ति आरिफ एस. डॉक्टर की एकल पीठ ने यह आदेश आदित्य धर द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संतोष कुमार को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन उनकी ओर से कोई भी प्रतिनिधि अदालत में पेश नहीं हुआ। ऐसे में रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों और याचिका में दी गई दलीलों के आधार पर अदालत ने सीमित अंतरिम राहत देना उचित समझा। 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक संतोष कुमार सार्वजनिक मंचों, प्रेस कॉन्फ्रेंस या सोशल मीडिया के माध्यम से फिल्म की कहानी को अपनी स्क्रिप्ट से चोरी बताने वाले आरोपों को दोहराने से परहेज करें। अदालत ने यह भी माना कि इस तरह की टिप्पणियां आदित्य धर की पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। आदेश के अनुसार यह रोक फिलहाल 16 अप्रैल तक लागू रहेगी, जब मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल संतोष कुमार पर लागू होगा और अगली सुनवाई में उनके पक्ष को सुनने के बाद आगे का फैसला लिया जाएगा।दरअसल, हाल ही में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संतोष कुमार ने दावा किया था कि फिल्म धुरंधर और उसके सीक्वल की कहानी उनकी साल 2023 में रजिस्टर्ड स्क्रिप्ट ‘डी साहेब’ से ली गई है। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी कहानी का इस्तेमाल बिना अनुमति के किया गया और उन्हें कोई श्रेय नहीं दिया गया। इन आरोपों के बाद विवाद तेज हो गया और मामला सार्वजनिक बहस का विषय बन गया। कुमार के बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कई बिंदुओं पर समानता का दावा किया। इससे फिल्म के निर्देशक आदित्य धर और उनकी टीम की छवि पर असर पड़ने की आशंका जताई गई। इसके बाद मामले ने कानूनी मोड़ ले लिया।

नोटिस का जवाब नहीं मिला, कोर्ट पहुंचे आदित्य धर

आरोप सामने आने के बाद आदित्य धर ने संतोष कुमार को लीगल नोटिस भेजा था। नोटिस में स्क्रिप्ट चोरी के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा गया कि फिल्म की कहानी स्वतंत्र रूप से विकसित की गई है। साथ ही कुमार को चेतावनी दी गई कि वे सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की टिप्पणी करने से बचें, क्योंकि इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि, नोटिस का कोई जवाब नहीं मिलने पर आदित्य धर ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया और बयानबाजी पर रोक लगाने के साथ-साथ हर्जाने की मांग की। उनकी ओर से पेश वकील ने अदालत में दलील दी कि संतोष कुमार के बयान निराधार और मानहानिकारक हैं, जो निर्देशक की पेशेवर छवि को प्रभावित कर रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान अदालत ने भी इस बात पर गौर किया कि कथित मानहानिकारक टिप्पणियां व्यापक रूप से साझा की गईं। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामला अंतरिम राहत देने योग्य है, ताकि अगली सुनवाई तक किसी भी पक्ष को अपूरणीय क्षति न हो। इसी आधार पर अदालत ने संतोष कुमार को आरोपों को दोहराने से रोकने का आदेश जारी किया। अब इस मामले में अगली सुनवाई 16 अप्रैल को होगी, जहां अदालत संतोष कुमार का पक्ष भी सुनेगी। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि अंतरिम आदेश को आगे बढ़ाया जाए या मामले में कोई अन्य निर्देश जारी किए जाएं। फिलहाल अदालत के इस आदेश से आदित्य धर को अस्थायी राहत मिली है और धुरंधर को लेकर जारी विवाद कानूनी प्रक्रिया के दायरे में आ गया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा गायब, असम पुलिस दिल्ली में सक्रिय, हिमंता सरमा परिवार पर आरोपों से बढ़ा सियासी घमासान

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ बयान देना भारी पड़ गया है। असम पुलिस पवन खेड़ा को लगातार दो दिनों से तलाश कर रही है। बुधवार को दिल्ली के पॉश निजामुद्दीन ईस्ट की शांत सड़कों पर अचानक सियासी हलचल तेज हो गई थी, जब डी-12 नंबर के बाहर पुलिस की मौजूदगी और नेताओं की आवाजाही ने माहौल को गर्मा दिया। यह वही पता है, जहां कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा रहते हैं। एक दिन पहले तक यहां राजनीतिक ड्रामा अपने चरम पर था, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। घर के बाहर सन्नाटा है, दरवाजे बंद हैं और सबसे बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है आखिर पवन खेड़ा कहां हैं? असम पुलिस उन्हें तलाश रही है, लेकिन 24 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनका कोई पता नहीं चल पाया है।

असम पुलिस कथित तौर पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनके परिवार के खिलाफ लगाए गए आरोपों के संबंध में पूछताछ करने के लिए दिल्ली पहुंची थी। पुलिस का कहना है कि खेड़ा से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछे जाने थे, लेकिन जब टीम उनके आवास पर पहुंची तो वे वहां मौजूद नहीं मिले। अधिकारियों के अनुसार, परिसर की तलाशी के दौरान कुछ आपत्तिजनक सामग्री भी मिलने का दावा किया गया है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह उम्मीद जताई जा रही थी कि पवन खेड़ा उसी शाम मीडिया के सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे और आरोपों का जवाब देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रेस कॉन्फ्रेंस टल गई और समय बीतता गया। अब 24 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन खेड़ा का कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया। इससे राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं।

उधर, पुलिस की कार्रवाई ने कांग्रेस के भीतर एकजुटता को बढ़ावा दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से लेकर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक, सभी खेड़ा के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। दिल्ली स्थित असम भवन के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यह कार्रवाई राजनीतिक दबाव बनाने के लिए की जा रही है। पार्टी का कहना है कि असम सरकार पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए कर रही है और असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। 

पवन खेड़ा अपनी पत्नी कोटा नीलिमा के साथ हैदराबाद में हो सकते हैं। इसे कांग्रेस शासित राज्य में एक अस्थायी शरणस्थल के तौर पर देखा जा रहा है। इस बीच, खेड़ा ने गिरफ्तारी से सुरक्षा के लिए तेलंगाना उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है। उन्होंने आपराधिक याचिका दायर कर असम पुलिस की संभावित कार्रवाई से राहत की मांग की है। बताया जा रहा है कि इस याचिका पर एक-दो दिन के भीतर न्यायमूर्ति के. सुजाना की पीठ के समक्ष सुनवाई हो सकती है। पुलिस का कहना है कि 58 वर्षीय पवन खेड़ा के खिलाफ मामला उस बयान के आधार पर दर्ज किया गया है, जिसमें उन्होंने असम के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास एक से अधिक पासपोर्ट होने का आरोप लगाया था। शिकायत में कहा गया है कि यह टिप्पणी मानहानि करने वाली है और इससे प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इसी आधार पर पुलिस पूछताछ करना चाहती है।

असम के मख्यमंत्री हिमंता सरमा के परिवार पर आरोपों से बढ़ा विवाद

पवन खेड़ा लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। उन्होंने 1998 से 2013 तक दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विशेष अधिकारी और राजनीतिक सचिव के रूप में काम किया। इस दौरान वे प्रशासनिक और राजनीतिक रणनीति दोनों में अहम भूमिका निभाते रहे। बाद में वे कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और जून 2022 में उन्हें पार्टी के मीडिया और प्रचार विभाग की कमान सौंपी गई। तीखे बयानों और आक्रामक राजनीतिक शैली के कारण वे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। 2022 में भी वे उस समय चर्चा में आए थे, जब राज्यसभा के लिए नामांकन न मिलने पर उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था “तपस्या में कमी रह गई।” 

इस बयान पर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। हालिया विवाद तब शुरू हुआ, जब खेड़ा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनके परिवार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री की पत्नी रिंकी भुयान सरमा के पास संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और एंटीगुआ व बारबुडा से जुड़े कई पासपोर्ट हैं। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि परिवार की अमेरिका के व्योमिंग में एक लिमिटेड लायबिलिटी कंपनी है, जिसकी कथित कीमत लगभग 53,000 करोड़ रुपये बताई गई। खेड़ा ने यह भी कहा कि दुबई में दो संपत्तियों से जुड़े कथित खुलासे चुनावी दस्तावेजों में नहीं किए गए। इन आरोपों के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया और असम पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया। भाजपा की ओर से इन आरोपों को बेबुनियाद बताया गया है, जबकि कांग्रेस लगातार इन दावों की जांच की मांग कर रही है। 

अब पूरा मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर पहुंच चुका है। एक तरफ असम पुलिस पवन खेड़ा की तलाश में जुटी है, तो दूसरी ओर कांग्रेस इसे राजनीतिक टकराव का मुद्दा बना रही है। सभी की नजरें अब तेलंगाना उच्च न्यायालय की सुनवाई और खेड़ा की अगली सार्वजनिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। जब तक वे सामने नहीं आते, तब तक यह सियासी रहस्य और गहराता ही जाएगा।

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में मोबाइल पर नियंत्रण, पढ़ाई पर फोकस बढ़ाने को शिक्षा विभाग का बड़ा फैसला, आदेश जारी

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में अब मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर सख्ती बढ़ा दी गई है। बच्चों में तेजी से बढ़ रही मोबाइल की लत और इसके शारीरिक व मानसिक दुष्प्रभावों को देखते हुए राज्य शिक्षा विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। नए निर्देशों के अनुसार, स्कूल परिसर में छात्र और शिक्षक मनमर्जी से मोबाइल का उपयोग नहीं कर सकेंगे। विभाग का मानना है कि मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, साथ ही उनकी एकाग्रता, व्यवहार और सामाजिक गतिविधियों पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि छात्र स्कूल समय में मोबाइल फोन साथ नहीं लाएंगे। यदि किसी विशेष परिस्थिति में मोबाइल लाना जरूरी हो, तो उसे स्कूल प्रशासन के पास जमा कराना होगा और छुट्टी के समय वापस दिया जाएगा। कक्षा के दौरान मोबाइल का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। 

इसके साथ ही शिक्षकों को भी केवल शैक्षणिक कार्यों के लिए ही मोबाइल इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। निजी कॉल, सोशल मीडिया या अन्य गैर-जरूरी उपयोग पर रोक रहेगी। शिक्षा विभाग ने सभी स्कूल प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया है कि वे इन नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर छात्रों को मोबाइल के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाएगा। साथ ही अभिभावकों से भी अपील की गई है कि वे बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफोन देने से बचें और पढ़ाई के दौरान मोबाइल उपयोग पर नजर रखें।

विभाग का कहना है कि मोबाइल की वजह से बच्चों में आंखों से जुड़ी समस्याएं, नींद में कमी, चिड़चिड़ापन और ध्यान भटकने जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। कई मामलों में सोशल मीडिया के कारण अनुशासनहीनता और पढ़ाई से दूरी भी देखी गई है। ऐसे में स्कूलों में बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी माना जा रहा है।

स्कूलों में डिजिटल अनुशासन बढ़ाने पर जोर

शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय मोबाइल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं, बल्कि उसके नियंत्रित और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लिया गया है। जरूरत पड़ने पर स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन सामग्री या डिजिटल लर्निंग के लिए शिक्षकों को मोबाइल या अन्य उपकरणों का उपयोग करने की अनुमति रहेगी। हालांकि, इसका इस्तेमाल केवल पढ़ाई तक सीमित रहेगा। अधिकारियों का मानना है कि इस पहल से बच्चों की पढ़ाई में सुधार होगा, अनुशासन मजबूत होगा और स्कूलों का शैक्षणिक वातावरण बेहतर बनेगा।

इसके साथ ही विभाग ने स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे छात्रों को डिजिटल उपकरणों के सही उपयोग के बारे में जागरूक करें। प्रार्थना सभा, विशेष कक्षाओं और कार्यशालाओं के माध्यम से बच्चों को बताया जाएगा कि मोबाइल का सीमित उपयोग किस तरह उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। शिक्षकों को भी यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि वे कक्षा के दौरान अनावश्यक मोबाइल उपयोग से बचें और छात्रों के सामने सकारात्मक उदाहरण पेश करें। अभिभावकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। विभाग ने कहा है कि घर पर बच्चों के स्क्रीन टाइम पर निगरानी रखी जाए और उन्हें पढ़ाई के दौरान मोबाइल से दूर रहने की आदत डाली जाए। माना जा रहा है कि स्कूल और अभिभावकों के संयुक्त प्रयास से बच्चों में डिजिटल अनुशासन विकसित होगा और उनका पढ़ाई, खेलकूद तथा रचनात्मक गतिविधियों की ओर अधिक ध्यान लगेगा