अशोक कुमार लाहिड़ी बने नीति आयोग के उपाध्यक्ष, केंद्र सरकार ने की नियुक्ति, ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य पर जोर

भारत सरकार ने नीति निर्माण के शीर्ष संस्थान नीति आयोग में अहम बदलाव करते हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री और भाजपा विधायक अशोक कुमार लाहिड़ी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। इस नियुक्ति के साथ आयोग की नई टीम भी सक्रिय हो गई है, जिसमें राजीव गौबा, प्रोफेसर केवी राजू, प्रोफेसर गोबर्धन दास, डॉ. एम. श्रीनिवास और प्रोफेसर अभय करंदीकर जैसे विशेषज्ञ पूर्णकालिक सदस्य के रूप में शामिल हैं। नियुक्ति के तुरंत बाद लाहिड़ी ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं और भरोसा जताया कि उनके अनुभव से देश की नीति निर्माण प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि अर्थशास्त्र और लोक नीति में लाहिड़ी की गहरी समझ भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार द्वारा शुक्रवार को की गई इस नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नीति आयोग देश की आर्थिक और सामाजिक नीतियों के निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री स्वयं इसके अध्यक्ष होते हैं, ऐसे में उपाध्यक्ष का पद नीति दिशा तय करने में अत्यंत प्रभावशाली होता है। 

अशोक कुमार लाहिड़ी ने प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल एक दृष्टि नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत कार्यों के माध्यम से हासिल किया जाने वाला उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि इसके लिए दीर्घकालिक और प्रभावी नीतियों की आवश्यकता होगी, जिनमें आर्थिक विकास के साथ सामाजिक समावेशन को भी प्राथमिकता दी जाएगी। लाहिड़ी ने अपनी सफलता का श्रेय पश्चिम बंगाल की मजबूत शैक्षणिक परंपरा को दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की पुरानी शिक्षा नीतियों और अकादमिक माहौल ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने में मदद की। उन्होंने इसे पश्चिम बंगाल के लिए गर्व का क्षण बताया, हालांकि राज्य की वर्तमान स्थिति पर चिंता भी जताई। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल अब तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों से पीछे रह गया है, जिसे सुधारने के लिए ठोस प्रयासों की जरूरत है।

अनुभव और नई टीम से नीति आयोग को मिलेगी गति

अशोक कुमार लाहिड़ी का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है और उन्हें देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में गिना जाता है। वे भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और 15वें वित्त आयोग के सदस्य के रूप में भी अपनी भूमिका निभा चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक संस्थानों में भी काम किया है, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य की गहरी समझ मिली है। शैक्षणिक रूप से भी उनका आधार मजबूत रहा है। वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं, जो देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाते हैं। 

यही अनुभव अब नीति आयोग के कार्यों में नई ऊर्जा और दृष्टिकोण लाने में सहायक माना जा रहा है। वहीं, आयोग के नए सदस्य गोबर्धन दास ने इस नियुक्ति को अपने जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि एक साधारण किसान परिवार से आने के बावजूद उन्हें यह अवसर मिला है, जो देश के आम नागरिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने भरोसा जताया कि वे ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों और आम लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए पूरी ईमानदारी से काम करेंगे। नई टीम के साथ नीति आयोग से अपेक्षा की जा रही है कि वह देश के विकास को नई दिशा देगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत ‘विकसित भारत 2047’ के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभवी नेतृत्व और विविध पृष्ठभूमि वाले सदस्यों के कारण आयोग की कार्यक्षमता और प्रभावशीलता में वृद्धि होगी। अशोक कुमार लाहिड़ी की नियुक्ति को न केवल एक प्रशासनिक बदलाव बल्कि भारत की विकास रणनीति को तेज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी अगुवाई में नीति आयोग किस तरह देश की आर्थिक और सामाजिक नीतियों को नई गति देता है।

आप के सांसदों के पाला बदलने पर केजरीवाल ने बताया ‘पंजाब के साथ धोखा’, मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा

आम आदमी पार्टी में सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह कदम पंजाब और पंजाबियों के साथ बड़ा धोखा है।केजरीवाल ने अपने संदेश में आरोप लगाया कि यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया गया है और इसका उद्देश्य पंजाब की राजनीति को प्रभावित करना है। उन्होंने साफ कहा कि जनता ऐसे कदम उठाने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। पार्टी की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि पंजाब के जनादेश के साथ विश्वासघात है। उन्होंने कहा कि जनता इसका जवाब समय आने पर जरूर देगी। 

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का समय मांगा है। मुख्यमंत्री मान सभी विधायकों के साथ दिल्ली जाकर राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात में पार्टी बदलने वाले सांसदों के खिलाफ ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग उठाई जाएगी। मुख्यमंत्री मान इस मुद्दे पर विस्तार से अपना पक्ष रखेंगे और संवैधानिक कार्रवाई की मांग करेंगे। दूसरी ओर, पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी उपराष्ट्रपति से मिलने की तैयारी में हैं। वह उन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग करेंगे, जिन्होंने पार्टी छोड़ी है। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं का दावा है कि सभी सात सांसदों ने अभी आधिकारिक रूप से पक्ष नहीं बदला है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और संजय सिंह ने कहा कि फिलहाल केवल तीन सांसद ही भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि बाकी चार अब भी आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी इसे विश्वासघात बता रही है, वहीं दूसरी ओर आगे की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के संकेत भी साफ नजर आ रहे हैं।

अंदरूनी नाराजगी, अनदेखी और टकराव ने बढ़ाई दूरी

आम आदमी पार्टी में हाल ही में हुए बड़े सियासी घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर असंतोष लंबे समय से पनप रहा था। अचानक सात राज्यसभा सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना कोई एक दिन का फैसला नहीं, बल्कि कई महीनों से चल रही नाराजगी, अनदेखी और नेतृत्व से टकराव का नतीजा है। पार्टी के भीतर संवाद की कमी, जिम्मेदारियों में बदलाव और व्यक्तिगत मतभेद धीरे-धीरे इतने गहरे हो गए कि आखिरकार यह बगावत के रूप में सामने आया। आप की तेजी से बढ़ती राजनीति के बीच संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया था। कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि उनकी भूमिका सीमित कर दी गई है और निर्णय प्रक्रिया में उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। यही कारण है कि अलग-अलग कारणों से नाराज चल रहे नेताओं ने एक साथ बड़ा कदम उठा लिया। राघव चड्ढा- राघव चड्ढा की नाराजगी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ रिश्तों में आई खटास से जुड़ी बताई जा रही है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी चुप्पी और विदेश में रहने को लेकर पहले ही सवाल उठे थे। 

इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटा दिया और उन्हें बोलने का समय भी कम मिलने लगा। पार्टी के भीतर उनके खिलाफ माहौल बनने से वे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे, जिसने उनके फैसले को प्रभावित किया। संदीप पाठक- डॉ. संदीप पाठक लंबे समय तक पार्टी की रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाते रहे। पंजाब, गोवा और गुजरात में संगठन को मजबूत करने में उनका बड़ा योगदान रहा। लेकिन हाल के समय में उन्हें प्रमुख बैठकों और फैसलों से दूर रखा जाने लगा। पंजाब की जिम्मेदारी उनसे लेकर दूसरे नेता को सौंपना भी उनकी नाराजगी की बड़ी वजह बना। स्वाति मालीवाल- स्वाति मालीवाल का विवाद सीधे शीर्ष नेतृत्व से जुड़ा रहा। उन्होंने वैभव कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। इसके बाद से उनका पार्टी से मोहभंग बढ़ता गया और वे सार्वजनिक रूप से भी विरोध जताने लगीं। अशोक मित्तल- अशोक मित्तल को राज्यसभा में अहम जिम्मेदारी मिलने के बावजूद, जब उनके ठिकानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई हुई तो पार्टी का समर्थन न मिलना उनके लिए बड़ा झटका साबित हुआ। 

इस दौरान खुद को अकेला महसूस करने की वजह से उन्होंने दूरी बना ली। हरभजन सिंह- हरभजन सिंह को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बाद भी पार्टी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं मिली। उन्हें निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया, जिससे वे लगातार अलग-थलग महसूस करते रहे। राजिंदर गुप्ता- राजिंदर गुप्ता, जो उद्योग जगत से जुड़े बड़े नाम हैं, पार्टी में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सके। राज्यसभा सदस्य बनने के बावजूद उन्हें संगठनात्मक स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारी नहीं दी गई, जिससे उनकी दूरी बढ़ती गई। विक्रमजीत सिंह साहनी- विक्रमजीत सिंह साहनी भी लंबे समय से पार्टी में सक्रिय थे, लेकिन उन्हें भी पार्टी फोरम में अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यही कारण रहा कि उन्होंने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया। कुल मिलाकर, इन सभी नेताओं के अलग-अलग कारण जरूर रहे, लेकिन एक बात समान रही, पार्टी के भीतर संवाद की कमी और नेतृत्व से बढ़ती दूरी। यही कारण है कि यह सामूहिक इस्तीफा आप के लिए अब तक का सबसे बड़ा सियासी झटका बन गया है।

दिव्यांग यात्रियों के लिए बड़ी राहत : यूडीआईडी कार्ड पर अब मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों के विशेष डिब्बों में सफर आसान

देश की रेल यात्रा अब पहले से कहीं अधिक समावेशी और संवेदनशील होती जा रही है। वर्षों से यह मांग उठती रही है कि दिव्यांग यात्रियों को सफर के दौरान बेहतर सुविधाएं और सम्मानजनक व्यवस्था मिले। इसी दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए भारतीय रेलवे ने नया नियम लागू किया है, जो लाखों दिव्यांग यात्रियों के लिए राहत लेकर आया है। अब वे यात्री जिनके पास वैध यूडीआईडी (विशिष्ट दिव्यांग पहचान) कार्ड है, वे मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में बनाए गए विशेष डिब्बों में यात्रा कर सकेंगे। यह बदलाव केवल नियमों में सुधार नहीं, बल्कि एक सोच में बदलाव का प्रतीक है जहां सुविधा के साथ गरिमा को भी प्राथमिकता दी गई है। 

दिव्यांग यात्रियों के लिए ट्रेन में चढ़ना, सीट ढूंढना या सामान रखना कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। अक्सर उन्हें भीड़भाड़ वाले डिब्बों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह नया नियम न केवल उनकी परेशानी कम करेगा, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित और आरामदायक यात्रा का भरोसा भी देगा।

रेलवे द्वारा स्पष्ट किया गया है कि इस सुविधा का लाभ उन्हीं यात्रियों को मिलेगा जिनके पास वैध यूडीआईडी कार्ड है या जो रेलवे की रियायत नीति के तहत किराए में छूट पाने के पात्र हैं। इससे पहले कई बार दस्तावेजों को लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती थी, लेकिन अब यूडीआईडी कार्ड को मान्यता मिलने से प्रक्रिया अधिक सरल हो गई है। इस फैसले का एक बड़ा उद्देश्य यह भी है कि दिव्यांग यात्रियों को बार-बार अपनी पात्रता साबित न करनी पड़े। एक ही पहचान पत्र के आधार पर उन्हें सभी आवश्यक सुविधाएं मिल सकें, यही इस पहल का मूल लक्ष्य है। 

रेलवे के अनुसार, इन विशेष डिब्बों को इस तरह तैयार किया गया है कि यात्रियों को चढ़ने-उतरने में आसानी हो। बैठने की व्यवस्था, अंदर की जगह और सामान रखने की व्यवस्था को भी ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, ताकि सफर के दौरान किसी प्रकार की असुविधा न हो। यह नियम विशेष रूप से मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के अनारक्षित दिव्यांग डिब्बों पर लागू होगा। इन डिब्बों को बैठने और सामान रखने की संयुक्त व्यवस्था वाले विशेष डिब्बे के रूप में तैयार किया गया है। इनमें न केवल बैठने की पर्याप्त व्यवस्था होती है, बल्कि व्हीलचेयर जैसे सहायक उपकरणों के लिए भी पर्याप्त स्थान सुनिश्चित किया जाता है। इस कदम से उन यात्रियों को भी राहत मिलेगी जो लंबे समय से बेहतर यात्रा अनुभव की उम्मीद कर रहे थे। अब उन्हें सामान्य भीड़भाड़ वाले डिब्बों में संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, बल्कि उनके लिए एक निर्धारित और सुरक्षित स्थान उपलब्ध रहेगा। रेलवे ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस सुविधा का दुरुपयोग करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति बिना पात्रता के इन विशेष डिब्बों में यात्रा करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ रेलवे अधिनियम 1989 के तहत जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

यूडीआईडी कार्ड से आसान हुई प्रक्रिया, दिव्यांग यात्रियों को मिलेगा सम्मानजनक सफर

यूडीआईडी कार्ड, जिसे विशिष्ट दिव्यांग पहचान पत्र कहा जाता है, केंद्र सरकार द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण पहचान पत्र है। यह कार्ड दिव्यांग व्यक्तियों को विभिन्न सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए बनाया गया है। अब रेलवे द्वारा इसे मान्यता मिलने के बाद यात्रा से जुड़ी प्रक्रियाएं भी काफी सरल हो गई हैं। पहले जहां अलग-अलग दस्तावेजों की आवश्यकता होती थी, वहीं अब एक यूडीआईडी कार्ड ही पर्याप्त होगा। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि यात्रियों को अनावश्यक परेशानी से भी राहत मिलेगी। यूडीआईडी कार्ड बनवाने की प्रक्रिया भी अब पूरी तरह डिजिटल माध्यम से की जा सकती है। इच्छुक व्यक्ति केंद्र सरकार के सेवा पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के बाद संबंधित दस्तावेजों की जांच होती है और पात्र पाए जाने पर कार्ड जारी किया जाता है। इसके अलावा, पुराने कार्ड का नवीनीकरण भी आसानी से किया जा सकता है, जिससे प्रक्रिया और अधिक सरल हो गई है। रेलवे का मानना है कि इस पहल से न केवल यात्रा सुविधाजनक बनेगी, बल्कि दिव्यांग व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनने में भी मदद मिलेगी। 

सार्वजनिक परिवहन में उनकी भागीदारी बढ़ेगी और वे बिना किसी झिझक के यात्रा कर सकेंगे। यह कदम सामाजिक समावेशन की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है। जब किसी समाज में सभी वर्गों को समान अवसर और सुविधाएं मिलती हैं, तभी वह वास्तव में विकसित माना जाता है। रेलवे द्वारा किए गए इस बदलाव से यह संदेश भी जाता है कि सरकार और संस्थाएं अब केवल बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि हर नागरिक के सम्मान और सुविधा को प्राथमिकता दे रही हैं।

आने वाले समय में उम्मीद की जा रही है कि रेलवे और भी ऐसे कदम उठाएगा, जिससे दिव्यांग यात्रियों के लिए यात्रा पूरी तरह बाधारहित बन सके। प्लेटफॉर्म पर रैंप, लिफ्ट, स्पर्श संकेतक और अन्य आधुनिक सुविधाओं को भी धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है। यूडीआईडी कार्ड के आधार पर विशेष डिब्बों में यात्रा की अनुमति एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य बदलाव है। इससे न केवल हजारों दिव्यांग यात्रियों को रोजाना फायदा होगा, बल्कि यह पहल उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित होगी।