‘बोलो राधे राधे’ दिखाएगी भारत की अनोखी कहानी

भारतीय संस्कृति, ग्रामीण जीवन और मानवीय मूल्यों को कहानी के केंद्र में रखकर बन रही फिल्म ‘बोलो राधे राधे’ अपनी विषयवस्तु को लेकर खास आकर्षण पैदा कर रही है। लेखक-निर्देशक रवि भाटिया की यह फिल्म एक भारतीय किसान परिवार के संघर्ष, रिश्तों और भावनाओं के जरिए गौ आधारित जीवनशैली, प्राकृतिक खेती, ग्रामीण रोजगार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को सामने लाने का प्रयास करती है।

फिल्म के पहले चरण की शूटिंग मथुरा-वृंदावन में पूरी हो चुकी है। नवरात्रि से गोंडा, भदोही, बस्ती और अयोध्या के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में अगला शेड्यूल शुरू होने की तैयारी है। श्रवण कुमार और नयन तारा प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे, जबकि अनुभवी कलाकार गोविंद नामदेव और बिजेंद्र काला के महत्वपूर्ण भूमिकाओं में होने की संभावना है। फिल्म में एक रशियन अभिनेत्री कृष्ण की दासी की भूमिका में दिखाई देंगी।

कुल 11 गीतों से सजी यह फिल्म अगले वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रिलीज करने की तैयारी में है। इसे हिंदी सहित 9 भारतीय भाषाओं में भारत और विदेशों में प्रदर्शित करने की योजना है। फिल्म के जरिए मनोरंजन के साथ भारतीय संस्कृति और ग्रामीण आत्मनिर्भरता से जुड़े विषयों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

डिजिटल टेक्नोलॉजी से बदलेगी माइनिंग सेक्टर की तस्वीर

भारत के माइनिंग और मेटल्स सेक्टर में टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई ), ऑटोमेशन और विश्वसनीय डेटा बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं। फिकी के ‘डिजिटलीसैशन, एआई , आटोमेशन एंड टेक्नोलॉजी इंटेग्रेशन इन माइनिंग एंड मेटल्स ’ सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीक के इस्तेमाल से खनन को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।

राज्यसभा सांसद डॉ. सस्मित पात्रा ने कहा, “टेक्नोलॉजी, एआई और डिजिटलाइजेशन बेहतर निगरानी, पारदर्शी निर्णय और जिम्मेदार संसाधन प्रबंधन को सक्षम बनाकर माइनिंग सेक्टर को बदल सकते हैं।” उन्होंने डेटा को उद्योग और समाज के बीच भरोसे का सेतु बताया। रक्षा उत्पादन मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव दिनेश महुर ने कहा, “क्रिटिकल मिनरल्स और एडवांस्ड मैटेरियल्स इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, एयरोस्पेस और डिफेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।”

फिकी नॉन-फेरस मेटल्स कमेटी के मेंटर एस.के. रूंगटा ने प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, ड्रोन, ऑटोनॉमस उपकरण और एआई आधारित समाधानों को भविष्य की प्रतिस्पर्धा से जोड़ा।

वहीं डॉ. पंकज सतीजा ने स्पष्ट किया, “उद्देश्य सिर्फ ज्यादा टेक्नोलॉजी अपनाना नहीं, बल्कि तकनीक के जरिए वास्तविक समस्याओं का समाधान और मापनीय परिणाम हासिल करना होना चाहिए।” सम्मेलन में उद्योग, सरकार, स्टार्टअप और तकनीकी विशेषज्ञों ने मिलकर डिजिटल माइनिंग के भविष्य पर चर्चा की।

दिल्ली में वोटर लिस्ट सुधारने का आखिरी मौका ! 25 अक्टूबर को सभी मतदान केंद्रों पर लगेंगे विशेष शिविर

दिल्ली में मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने, गलत जानकारी ठीक कराने या अपात्र व्यक्ति का नाम हटवाने के लिए मतदाताओं को एक और महत्वपूर्ण अवसर मिलने जा रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को राजधानी के सभी मतदान केंद्रों पर विशेष शिविर आयोजित किए जाएंगे। इन शिविरों में बूथ स्तर के अधिकारी मतदाताओं की मदद करेंगे और उन्हें नाम जोड़ने, हटाने तथा मतदाता सूची में दर्ज विवरणों में सुधार के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया समझाएंगे। जिन लोगों का नाम अभी तक मतदाता सूची में दर्ज नहीं है, वे इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं। वहीं, जिन मतदाताओं के नाम, पते या अन्य जानकारियों में गलती है, वे भी जरूरी दस्तावेजों के साथ आवेदन कर सकते हैं। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है। इसके तहत पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने के साथ ही सूची में मौजूद गलतियों को दूर करने और नियमानुसार अपात्र प्रविष्टियों पर कार्रवाई करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। 

निर्वाचन संबंधी दावों और आपत्तियों को दर्ज कराने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2026 निर्धारित बताई गई है। ऐसे में 25 अक्टूबर को लगने वाले विशेष शिविर उन लोगों के लिए खास महत्व रखते हैं, जिन्होंने अभी तक आवेदन नहीं किया है या जिन्हें मतदाता सूची में सुधार कराना है। मतदाता अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर पहुंचकर बूथ स्तर के अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। अधिकारी संबंधित आवेदन पत्र भरने, जरूरी दस्तावेजों की जानकारी देने और आवेदन प्रक्रिया में सहायता करेंगे। हालांकि, मतदाताओं को ध्यान रखना होगा कि शिविर में आवेदन जमा करना और आवेदन के आधार पर मतदाता सूची में बदलाव होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। संबंधित आवेदन की जांच और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन पर निर्णय लिया जाएगा। मतदाता सूची से संबंधित अलग-अलग कार्यों के लिए निर्वाचन आयोग ने अलग-अलग आवेदन पत्र निर्धारित किए हैं। आवेदन करने से पहले यह समझना जरूरी है कि किस उद्देश्य के लिए कौन सा फॉर्म इस्तेमाल किया जाना है। इससे गलत आवेदन करने या प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होने की आशंका कम हो सकती है। फॉर्म-6: यदि किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं है और वह अपना नाम जुड़वाना चाहता है, तो इसके लिए फॉर्म-6 का इस्तेमाल किया जाता है। 

नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करना जरूरी है। संबंधित अभियान में पात्रता की तारीख और लागू दिशा-निर्देशों की पुष्टि बूथ स्तर के अधिकारी या निर्वाचन आयोग के आधिकारिक माध्यम से कर लेनी चाहिए। आवेदन के साथ आयु और निवास से संबंधित जरूरी दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। फॉर्म-7: मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने के लिए आवेदन करने अथवा किसी प्रविष्टि पर नियमानुसार आपत्ति दर्ज कराने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है, कोई मतदाता स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो गया है या किसी प्रविष्टि को लेकर वैध आपत्ति है, तो संबंधित नियमों के तहत आवेदन किया जा सकता है। 

हालांकि, केवल व्यक्तिगत मतभेद या राजनीतिक असहमति के आधार पर किसी का नाम हटाने की मांग नहीं की जा सकती। नाम हटाने से पहले निर्वाचन अधिकारी संबंधित तथ्यों और नियमों के अनुसार जांच कर सकते हैं। फॉर्म-8: मतदाता सूची में पहले से दर्ज नाम, पते या अन्य विवरणों में संशोधन कराने के लिए फॉर्म-8 उपयोगी है। मतदाता पहचान पत्र में सुधार, निवास स्थान बदलने या निर्धारित श्रेणी में अन्य संशोधन के लिए इस फॉर्म के माध्यम से आवेदन किया जा सकता है। आवेदन के साथ संबंधित बदलाव को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज देना जरूरी हो सकता है। इन तीनों फॉर्म का उद्देश्य अलग-अलग है। इसलिए मतदाताओं को आवेदन करने से पहले अपनी जरूरत स्पष्ट कर लेनी चाहिए। यदि किसी को यह समझने में परेशानी हो कि उसके मामले में कौन सा फॉर्म लागू होगा, तो वह 25 अक्टूबर को अपने मतदान केंद्र पर मौजूद बूथ स्तर के अधिकारी से मार्गदर्शन ले सकता है।

मतदान केंद्र पर जाकर या घर बैठे भी कर सकते हैं आवेदन

विशेष शिविरों में आवेदन करने के लिए मतदाताओं को अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर पहुंचना होगा। वहां बूथ स्तर के अधिकारी आवेदन पत्रों और प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। मतदाता अपने साथ पहचान और पते से संबंधित दस्तावेज लेकर जाएं, ताकि आवेदन के दौरान जरूरी जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सके। नए पंजीकरण के लिए आयु प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण और हाल की रंगीन फोटो जैसे दस्तावेज उपयोगी हो सकते हैं। संशोधन या नाम हटाने के मामलों में जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रमाण मांगे जा सकते हैं। जो लोग किसी कारणवश रविवार को मतदान केंद्र नहीं पहुंच सकते, वे निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट मतदाता सेवा पोर्टल या मतदाता सहायता मोबाइल ऐप के माध्यम से भी संबंधित सेवाओं की उपलब्धता के अनुसार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। 

ऑनलाइन आवेदन करते समय सही जानकारी भरना, आवश्यक दस्तावेज अपलोड करना और आवेदन संख्या सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है। इससे आगे आवेदन की स्थिति जानने में मदद मिल सकती है। मतदाताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऑनलाइन आवेदन जमा करने के बाद उसकी जांच की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारी अतिरिक्त जानकारी या दस्तावेज मांग सकते हैं। इसलिए आवेदन में मोबाइल नंबर और अन्य विवरण सही दर्ज करना बेहतर रहेगा। यदि आवेदन की स्थिति को लेकर कोई समस्या आती है, तो आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी देखी जा सकती है या निर्वाचन आयोग की हेल्पलाइन से सहायता ली जा सकती है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत दावों और आपत्तियों की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2026 बताई गई है। ऐसे में मतदाताओं को अंतिम दिन तक इंतजार करने के बजाय समय रहते आवेदन करना चाहिए। 

आवेदन से पहले यह जांचना भी जरूरी है कि उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज है या नहीं और उसमें कोई गलती तो नहीं है। नाम, पता या अन्य विवरण गलत होने पर समय रहते संशोधन के लिए आवेदन किया जा सकता है। मतदाता अपने आवेदन से संबंधित जानकारी और सहायता के लिए निर्वाचन आयोग की हेल्पलाइन संख्या 1950 पर संपर्क कर सकते हैं। हालांकि, शिविरों का समय, स्थानीय व्यवस्था और जरूरी दस्तावेजों की पुष्टि संबंधित निर्वाचन कार्यालय से करना उचित रहेगा। 25 अक्टूबर को आयोजित होने वाले विशेष शिविर दिल्ली के उन नागरिकों के लिए उपयोगी अवसर हैं, जो मतदाता सूची से जुड़ी अपनी समस्याओं का समाधान कराना चाहते हैं। पात्र नागरिकों को निर्धारित नियमों के तहत आवेदन करना चाहिए, जबकि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर आपत्ति दर्ज कराने वालों को अपने दावे के समर्थन में सही जानकारी उपलब्ध करानी होगी। मतदाता सूची में सही और अद्यतन जानकारी सुनिश्चित करने के लिए समय पर आवेदन करना और उसकी स्थिति पर नजर रखना जरूरी है।

त्योहारी सीजन में भी नहीं बढ़ी स्मार्टफोन की बिक्री, मोबाइल बाजार उदास, महंगे चिप ने बिगाड़ा खेल

त्योहारी सीजन में आमतौर पर स्मार्टफोन बाजार में रौनक रहती है। कंपनियां नए मॉडल उतारती हैं, ऑनलाइन मंचों पर आकर्षक छूट दी जाती है और ग्राहक पुराने फोन को बदलकर नया स्मार्टफोन खरीदने की योजना बनाते हैं। लेकिन 2026 में तस्वीर इसके उलट नजर आई। त्योहारों के बावजूद भारत में स्मार्टफोन की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गई और बाजार पिछले दस वर्षों के सबसे कमजोर तीसरी तिमाही के स्तर पर पहुंच गया। महंगे होते मोबाइल फोन, चिप और मेमोरी की बढ़ती लागत तथा ग्राहकों की कमजोर खरीदारी ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान देश में कुल 3.58 करोड़ स्मार्टफोन बिके। यह पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 26 प्रतिशत कम है। वर्ष 2016 के बाद किसी तीसरी तिमाही में इतनी कम बिक्री दर्ज नहीं की गई थी। आमतौर पर सितंबर में शुरू होने वाली त्योहारी खरीदारी स्मार्टफोन कंपनियों के लिए कारोबार बढ़ाने का बड़ा अवसर होती है, लेकिन इस बार बाजार को अपेक्षित फायदा नहीं मिला। इससे साफ है कि केवल त्योहार और छूट के दम पर ग्राहकों को नया फोन खरीदने के लिए तैयार करना अब आसान नहीं रह गया है।

बाजार में आई इस गिरावट के बीच कंपनियों की रैंकिंग में भी बदलाव देखने को मिला। सैमसंग ने करीब ढाई साल बाद फिर से पहला स्थान हासिल कर लिया। कंपनी ने तीसरी तिमाही में लगभग 67 लाख स्मार्टफोन बेचे। उसके बाद वीवो, ओप्पो और शाओमी का स्थान रहा। बाजार की इस तस्वीर से संकेत मिलता है कि बिक्री में गिरावट का असर लगभग सभी प्रमुख कंपनियों पर पड़ा है, हालांकि अलग-अलग ब्रांडों के प्रदर्शन में अंतर रहा। तीसरी तिमाही में सैमसंग ने करीब 67 लाख स्मार्टफोन बेचकर बाजार में शीर्ष स्थान हासिल किया। कंपनी के गैलेक्सी ए07, ए17 और ए27 जैसे मॉडलों के साथ प्रीमियम श्रेणी के फोन की मांग ने उसे बढ़त दिलाने में भूमिका निभाई। लंबे समय बाद पहले स्थान पर लौटना सैमसंग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब पूरे बाजार में बिक्री कमजोर है।

वीवो करीब 64 लाख स्मार्टफोन की बिक्री के साथ दूसरे स्थान पर रही। हालांकि, कंपनी की बिक्री में सालाना आधार पर 34 प्रतिशत की गिरावट आई। ओप्पो ने लगभग 49 लाख फोन बेचकर तीसरा स्थान हासिल किया, लेकिन उसकी बिक्री भी पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 24 प्रतिशत कम रही। वहीं, शाओमी करीब 47 लाख स्मार्टफोन की बिक्री के साथ चौथे स्थान पर रही। कंपनी की बिक्री में 28 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बाजार की सुस्ती किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है। बड़ी कंपनियों के लोकप्रिय मॉडल और ब्रांड की पहचान के बावजूद ग्राहक खरीदारी के मामले में सावधानी बरत रहे हैं। कंपनियों के सामने अब चुनौती केवल प्रतिस्पर्धी ब्रांडों से आगे निकलने की नहीं, बल्कि ग्राहकों को नया फोन खरीदने के लिए प्रेरित करने की भी है।

बाजार की एक और महत्वपूर्ण तस्वीर चीनी स्मार्टफोन कंपनियों की हिस्सेदारी में गिरावट के रूप में सामने आई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही में इन कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 75 प्रतिशत थी, जो 2026 की समान अवधि में घटकर लगभग 68 प्रतिशत रह गई। सैमसंग की वापसी और विभिन्न कंपनियों की बिक्री में आए अंतर ने बाजार के समीकरणों को प्रभावित किया है। हालांकि, हिस्सेदारी में बदलाव के पीछे केवल एक कारण नहीं माना जा सकता। कीमतों, उत्पादों की उपलब्धता, ग्राहकों की पसंद और कंपनियों की बिक्री रणनीति का भी असर पड़ सकता है।

महंगे चिप और मेमोरी ने बढ़ाई कंपनियों की मुश्किल

स्मार्टफोन बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजहों में वैश्विक स्तर पर चिप और मेमोरी की बढ़ती कीमतों को माना जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े डेटा केंद्रों का तेजी से विस्तार होने के कारण मेमोरी चिप की मांग बढ़ी है। एआई आधारित सेवाओं को चलाने वाले बड़े डेटा केंद्रों में बड़ी मात्रा में मेमोरी की जरूरत पड़ती है। इससे डीआरएएम और एनएएनडी जैसी मेमोरी तकनीकों की मांग और आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। इनका इस्तेमाल स्मार्टफोन सहित कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है। जब मोबाइल फोन बनाने में इस्तेमाल होने वाले जरूरी पुर्जे महंगे होते हैं, तो कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इसका असर फोन की कीमतों पर पड़ता है। कंपनियों के सामने दो विकल्प होते हैं, लागत बढ़ने के बावजूद कीमतों को नियंत्रित रखना या बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना। दोनों ही स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं। कीमतें बढ़ाने से ग्राहक खरीदारी टाल सकते हैं, जबकि कीमतें नहीं बढ़ाने पर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।

इसका सबसे अधिक असर बजट स्मार्टफोन खरीदने वाले ग्राहकों पर पड़ सकता है। भारतीय बाजार में बड़ी संख्या में लोग सीमित बजट में फोन खरीदते हैं और उनके लिए कीमत में मामूली बढ़ोतरी भी महत्वपूर्ण होती है। सस्ते फोन के विकल्प कम होने या उनकी कीमत बढ़ने से ग्राहक नया उपकरण खरीदने के बजाय पुराने फोन का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। स्मार्टफोन की बिक्री घटने के पीछे ग्राहकों का बदलता व्यवहार भी अहम है। पहले जहां कई लोग दो से तीन साल में फोन बदल लेते थे, वहीं अब बेहतर बैटरी, पर्याप्त स्टोरेज और सामान्य जरूरतों को पूरा करने वाले पुराने फोन को अधिक समय तक इस्तेमाल किया जा रहा है। जब तक फोन ठीक से काम करता है, तब तक नया मॉडल खरीदने की जरूरत महसूस नहीं होती। बढ़ती कीमतों ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है।

सितंबर में ऑनलाइन खरीदारी के दौरान मिलने वाली छूट भी इस बार बाजार में अपेक्षित उत्साह पैदा नहीं कर सकी। नए मॉडलों की सीमित उपलब्धता और कम आकर्षक पेशकशों के कारण त्योहारी खरीदारी को वह गति नहीं मिली, जिसकी कंपनियों को उम्मीद थी। हालांकि, ऑनलाइन बिक्री के कमजोर रहने को केवल छूट की कमी से जोड़ना उचित नहीं होगा। ग्राहकों की क्रय शक्ति, फोन की कीमत और खरीदारी टालने की प्रवृत्ति भी इसके पीछे अहम कारण हो सकते हैं।

आने वाले महीनों में स्मार्टफोन कंपनियों की रणनीति पर सबकी नजर रहेगी। कंपनियों को कीमत और सुविधाओं के बीच बेहतर संतुलन बनाना होगा। बजट श्रेणी में किफायती मॉडल उपलब्ध कराना, पुराने ग्राहकों को आकर्षक बदलाव योजनाएं देना और प्रीमियम फोन में नई सुविधाओं के जरिए मांग बढ़ाना उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। तीसरी तिमाही के आंकड़े भारतीय स्मार्टफोन बाजार के सामने खड़ी चुनौतियों को उजागर करते हैं। त्योहारों के दौरान भी बिक्री में 26 प्रतिशत की गिरावट बताती है कि केवल मौसमी मांग के सहारे बाजार को गति देना मुश्किल हो रहा है। यदि चिप और मेमोरी की लागत ऊंची बनी रहती है और फोन की कीमतें बढ़ती हैं, तो कंपनियों को ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप नई रणनीति अपनानी पड़ सकती है। फिलहाल, बाजार की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि लागत का दबाव कितना कम होता है और ग्राहक नया स्मार्टफोन खरीदने के लिए कितनी जल्दी तैयार होते हैं।

इंटरनेट पर बच्चों की आजादी बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध की मांग ठुकराई

इंटरनेट आज शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल को संविधान के मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था अपनाने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 21 तथा अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाले अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। डिजिटल युग में इंटरनेट सूचना प्राप्त करने, विचार व्यक्त करने और शिक्षा हासिल करने का प्रमुख माध्यम बन गया है। ऐसे में बच्चों सहित प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उम्र के आधार पर बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत के रुख से यह संकेत मिलता है कि बच्चों को ऑनलाइन दुनिया से पूरी तरह अलग करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे वे इंटरनेट का उपयोग कर सकें और उन्हें हानिकारक सामग्री तथा ऑनलाइन खतरों से भी सुरक्षित रखा जा सके।

इंटरनेट के माध्यम से बच्चे पढ़ाई, नई जानकारियां हासिल करने, शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने और अपनी रचनात्मक क्षमताओं को विकसित करने जैसे काम करते हैं। ऑनलाइन माध्यमों ने शिक्षा के अवसरों का विस्तार किया है। हालांकि, इंटरनेट पर मौजूद हर सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती। अनुचित सामग्री, साइबर बुलिंग, अनजान लोगों से संपर्क और ऑनलाइन शोषण जैसी समस्याएं बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में अदालत के सामने बच्चों के डिजिटल अधिकारों और उनकी सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण पहलू है। इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगाने से जहां बच्चों की शैक्षणिक और सूचनात्मक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं, वहीं बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के इंटरनेट का इस्तेमाल उनके लिए जोखिम भी पैदा कर सकता है। इसलिए सुरक्षित और नियंत्रित डिजिटल वातावरण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने के बजाय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘चाइल्ड मोड’ जैसी व्यवस्था अपनाने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य बच्चों को डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करने की सुविधा देते हुए उनकी उम्र के अनुरूप सुरक्षा उपलब्ध कराना है। इस तरह की व्यवस्था में बच्चों के अकाउंट की गोपनीयता, अनजान लोगों से संपर्क और उनके सामने आने वाली सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।

चाइल्ड मोड के तहत बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट शुरुआत से ही निजी रखे जा सकते हैं। इससे उनकी व्यक्तिगत जानकारी और गतिविधियां सार्वजनिक रूप से दिखाई देने की आशंका कम हो सकती है। निजी अकाउंट की व्यवस्था बच्चों की तस्वीरों, पोस्ट और अन्य व्यक्तिगत जानकारियों को अनजान लोगों तक पहुंचने से रोकने में मदद कर सकती है। इसके अलावा, बच्चों को अनजान वयस्कों की ओर से भेजे जाने वाले संदेशों और संपर्क अनुरोधों से बचाने के लिए भी विशेष प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसी तकनीकी व्यवस्थाएं विकसित कर सकते हैं, जिनके माध्यम से बच्चों के अकाउंट पर संपर्क करने वाले लोगों की पहुंच सीमित हो। इससे ऑनलाइन धोखाधड़ी, अनुचित बातचीत और संभावित शोषण के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

अदालत की ओर से सुझाई गई व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू विज्ञापनों और ऑनलाइन सामग्री की निगरानी भी है। बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप सामग्री उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे ऐसी चीजों के संपर्क में न आएं जो उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भी इस दिशा में जिम्मेदारी निभानी होगी। बच्चों के लिए इंटरनेट सुरक्षित बनाने में केवल तकनीकी प्रतिबंध ही पर्याप्त नहीं होंगे। प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था और अभिभावकों की जागरूकता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि किसी बच्चे को ऑनलाइन परेशान किया जाता है या वह अनुचित सामग्री के संपर्क में आता है, तो उसकी शिकायत पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए।

माता-पिता की सहमति और हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण पर जोर

अदालत ने किशोरावस्था से पहले के बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल के संबंध में माता-पिता की सहमति और उचित निगरानी की व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इसका उद्देश्य बच्चों को डिजिटल दुनिया से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी के साथ इंटरनेट का उपयोग करना सिखाना है। कम उम्र के बच्चों को यह समझना जरूरी है कि इंटरनेट पर अपनी निजी जानकारी साझा करने, अनजान लोगों से बातचीत करने और किसी लिंक पर क्लिक करने के क्या परिणाम हो सकते हैं। माता-पिता की निगरानी से बच्चों को ऑनलाइन खतरों की पहचान करने और सुरक्षित व्यवहार अपनाने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, निगरानी का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चों की सुरक्षा के साथ उनकी उम्र के अनुरूप स्वतंत्रता और सीखने के अवसर भी बने रहें। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, ताकि वे ऑनलाइन किसी परेशानी का सामना करने पर बिना डर के अपनी बात साझा कर सकें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों को स्वभाव से हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए केंद्र सरकार आवश्यक प्रतिबंध लगा सकती है। इसमें वयस्क वेबसाइटों और बच्चों के लिए अनुपयुक्त अन्य सामग्री तक पहुंच को सीमित करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। इस तरह की व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को ऐसे डिजिटल वातावरण से बचाना है, जो उनके विकास और सुरक्षा के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री की विशाल मात्रा को देखते हुए बच्चों की उम्र के अनुसार फिल्टरिंग और निगरानी की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके लिए तकनीकी उपायों के साथ स्पष्ट नियम और प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म को ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करनी होंगी, जिनसे बच्चों को अनुचित सामग्री से बचाया जा सके और उनकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई हो । बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अदालत ने बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश भी दिया है। इसका उद्देश्य ऐसी अवैध सामग्री के प्रसार पर रोक लगाने और उसकी पहचान की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है। इंटरनेट पर बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री का प्रसार एक गंभीर अपराध है। ऐसी सामग्री बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों का उल्लंघन करती है। राष्ट्रीय स्तर पर डेटाबेस विकसित होने से संबंधित सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के प्रयासों में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही जांच एजेंसियों और संबंधित संस्थाओं के बीच समन्वय भी महत्वपूर्ण होगा।

इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए संबंधित कानूनों का पालन, तकनीकी क्षमताओं का विकास और बच्चों की पहचान से जुड़ी संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी होगा। ऑनलाइन शोषण से जुड़े मामलों में समय पर कार्रवाई और पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का व्यापक संदेश यह है कि बच्चों की सुरक्षा और इंटरनेट तक उनकी पहुंच को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने में सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों, अभिभावकों और समाज की संयुक्त भूमिका महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाना बड़ी चुनौती है। चाइल्ड मोड, निजी अकाउंट, अभिभावकों की सहमति और हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण जैसे उपाय इस दिशा में मददगार हो सकते हैं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं की वास्तविक सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगी।

मस्क की स्टारलिंक भारत में लॉन्च के लिए तैयार? 5 साल की तैयारी के बाद अब नजर सरकार की मंजूरी पर

भारत में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की दिशा में एलोन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने अपनी तैयारियों को लेकर बड़ा दावा किया है। कंपनी का कहना है कि वह भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए पिछले पांच साल से अधिक समय से काम कर रही है। इसके लिए जरूरी तकनीकी ढांचे, सुरक्षित नेटवर्क और अन्य व्यवस्थाओं को तैयार किया गया है। हालांकि, कंपनी की तैयारियों के बावजूद भारत में व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने के लिए नियामकीय और सुरक्षा संबंधी प्रक्रियाएं पूरी होना जरूरी है।

स्टारलिंक की ओर से यह जानकारी सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा की गई। कंपनी के इस बयान को भारत के तेजी से बढ़ते दूरसंचार और इंटरनेट बाजार में उसकी संभावित शुरुआत से जोड़कर देखा जा रहा है। सैटेलाइट के माध्यम से इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली यह सेवा विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्टारलिंक की तैयारियों का यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है। देश में पहले से स्थापित दूरसंचार कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी संभावनाएं तलाश रही हैं। ऐसे में स्टारलिंक की एंट्री भारतीय इंटरनेट बाजार में नई प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकती है। हालांकि, कंपनी की ओर से तैयारियों की जानकारी दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भारत में उसकी व्यावसायिक सेवा शुरू करने की तारीख तय हो गई है।

स्टारलिंक ने अपने बयान में कहा कि वह पिछले पांच साल से अधिक समय से भारत के नियामकों, उद्योग जगत और दूरसंचार ऑपरेटरों के साथ मिलकर काम कर रही है। कंपनी के अनुसार, भारत में सेवाएं शुरू करने के लिए केवल सैटेलाइट नेटवर्क तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश की आवश्यकताओं और नियमों के अनुरूप तकनीकी तथा परिचालन संबंधी व्यवस्थाएं बनाना भी जरूरी है। कंपनी ने दावा किया कि उसने भारत में उत्पन्न होने वाले इंटरनेट ट्रैफिक को सुरक्षित तरीके से संभालने के लिए समर्पित प्रणालियां और बुनियादी ढांचा तैयार किया है। इसमें गेटवे और अन्य नेटवर्क सुविधाएं शामिल हैं, जो सैटेलाइट से मिलने वाले इंटरनेट कनेक्शन को स्थानीय नेटवर्क व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सैटेलाइट इंटरनेट की खासियत यह है कि इसके लिए हर जगह जमीन के नीचे केबल बिछाना या मोबाइल टावरों का व्यापक नेटवर्क तैयार करना अनिवार्य नहीं होता। सैटेलाइट और जमीन पर मौजूद उपकरणों के माध्यम से उपयोगकर्ताओं तक इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। यही वजह है कि दूरदराज के गांवों, पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और उन स्थानों पर इस तकनीक की उपयोगिता अधिक मानी जाती है, जहां सामान्य इंटरनेट सेवाएं पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है।

भारत जैसे विशाल देश में, जहां कई क्षेत्रों में अभी भी तेज और भरोसेमंद इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना चुनौती बना हुआ है, वहां सैटेलाइट आधारित सेवाएं डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार में मदद कर सकती हैं। हालांकि, वास्तविक उपयोगिता सेवा की कीमत, उपलब्ध क्षमता, मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ नियामकीय शर्तों पर भी निर्भर करेगी।

रिलायंस के बयान के बाद स्टारलिंक ने रखी अपनी तैयारी

स्टारलिंक का यह बयान रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से प्रतिस्पर्धा को लेकर दिए गए बयान के बाद आया है। रिलायंस ने स्पष्ट किया था कि वह बाजार में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है और उसे स्टारलिंक के भारत में आने से डर नहीं है। कंपनी ने यह भी कहा था कि भारत में कारोबार करने वाली प्रत्येक कंपनी को देश के कानूनों और नियामकीय नियमों का पालन करना होगा। रिलायंस इंडस्ट्रीज के इस रुख को भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में संभावित प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश में इंटरनेट सेवाओं का बाजार तेजी से विकसित हुआ है और मोबाइल डेटा की बढ़ती मांग ने कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा को और तेज किया है। ऐसे में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं पारंपरिक ब्रॉडबैंड और मोबाइल नेटवर्क के लिए एक अतिरिक्त विकल्प बन सकती हैं।

हालांकि, सैटेलाइट इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की तकनीक तथा काम करने का तरीका अलग-अलग है। दोनों सेवाओं के बीच प्रतिस्पर्धा का वास्तविक स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां ग्राहकों को किस कीमत पर सेवा उपलब्ध कराती हैं और उनकी जरूरतों के अनुरूप नेटवर्क की गुणवत्ता कैसी रहती है। स्टारलिंक के भारत में प्रवेश से जुड़े घटनाक्रम पर इसलिए भी नजर रखी जा रही है, क्योंकि कंपनी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध करा रही है। भारत में उसे बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ-साथ ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है। दूसरी ओर, भारतीय नियमों का पालन करना और सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करना उसके लिए महत्वपूर्ण शर्तें होंगी।

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने के लिए कंपनियों को कई नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के अनुसार, कुछ सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों को लाइसेंस दिए जा चुके हैं, लेकिन सुरक्षा मंजूरी और सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने से संबंधित प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। लाइसेंस मिलना और व्यावसायिक सेवा शुरू करने की अंतिम अनुमति मिलना अलग-अलग चरण हो सकते हैं। कंपनियों को निर्धारित सुरक्षा मानकों, तकनीकी आवश्यकताओं और अन्य नियामकीय शर्तों को पूरा करना पड़ता है। इसके साथ ही स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल से जुड़े नियम और शुल्क भी सेवा शुरू करने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।

सैटेलाइट स्पेक्ट्रम वह रेडियो फ्रीक्वेंसी संसाधन है, जिसके माध्यम से सैटेलाइट और संबंधित नेटवर्क उपकरणों के बीच संचार किया जाता है। इसका आवंटन, इस्तेमाल और शुल्क तय करने की व्यवस्था देश के दूरसंचार ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए सरकार की ओर से तय किए जाने वाले नियमों का सीधा प्रभाव कंपनियों की व्यावसायिक योजनाओं पर पड़ सकता है। स्टारलिंक के लिए भी इन प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी होगा। कंपनी भले ही अपने तकनीकी ढांचे और तैयारियों को लेकर दावा कर रही हो, लेकिन भारतीय बाजार में सेवाएं शुरू करने के लिए संबंधित विभागों की सभी आवश्यक मंजूरियां हासिल करना अनिवार्य रहेगा। एलोन मस्क ने भारत के सैटेलाइट संचार बाजार से जुड़े कुछ मुद्दों पर सवाल उठाए थे। इसके बाद संचार मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार को बढ़ावा नहीं देता और देश में काम करने वाली सभी कंपनियों को निर्धारित नियमों के तहत ही कारोबार करना होगा।

जयपुर में सैलून इंडस्ट्री का महाकुंभ, 5,000 से ज्यादा सैलून मालिकों ने दिखाई एकजुटता की ताकत

भारतीय हेयर एंड ब्यूटी इंडस्ट्री के लिए जयपुर में आयोजित इंडियन हेयर एंड ब्यूटी कांफ्रेंस एक ऐतिहासिक आयोजन बनकर सामने आया। केटी ने हेयर & ब्यूटी फेडरेशन के सहयोग से 6 अक्टूबर 2026 को जयपुर एक्सहिबीशन एंड कन्वेशन सेंटर में इस भव्य सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें देशभर के 18 राज्यों और 50 से अधिक शहरों से 5,000 से ज्यादा सैलून मालिकों ने हिस्सा लिया। केटी के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं सीईओ ध्रुव सयानी के नेतृत्व में आयोजित इस सम्मेलन को भारतीय सैलून जगत को एक साझा राष्ट्रीय मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना गया।

राजस्थान के माननीय राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने सम्मेलन का उद्घाटन किया, जबकि राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी शाम के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना के साथ वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय कंपनियों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता है। इसके लिए जरूरी है कि देश के सैलून मालिक स्थानीय उत्पादों को अपनाएं और भारतीय ब्रांड्स के साथ मजबूत व्यावसायिक साझेदारी विकसित करें।

केटी के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं सीईओ ध्रुव सयानी ने सम्मेलन को सैलून इंडस्ट्री की एकजुटता के लिए ऐतिहासिक अवसर बताते हुए कहा, “इतनी बड़ी संख्या में सैलून समुदाय का एक मंच पर आना भारतीय हेयर एंड ब्यूटी इंडस्ट्री की सामूहिक ताकत को दर्शाता है। यह एकजुटता केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे निरंतर सहयोग, मजबूत कारोबार और भारतीय प्रोफेशनल ब्रांड्स के प्रति बढ़ते विश्वास में बदलना चाहिए।”

ध्रुव सयानी ने भारतीय सैलून उद्योग से केटी सहित देश में विकसित हो रहे गुणवत्तापूर्ण ब्रांड्स को समर्थन देने की अपील की। उन्होंने ऐसी साझेदारी की परिकल्पना सामने रखी, जिसमें उत्पादों की गुणवत्ता, प्रोफेशनल ट्रेनिंग, शिक्षा और व्यावसायिक विकास को समान महत्व मिले। उनका मानना है कि ब्रांड्स की सफलता और सैलून कारोबार की प्रगति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।”

कौशल विकास और रोजगार पर विशेष जोर

राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के संबोधन में भारतीय उद्यमिता, व्यावसायिक कौशल और स्वदेशी ब्रांड्स की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता का महत्व सामने आया। वहीं, उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने ब्यूटी एवं सैलून क्षेत्र के माध्यम से रोजगार, उद्यमिता और पेशेवर अवसरों के विस्तार की अहमियत को रेखांकित किया। उनके संबोधन में कौशल विकास, महिलाओं की भागीदारी और भारतीय व्यवसायों की प्रगति जैसे विषय प्रमुख रहे।

सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सैलून उद्योग से जुड़े उद्यमियों और पेशेवरों को सरकारी योजनाओं तथा कौशल विकास से संबंधित अवसरों की जानकारी मिलनी चाहिए। इससे छोटे और बड़े सैलून कारोबारों को अपनी क्षमताएं बढ़ाने, सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने और बदलते बाजार के अनुरूप आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।

गरीबी की पीढ़ियों पुरानी जंजीर तोड़ने की पहल, लाइट ऑफ लाइफ ट्रस्ट की बीएसई एसएसई पर एंट्री

शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम मानने वाला गैर-लाभकारी संगठन लाइट ऑफ लाइफ ट्रस्ट (एलओएलटी) बीएसई सोशल स्टॉक एक्सचेंज (एसएसई) पर लिस्ट हो गया है। इस पहल के जरिए बिहार और झारखंड के वंचित समुदायों के 420 बच्चों की शिक्षा और समग्र विकास के लिए फंड जुटाया जाएगा।

लिस्टिंग के तहत एलओएलटी ने ₹1.27 करोड़ का जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल (जेडसीजेडपी) बॉन्ड इश्यू शुरू किया है। प्रत्येक इंस्ट्रूमेंट का फेस वैल्यू ₹1,000 है और न्यूनतम एक इंस्ट्रूमेंट के लिए आवेदन किया जा सकता है।

लाइट ऑफ लाइफ ट्रस्ट की फाउंडर विली डॉक्टर ने कहा कि शिक्षा केवल एक बच्चे का भविष्य नहीं बदलती, बल्कि पूरे परिवार और समुदाय की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि एसएसई पर लिस्टिंग से लोगों और संस्थानों को बच्चों की शिक्षा में योगदान देने का पारदर्शी और व्यवस्थित मंच मिलेगा।

ईआरआईएक्स एडवाइजर्स की फाउंडर सीएस पायल गुप्ता ने इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि एसएसई एनजीओ के लिए फंड जुटाने के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत करने का प्रभावी माध्यम है।

शिवराजकुमार का रौद्र रूप, ‘ओरिजिनल मॉन्स्टर’ का धमाका

पैन इंडिया सुपरस्टार और सैंडलवुड के किंग डॉ. शिवराजकुमार अब तक के सबसे रौद्र और खूंखार अवतार में नजर आने वाले हैं। फिल्ममेकर आर. चंद्रू की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘ओरिजिनल मॉन्स्टर’ (ओएम) का दमदार पोस्टर और मोशन पोस्टर जारी कर दिया गया है। पहली झलक में ही फिल्म की डार्क, रॉ और जबरदस्त एक्शन से भरपूर दुनिया की झलक मिलती है।

खून, तबाही और अफरा-तफरी के बीच नजर आ रहे शिवराजकुमार का नया लुक उनकी स्क्रीन प्रेजेंस को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। निर्देशक आर. चंद्रू कहते हैं, “यह हमारे लिए सिर्फ एक और एक्शन फिल्म नहीं है, बल्कि एक पूरी दुनिया है, जिसे हम बेहद जुनून के साथ बना रहे हैं।”

डॉ. शिवराजकुमार भी इस नए किरदार को लेकर उत्साहित हैं। उनके मुताबिक, “यह इंटेंस और पावरफुल है और दर्शकों ने मुझे पहले जो करते देखा है, उससे काफी अलग है।”

निर्माता और प्रेजेंटर आनंद पंडित ने कहा, “उन्हें इस खूंखार नए अवतार में देखना वाकई बेहद रोमांचक है।”

आरसी स्टूडियोज की प्रस्तुति ‘ओरिजिनल मॉन्स्टर’ का निर्देशन आर. चंद्रू ने किया है। निर्माण यमुना चंद्रू ने किया है और आनंद पंडित इसे प्रस्तुत कर रहे हैं। पोस्टर के साथ ही ‘ओएम’ का काउंटडाउन भी शुरू हो चुका है।

निवेदिता बसु ने 40 के बाद शुरू किया स्क्वैश का चैंपियन सफर

टेलीविजन और डिजिटल मनोरंजन की दुनिया में दो दशक से अधिक समय तक पहचान बनाने वाली निवेदिता बसु अब एक नई भूमिका में नजर आ रही हैं—प्रतिस्पर्धी स्क्वैश खिलाड़ी के रूप में। 40 की उम्र के बाद गंभीरता से स्क्वैश अपनाने वाली निवेदिता आज मास्टर्स सर्किट में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं और अपनी कैटेगरी में सीडेड खिलाड़ी बन चुकी हैं। खेल उनके लिए बचपन से ही जीवन का हिस्सा रहा है। पिता टेनिस और स्क्वैश खेलते थे, जबकि मां राष्ट्रीय स्तर की टेबल टेनिस और हैंडबॉल खिलाड़ी रही हैं। निवेदिता कहती हैं, “फल पेड़ से ज्यादा दूर नहीं गिरता।”

बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की और कसौटी जिंदगी की जैसे चर्चित शोज से जुड़ी रहीं निवेदिता ने बाद में नेतृत्व और उद्यमिता की राह भी चुनी। अब स्क्वैश उनके लिए सिर्फ फिटनेस नहीं, बल्कि लक्ष्य और प्रतिस्पर्धा का माध्यम है।

कोलकाता में आयोजित नेशनल मास्टर्स स्क्वैश चैंपियनशिप में सेमीफाइनल तक पहुंचकर उन्होंने अपनी क्षमता साबित की। उनका मानना है, “मैं यह नहीं बदल सकती कि मैंने कब शुरुआत की, लेकिन अब इसे कितनी गंभीरता से लेती हूं, यह मेरे हाथ में है।”

महिलाओं को खेल से जोड़ने के लिए उन्होंने वीमेन एंड रैकेट स्पोर्ट्स पहल भी शुरू की है। उनका संदेश साफ है—“40 के बाद नई शुरुआत करना देर नहीं, बल्कि खुद को फिर से खोजने का मौका है।”