अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुंचे राहुल गांधी का मोदी सरकार पर तीखा प्रहार, कहा- “आर्थिक व्यवस्था टूटने की कगार पर”

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी अपने दो दिवसीय उत्तर प्रदेश दौरे पर मंगलवार को रायबरेली पहुंचे, जहां उन्होंने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि देश के सामने बहुत बड़ा आर्थिक संकट खड़ा होने जा रहा है और इसका सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को कुछ बड़े उद्योगपतियों के भरोसे छोड़ दिया है, जिसका परिणाम आने वाले समय में पूरे देश को भुगतना पड़ सकता है। राहुल गांधी ने रायबरेली में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि “आर्थिक तूफान” अब देश की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जो आर्थिक ढांचा तैयार किया है, वह टिक नहीं पाएगा और पूरी तरह टूट जाएगा। राहुल ने दावा किया कि इसका नुकसान बड़े उद्योगपतियों को नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के युवाओं, किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों को झेलना पड़ेगा। 

उन्होंने कहा कि आने वाला समय बहुत कठिन होने वाला है और देश की जनता को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री लोगों को सलाह दे रहे हैं कि विदेश यात्राएं कम करें, सोना न खरीदें और दूसरी चीजों पर खर्च सीमित करें, लेकिन खुद प्रधानमंत्री लगातार विदेश दौरों में व्यस्त रहते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार जनता की परेशानियों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है, जबकि देश के भीतर बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है। रायबरेली पहुंचने से पहले राहुल गांधी मंगलवार सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे दिल्ली से लखनऊ पहुंचे। लखनऊ हवाई अड्डे पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने उनका स्वागत किया। बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और समर्थक वहां मौजूद रहे। कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी के समर्थन में नारे लगाए और बैनर-पोस्टर के साथ उनका स्वागत किया। 

लखनऊ से राहुल गांधी सड़क मार्ग से रायबरेली के लिए रवाना हुए। रास्ते में उन्होंने चुरुवा मंदिर में रुककर हनुमान जी के दर्शन किए। मंदिर के पुजारी ने उन्हें माला पहनाई और प्रसाद भेंट किया। इसके बाद राहुल गांधी बछरावां पहुंचे, जहां उन्होंने सांसद निधि से बने विवाह भवन का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत भी की और क्षेत्र की समस्याओं के बारे में जानकारी ली। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि उन्होंने रायबरेली की जनता से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि जनता का पैसा कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित कर दिया गया है। किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की मेहनत का लाभ बड़े उद्योगपतियों को पहुंचाया जा रहा है। 

राहुल ने आरोप लगाया कि छोटे कारोबारियों से आर्थिक ताकत छीनकर बड़े पूंजीपतियों को दी जा रही है, जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था कमजोर हो रही है। उन्होंने कहा कि देश में ऐसा आर्थिक संकट आने वाला है, जैसा लोगों ने पहले कभी नहीं देखा होगा। राहुल गांधी ने कहा कि जब यह संकट आएगा तो बड़े उद्योगपति अपने महलों और सुरक्षा घेरे में सुरक्षित रहेंगे, लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में रहने वाले आम लोगों को उठानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि युवा बेरोजगारी से परेशान होंगे, किसान आर्थिक दबाव में आएंगे और छोटे व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद यह राहुल गांधी का रायबरेली का सातवां दौरा 

राहुल गांधी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद यह उनका रायबरेली का सातवां दौरा है। इससे पहले वह जनवरी 2026 में रायबरेली आए थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटी है और राहुल गांधी लगातार रायबरेली तथा अमेठी जैसे क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। राहुल गांधी मंगलवार रात रायबरेली में ही रुकेंगे। बुधवार को वह जनता दर्शन कार्यक्रम में शामिल होकर स्थानीय लोगों से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा स्वतंत्रता सेनानी वीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण भी करेंगे। इसके बाद उनका अमेठी जाने का कार्यक्रम है। 

कांग्रेस संगठन राहुल गांधी के इन दौरों को जनता से सीधे संवाद और संगठन को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देख रहा है। राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि देश को मजबूत बनाने के लिए केवल बड़े उद्योगपतियों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि किसानों, मजदूरों, युवाओं और छोटे व्यापारियों की ताकत से ही देश आगे बढ़ सकता है। अगर इन्हीं वर्गों को कमजोर किया जाएगा तो देश की आर्थिक नींव भी कमजोर हो जाएगी। उन्होंने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि आज देश में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं और युवाओं में निराशा बढ़ रही है। 

किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा और छोटे व्यापारी लगातार दबाव झेल रहे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस जनता की आवाज उठाती रहेगी और आम लोगों के मुद्दों को लेकर संघर्ष जारी रखेगी। राहुल गांधी के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो सकता है। वहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं में राहुल गांधी के दौरे को लेकर उत्साह दिखाई दिया। पार्टी नेताओं का मानना है कि लगातार जनसंपर्क और क्षेत्रीय दौरों से कांग्रेस को आने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

पीएम मोदी की अपील का असर: बदला सत्ता का रंग, वीआईपी सायरन से पब्लिक ट्रांसपोर्ट तक, नेता, मंत्री और अफसर चले सादगी की राह पर 

10 मई को तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मंच से देशहित में ऊर्जा बचत, सोने की खरीद कम करने, विदेश यात्राएं टालने और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि उसका असर कुछ ही दिनों में सत्ता के गलियारों से लेकर देश की सड़कों तक दिखाई देने लगेगा। प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह समय देशहित में अपनी जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव करने का है। उन्होंने पेट्रोल-डीजल बचाने, कार पूलिंग अपनाने, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के ज्यादा इस्तेमाल, खाने के तेल की खपत कम करने और एक साल तक गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की बात कही थी। इसके अगले ही दिन 11 मई को गुजरात के वडोदरा में भी प्रधानमंत्री ने यही संदेश दोहराया। उन्होंने कहा कि हर नागरिक अगर थोड़ी जिम्मेदारी दिखाए तो देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला बोझ काफी कम हो सकता है। उस वक्त यह एक सामान्य अपील की तरह लगी थी, लेकिन अब इसका असर राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में साफ दिखाई देने लगा है। पीएम की सलाह के बाद कई राज्य सरकारों ने भी “वर्क को बढ़ावा देने की दिशा में कदम तेज कर दिए ।देशभर में खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी और विश्वविद्यालयों के कुलपति तक सादगी का संदेश देते नजर आ रहे हैं। 

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में सरकारी तंत्र के भीतर “कम खर्च, ज्यादा संदेश” की नई संस्कृति दिखाई देने लगी है। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकारी विभागों को ऊर्जा बचत और अनावश्यक वाहन उपयोग कम करने के निर्देश दिए हैं। कई विभागों में अधिकारियों ने साझा वाहन व्यवस्था शुरू की है। देहरादून में कई वरिष्ठ अधिकारी छोटे काफिलों में आते-जाते दिखाई दिए। मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण ने “तेल बचाओ अभियान” भी शुरू किया है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी बैठकों में ऊर्जा संरक्षण और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग पर जोर दिया है। लखनऊ और नोएडा में कई मंत्री और अधिकारी मेट्रो से सफर करते दिखाई दिए। राज्य सरकार ने विभागों को अनावश्यक सरकारी वाहनों के उपयोग में कटौती के निर्देश दिए हैं। दिल्ली में भी कई केंद्रीय मंत्री और सांसद मेट्रो और इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल करते दिखाई दिए। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के कई दफ्तरों में कारपूलिंग को प्रोत्साहित करने की चर्चा तेज हो गई है। 

राजस्थान में भाजपा नेताओं ने जिला स्तर पर “ईंधन बचाओ” अभियान शुरू किया है। जयपुर में कुछ जनप्रतिनिधि साइकिल और ई-रिक्शा से कार्यक्रमों में पहुंचे। हरियाणा और गुजरात में भी कई मंत्रियों ने छोटे काफिलों के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहुंचकर सादगी का संदेश देने की कोशिश की। सबसे ज्यादा चर्चा उस समय हुई जब भोपाल दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल दो गाड़ियों के छोटे काफिले के साथ दिखाई दिए। आमतौर पर प्रधानमंत्री के काफिले में बड़ी संख्या में वाहन शामिल होते हैं, लेकिन इस बार सीमित सुरक्षा व्यवस्था और छोटा काफिला लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। इसे प्रधानमंत्री की अपील को व्यवहार में उतारने के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के कई सांसद और विधायक अब सार्वजनिक मंचों से लोगों से कार पूलिंग अपनाने, निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाने की अपील कर रहे हैं। कुछ जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने साइकिल रैलियां भी निकाली हैं।

प्रधानमंत्री की अपील का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। 

नीट परीक्षा रद्द होने के बाद देशभर में नाराजगी, सिस्टम से गुस्साए छात्र सड़कों पर, विरोध-प्रदर्शन जारी

देशभर के लाखों मेडिकल छात्रों के सपनों पर एक बार फिर अनिश्चितता का साया छा गया है। डॉक्टर बनने की उम्मीद लेकर वर्षों तक कठिन तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए नीट स्नातक-2026 अब सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि देश की परीक्षा व्यवस्था पर उठते गंभीर सवालों का प्रतीक बन गया है। प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा परीक्षा रद्द किए जाने से छात्रों में भारी गुस्सा और निराशा है। पूरे मामले की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी गई है। देश के कई शहरों में पेपर लीक के विरोध में छात्र सड़कों पर हैं। 3 मई 2026 को आयोजित हुई इस परीक्षा में करीब 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। इनमें बड़ी संख्या उन छात्रों की थी, जिन्होंने वर्षों तक कोचिंग लेकर तैयारी की और परिवारों ने लाखों रुपये खर्च किए। लेकिन परीक्षा रद्द होने के फैसले ने छात्रों और अभिभावकों दोनों को मानसिक तनाव और अनिश्चितता में डाल दिया है। 

दिल्ली, पटना, कोटा, जयपुर, लखनऊ, भोपाल, चंडीगढ़ और चेन्नई समेत कई शहरों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए। उनका कहना है कि हर साल प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा धांधली के मामले सामने आते हैं, लेकिन जिम्मेदार लोगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती। कई छात्रों ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को भंग करने और परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की मांग उठाई है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने अपने बयान में कहा कि जांच एजेंसियों से मिले इनपुट और प्रारंभिक रिपोर्टों के आधार पर परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका बनी थी। इसी कारण सरकार की मंजूरी के बाद परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया गया।

प्रश्नपत्र लीक मामले में लगातार कार्रवाई, कई राज्यों तक पहुंची जांच

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-2026 प्रश्नपत्र लीक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो लगातार कार्रवाई कर रही है। जांच एजेंसी का कहना है कि यह मामला केवल प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे संगठित परीक्षा माफिया नेटवर्क होने की आशंका है। जांच में महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैले नेटवर्क के सुराग मिले हैं। ताजा कार्रवाई में पुणे से रसायन विज्ञान के प्रोफेसर पी.वी. कुलकर्णी को गिरफ्तार किया गया है, जिसे इस पूरे मामले का मुख्य मास्टरमाइंड माना जा रहा है। आरोप है कि उसे परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी गोपनीय जानकारी तक पहुंच थी और उसने कुछ छात्रों को परीक्षा से पहले वही सवाल और उत्तर उपलब्ध कराए, जो बाद में असली प्रश्नपत्र में आए। 

इससे पहले जयपुर से तीन, गुरुग्राम से एक, नासिक से एक तथा पुणे और अहिल्यानगर से दो अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पिछले 48 घंटों में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने देशभर के 14 ठिकानों पर छापेमारी की है। इस दौरान मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, दस्तावेज और संदिग्ध नोट्स बरामद किए गए हैं। जांच एजेंसी अब इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि क्या राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के कुछ अधिकारी भी इस नेटवर्क से जुड़े थे। सूत्रों के मुताबिक कुछ संदिग्ध अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की जा रही है। इस पूरे मामले ने छात्रों और अभिभावकों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है।

2018 से अब तक विवादों में घिरी रही देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा पर विवाद कोई नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से प्रश्नपत्र लीक, फर्जी अभ्यर्थियों, सॉल्वर गैंग और परीक्षा धांधली के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। हर बार जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, गिरफ्तारियां हुईं और सुधार के दावे किए गए, लेकिन इसके बावजूद परीक्षा की विश्वसनीयता बार-बार सवालों के घेरे में आती रही। साल 2018 में दिल्ली के वेस्ट पटेल नगर स्थित एक शिक्षण केंद्र पर आरोप लगा था कि वह छात्रों से मोटी रकम लेकर परीक्षा पास कराने का दावा करता था। इसके बाद 2021 में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने नागपुर के एक कोचिंग नेटवर्क पर कार्रवाई की, जहां असली छात्रों की जगह दूसरे अभ्यर्थियों को परीक्षा में बैठाने का मामला सामने आया। साल 2022 में फर्जी पहचान पत्र और दस्तावेजों के जरिए दूसरे लोगों से परीक्षा दिलाने का मामला सामने आया। वहीं 2024 में बिहार और झारखंड से प्रश्नपत्र लीक के आरोपों ने पूरे देश को हिला दिया था। 

बिहार की आर्थिक अपराध इकाई ने जांच के दौरान जली हुई प्रतियों से 68 सवाल बरामद किए थे, जो असली प्रश्नपत्र से मेल खाते पाए गए। मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा और बाद में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपी गई। अब 2026 में स्थिति और गंभीर हो गई है। प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद पूरी परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी, जिसे अब तक का सबसे बड़ा परीक्षा संकट माना जा रहा है। लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर बहस तेज हो गई है। बता दें कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा भारत में चिकित्सा और दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है। इसकी शुरुआत 2013 में हुई थी। 

इसी परीक्षा के जरिए देशभर के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा स्नातक, दंत चिकित्सा स्नातक, आयुष और नर्सिंग पाठ्यक्रमों में दाखिला मिलता है। देश में एक लाख से अधिक चिकित्सा स्नातक और करीब 27 हजार दंत चिकित्सा स्नातक सीटों पर प्रवेश इसी परीक्षा के माध्यम से होता है। परीक्षा सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल निगरानी, प्रश्नपत्र परिवहन और परीक्षा केंद्र प्रबंधन में बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत है। भारतीय चिकित्सा संघ ने भी केंद्र सरकार से परीक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की जवाबदेही तय करने की मांग की है। फिलहाल लाखों छात्र नई परीक्षा तारीख का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन इस पूरे विवाद ने देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कल होने वाले नगर निकाय चुनाव के लिए हिमाचल तैयार, राज्य निर्वाचन आयोग ने पूरी की तैयारियां 

हिमाचल प्रदेश में रविवार को शहरी लोकतंत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक मुकाबला होने जा रहा है। पहाड़ों की शांत वादियों से लेकर शहरों की व्यस्त गलियों तक चुनावी हलचल चरम पर पहुंच चुकी है। राज्य के 51 नगर निकायों में होने वाले मतदान को लेकर प्रशासन, राजनीतिक दल और मतदाता पूरी तरह तैयार हैं। शनिवार सुबह से ही ईवीएम मशीनों और चुनावी सामग्री के साथ पोलिंग पार्टियों की रवानगी शुरू हो गई। देर शाम तक सभी मतदान दल अपने-अपने बूथों तक पहुंच जाएंगे, जहां उन्होंने मतदान केंद्रों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया। रविवार सुबह सात बजे से मतदान शुरू होगा और शाम तक लाखों मतदाता अपने शहरों की सरकार चुनने के लिए वोट डालेंगे। 

इस बार के नगर निगम चुनाव सिर्फ स्थानीय विकास तक सीमित नहीं माने जा रहे, बल्कि इन्हें 2027 विधानसभा चुनाव से पहले का राजनीतिक सेमिफाइनल कहा जा रहा है। यही वजह है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार प्रदेश के चार नगर निगम, 25 नगर परिषद और 22 नगर पंचायतों में चुनाव कराए जा रहे हैं। कुल 449 पदों के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही थी, जिनमें से 10 पार्षद निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। अब 439 सीटों पर 1147 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनके राजनीतिक भविष्य का फैसला करीब 3 लाख 80 हजार मतदाता करेंगे। 

शनिवार को पोलिंग पार्टियों की रवानगी के दौरान जिला मुख्यालयों पर चुनावी गतिविधियां तेज रहीं। सुरक्षा व्यवस्था के बीच कर्मचारियों को ईवीएम, मतदान सामग्री और जरूरी दस्तावेज सौंपे गए। प्रशासन ने साफ निर्देश दिए हैं कि सभी मतदान केंद्रों को रात तक पूरी तरह तैयार कर लिया जाए ताकि मतदान समय पर शुरू हो सके।

नगर निगम चुनाव के लिए लगभग 3600 कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। प्रत्येक पोलिंग पार्टी में एक प्रीसाइडिंग ऑफिसर, तीन पोलिंग ऑफिसर और दो से तीन सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया है। संवेदनशील और अतिसंवेदनशील बूथों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। पुलिस प्रशासन ने चुनाव को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। प्रमुख शहरों में पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ा दी गई है। कई जगहों पर सीसीटीवी निगरानी और क्विक रिस्पॉन्स टीमों को भी सक्रिय रखा गया है। राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दावा किया है कि किसी भी तरह की गड़बड़ी से निपटने के लिए पूरी तैयारी कर ली गई है। 

चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अधिक से अधिक संख्या में मतदान करने की अपील की है। आयोग ने साफ किया कि मतदान केंद्रों पर सुरक्षा, पेयजल, बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। बुजुर्ग और दिव्यांग मतदाताओं के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। इन चुनावों में सबसे ज्यादा नजर चार नगर निगमों, सोलन, मंडी, पालमपुर और धर्मशाला पर टिकी हुई है। इन निगमों के चुनाव पार्टी चिन्ह पर हो रहे हैं, इसलिए इनके नतीजों को सीधे तौर पर कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक ताकत से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि नगर परिषद और नगर पंचायतों की मतगणना मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद शुरू हो जाएगी, लेकिन नगर निगमों के परिणाम के लिए 31 मई तक इंतजार करना होगा।

कांग्रेस-भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर, पुलिस-प्रशासन अलर्ट मोड में

नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल पिछले कई दिनों से गर्म रहा। दोनों प्रमुख दलों ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राज्य सरकार की नीतियों और विकास कार्यों को भी चुनावी एजेंडा बनाया। कांग्रेस जहां विकास, शहरी सुविधाओं और नई योजनाओं को लेकर जनता के बीच गई, वहीं भाजपा ने कानून व्यवस्था, महंगाई और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। कांग्रेस सीएम सुक्खू, पार्टी प्रभारी रजनी पाटिल और डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री समेत सभी मंत्रियों को चुनाव में उतारा है। 

इसी तरह, बीजेपी अध्यक्ष राजीव बिंदल, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर, पार्टी प्रभारी श्रीकांत शर्मा और सांसद अनुराग ठाकुर ने भी प्रचार किया है। इन चुनावों के नतीजे आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। खासकर नगर निगमों में जीत-हार को 2027 विधानसभा चुनाव के संकेत के तौर पर देखा जाएगा। प्रशासन की ओर से मतदान को निष्पक्ष बनाने के लिए शराब बिक्री पर निगरानी बढ़ाई गई है। कई जिलों में पुलिस ने फ्लैग मार्च भी निकाला। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है ताकि मतदान के दौरान किसी तरह की अप्रिय घटना न हो। 

राज्य निर्वाचन आयोग ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि मतदान प्रक्रिया में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मतदान केंद्रों पर मोबाइल फोन के इस्तेमाल और भीड़ नियंत्रण को लेकर भी सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। अब सबकी नजर रविवार को होने वाले मतदान पर टिकी है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता करेंगे। हिमाचल के शहरों में कल सिर्फ पार्षद नहीं चुने जाएंगे, बल्कि आने वाले राजनीतिक समीकरणों की भी मजबूत नींव रखी जाएगी।

हिमाचल पंचायत चुनाव में नामांकन के आज आखिरी दिन उमड़ी भारी भीड़, ढोल-नगाड़ों के साथ पहुंचे उम्मीदवार

हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां अब चरम पर पहुंच गई हैं। गांवों की गलियों से लेकर पंचायत मुख्यालयों तक चुनावी माहौल पूरी तरह रंग में नजर आ रहा है। राज्यभर में रविवार को नामांकन प्रक्रिया के अंतिम दिन उम्मीदवारों और उनके समर्थकों की भारी भीड़ उमड़ी। कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई दी तो कहीं समर्थकों ने शक्ति प्रदर्शन करते हुए अपने प्रत्याशियों के समर्थन में जुलूस निकाले। पंचायत चुनाव भले ही स्थानीय स्तर के हों, लेकिन इस बार गांवों में मुकाबला बेहद दिलचस्प और प्रतिष्ठा का बन गया है।प्रदेश के कई जिलों में नामांकन केंद्रों के बाहर सुबह से ही लंबी कतारें देखने को मिलीं। उम्मीदवार समर्थकों के साथ पारंपरिक वाद्ययंत्रों और नारों के बीच नामांकन भरने पहुंचे। ग्रामीण इलाकों में चुनावी माहौल किसी बड़े राजनीतिक उत्सव से कम नजर नहीं आ रहा। 

पंचायत चुनावों में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी इस बार खास तौर पर बढ़ी है, जिससे मुकाबला और भी रोचक हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार 7 और 8 मई तक 42 हजार 562 उम्मीदवार विभिन्न पदों के लिए नामांकन दाखिल कर चुके थे। इनमें प्रधान, उप प्रधान, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के उम्मीदवार शामिल हैं। आज अंतिम दिन बड़ी संख्या में दावेदारों के पहुंचने से यह आंकड़ा 60 हजार के पार जाने की संभावना जताई जा रही है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 12 मई को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। इसके बाद 14 और 15 मई को उम्मीदवार अपने नाम वापस ले सकेंगे। चुनाव आयोग ने साफ किया है कि तय समय सीमा के बाद किसी भी प्रकार का बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस बार पंचायत चुनावों में चुनाव चिह्न को लेकर भी खास दिलचस्पी देखने को मिल रही है। राज्य निर्वाचन आयोग ने पहले ही सभी पदों के लिए चुनाव चिह्न तय कर दिए हैं। 15 मई को दोपहर तीन बजे सभी उम्मीदवारों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाएंगे। 

आयोग के अनुसार किसी भी उम्मीदवार को अपनी पसंद का चुनाव चिह्न नहीं मिलेगा। हिंदी वर्णमाला के अनुसार उम्मीदवारों के नामों के आधार पर आयोग द्वारा निर्धारित चुनाव चिह्न दिए जाएंगे। प्रदेश की 3754 पंचायतों में कुल 31 हजार 214 पदों के लिए चुनाव कराए जा रहे हैं। इनमें 3754 प्रधान, 3754 उप प्रधान, 21 हजार 654 वार्ड सदस्य, 1769 बीडीसी सदस्य और 251 जिला परिषद सदस्य शामिल हैं। यही वजह है कि इस बार पंचायत चुनावों को लेकर गांव-गांव में गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है। पंचायत चुनावों को लेकर प्रशासन ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं। मतदान केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। संवेदनशील और अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन लगातार बैठकें कर रहा है।

तीन चरणों में होगी वोटिंग, 50 लाख से ज्यादा मतदाता करेंगे फैसला

हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव तीन चरणों में कराए जाएंगे। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार 26, 28 और 30 मई को मतदान होगा। मतदान को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी से प्रचार अभियान तेज हो गया है। प्रत्याशी घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं, जबकि समर्थक सोशल मीडिया और स्थानीय बैठकों के जरिए माहौल बनाने में जुटे हैं। इन चुनावों में प्रदेश के 50 लाख से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। पंचायत चुनावों को ग्रामीण विकास और स्थानीय नेतृत्व तय करने की दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। यही कारण है कि हर पंचायत में मुकाबला काफी दिलचस्प होता जा रहा है।

चुनाव आयोग ने मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मतदान केंद्रों पर सुरक्षा, पेयजल, बिजली और अन्य जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया है। 

प्रशासन ने अधिकारियों को निष्पक्ष मतदान कराने के निर्देश दिए हैं। मतगणना को लेकर भी विस्तृत योजना तैयार की गई है। प्रधान, उप प्रधान और वार्ड सदस्य पदों की मतगणना मतदान वाले दिन ही पंचायत भवन में की जाएगी। वहीं जिला परिषद और बीडीसी सदस्यों की मतगणना 31 मई को होगी। चुनाव परिणामों के साथ ही प्रदेश की नई पंचायत सरकारों की तस्वीर साफ हो जाएगी। पंचायत चुनावों के नतीजे आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं। कई बड़े नेता अपने समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतार चुके हैं। यही वजह है कि स्थानीय चुनाव होने के बावजूद इनका राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है।

ग्रामीण इलाकों में इस बार विकास, सड़क, पानी, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। कई जगह युवाओं ने पारंपरिक राजनीति को चुनौती देते हुए चुनावी मैदान में कदम रखा है। वहीं महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को भी पंचायत राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अब नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सभी की नजरें उम्मीदवारों की अंतिम सूची और चुनाव प्रचार पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में हिमाचल के गांवों में चुनावी हलचल और तेज होने वाली है।

दुनिया में बढ़ते युद्ध संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा बेहद अहम, 13 मई को ट्रंप और शी जिनपिंग की होगी मुलाकात 

दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर खड़ी है। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक राजनीति को हिला दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव ने तेल सप्लाई को प्रभावित किया है, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। दूसरी ओर ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका आमने-सामने हैं। ऐसे माहौल में जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध जैसी आशंकाओं से घिरी हुई है, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा अचानक वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप 13 से 15 मई तक चीन की राजकीय यात्रा पर जाएंगे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निमंत्रण पर होने वाली यह यात्रा करीब नौ वर्षों में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा होगी। 

चीन के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को इसकी औपचारिक घोषणा की। इस ऐलान के बाद दुनिया की निगाहें अब बीजिंग पर टिक गई हैं, क्योंकि यह यात्रा सिर्फ दो देशों की मुलाकात नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की दिशा तय करने वाली बैठक मानी जा रही है। ट्रंप ऐसे समय चीन पहुंच रहे हैं जब दोनों देशों के बीच कई मोर्चों पर तनाव चरम पर है। अमेरिका लगातार ताइवान का समर्थन कर रहा है, जबकि चीन इसे अपनी संप्रभुता का मुद्दा मानता है। दक्षिण चीन सागर में सैन्य गतिविधियां बढ़ चुकी हैं। व्यापार युद्ध और टैरिफ विवाद पहले से ही दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर चुके हैं। इसके बावजूद ट्रंप का बीजिंग जाना यह संकेत दे रहा है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें टकराव के बीच संवाद का रास्ता खुला रखना चाहती हैं। 

व्हाइट हाउस की प्रिंसिपल डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी एना केली ने रविवार को कहा कि ट्रंप बुधवार शाम बीजिंग पहुंचेंगे। उन्होंने इस यात्रा को “बेहद प्रतीकात्मक महत्व वाली यात्रा” बताया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात में अमेरिका और चीन के बीच सीधी बातचीत बेहद जरूरी हो गई है। हांगकांग के प्रतिष्ठित अखबार ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप गुरुवार को राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भव्य स्वागत समारोह में शामिल होंगे। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी जिसमें व्यापार, ऊर्जा संकट, ताइवान, सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा ट्रंप बीजिंग स्थित ऐतिहासिक ‘टेम्पल ऑफ हेवन’ का दौरा भी करेंगे। चीन की ओर से उनके सम्मान में राजकीय भोज का आयोजन किया जाएगा। शुक्रवार को दोनों नेताओं के बीच एक और विशेष बैठक होगी, जिसमें द्विपक्षीय चाय बैठक और कार्यकारी लंच रखा गया है। 

माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों देशों के बीच कुछ बड़े समझौते या साझा घोषणाएं भी सामने आ सकती हैं। अमेरिकी प्रशासन ने यह भी संकेत दिया है कि साल के अंत तक राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जवाबी अमेरिका यात्रा की योजना बनाई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो यह दोनों देशों के बीच रिश्तों में नई शुरुआत का संकेत माना जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का बड़ा अध्याय बनने जा रही है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच होने वाली यह मुलाकात आने वाले वर्षों की राजनीति, व्यापार और सुरक्षा रणनीति तय कर सकती है।

व्यापार युद्ध से वैश्विक राजनीति तक, ट्रंप-शी मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजर

ट्रंप की चीन यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितता से गुजर रही है। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहा टैरिफ विवाद वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर चुका है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां चीन से अपने कारोबार हटाने लगी थीं, वहीं चीन ने भी अमेरिकी कंपनियों पर दबाव बढ़ाया था। अब दोनों देशों के बीच संभावित व्यापार समझौते की उम्मीदें फिर से मजबूत होती दिखाई दे रही हैं। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि यह वार्ता दोनों नेताओं के बीच पहले हुई फोन बातचीत और दक्षिण कोरिया में हुई चर्चाओं के आधार पर आगे बढ़ेगी। बयान में कहा गया कि बातचीत का उद्देश्य आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर “महत्वपूर्ण सहमति” बनाना है। इसी कड़ी में चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग 12 और 13 मई को दक्षिण कोरिया जाएंगे, जहां वे अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ अहम व्यापार वार्ता करेंगे। 

माना जा रहा है कि यह बैठक ट्रंप की चीन यात्रा से पहले अंतिम तैयारी होगी। अगर इन वार्ताओं में सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो दोनों देशों के बीच टैरिफ में राहत और व्यापारिक प्रतिबंधों में ढील की घोषणा हो सकती है। अमेरिका और चीन दोनों इस समय आर्थिक दबाव झेल रहे हैं। अमेरिका में महंगाई और ऊर्जा संकट बढ़ रहा है, जबकि चीन की अर्थव्यवस्था भी धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। ऐसे में दोनों देशों के लिए तनाव कम करना जरूरी हो गया है। हालांकि ताइवान का मुद्दा अब भी सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। चीन लगातार कहता रहा है कि ताइवान उसका हिस्सा है और किसी भी बाहरी दखल को वह बर्दाश्त नहीं करेगा। 

वहीं अमेरिका ताइवान को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देता रहा है। यही वजह है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात में ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दा रहने वाला है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव भी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय है। दुनिया के बड़े हिस्से को तेल सप्लाई इसी रास्ते से होती है। अगर हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि ट्रंप और शी इस मुद्दे पर भी साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर सकते हैं। दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या यह यात्रा अमेरिका और चीन के रिश्तों में नई शुरुआत साबित होगी या फिर यह केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात बनकर रह जाएगी। लेकिन इतना तय है कि बीजिंग में होने वाली यह बैठक आने वाले समय की वैश्विक राजनीति का रुख बदलने की क्षमता रखती है।

विकास की पटरी पर उत्तराखंड, अगले साल से शुरू होगा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल ट्रैक 

पहाड़ों में सफर हमेशा से चुनौती और धैर्य की परीक्षा रहा है। संकरी सड़कें, मौसम की मार और लंबा समय ये सब उत्तराखंड के लोगों और यहां आने वाले यात्रियों की रोजमर्रा की कहानी का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब यह तस्वीर बदलने जा रही है। वर्षों से इंतजार में रही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ एक रेल लाइन नहीं, बल्कि पहाड़ों के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। उत्तराखंड के लिए यह परियोजना विकास, सुविधा और सुरक्षा का नया अध्याय लिखने जा रही है। वर्ष 2027 की शुरुआत में इस मार्ग पर परीक्षण रेल चलाने की तैयारी है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि अब यह सपना साकार होने के बेहद करीब है। 125 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के शुरू होने के बाद ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक का सफर, जो अभी करीब 6 घंटे लेता है, वह घटकर लगभग 2 घंटे में पूरा हो सकेगा।इस परियोजना का सीधा लाभ देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली जैसे महत्वपूर्ण जिलों को मिलेगा। 

मई 2026 से शिवपुरी और ब्यासी के बीच लगभग 13 किलोमीटर लंबे हिस्से पर पटरियां बिछाने का काम शुरू किया जा रहा है। यही वह खंड होगा, जहां सबसे पहले परीक्षण रेल दौड़ाई जाएगी। अधिकारियों का अनुमान है कि दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 तक यह परीक्षण संभव हो सकेगा, जबकि पूरी परियोजना को वर्ष 2028 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस रेल परियोजना की लागत भी समय के साथ बढ़ी है। शुरुआत में जहां इसकी लागत 16,216 करोड़ रुपये आंकी गई थी, वहीं अब निर्माण की चुनौतियों और तकनीकी बदलावों के कारण यह बढ़कर लगभग 38 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। पहाड़ी क्षेत्र में निर्माण कार्य करना अपने आप में जटिल होता है, और यही वजह है कि इस परियोजना को विशेष इंजीनियरिंग के साथ तैयार किया जा रहा है। पूरे मार्ग का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा, जो इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत है। कुल 16 मुख्य और 12 सहायक सुरंगों का निर्माण किया जा रहा है, जिनमें से अधिकतर का काम पूरा हो चुका है। इसके अलावा 19 बड़े और 31 छोटे पुल भी बनाए जा रहे हैं, जो इस रेल लाइन को मजबूत और सुरक्षित बनाएंगे।

परियोजना के तहत कुल 13 रेलवे स्टेशन विकसित किए जा रहे हैं। ऋषिकेश के वीरभद्र और योगनगरी स्टेशन अभी से सक्रिय हैं, जबकि अन्य स्थानों पर तेजी से काम चल रहा है। कर्णप्रयाग को इस मार्ग का प्रमुख केंद्र बनाया जाएगा, जहां बड़े स्तर पर रेल सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इस परियोजना की एक खास बात यह भी है कि परीक्षण के लिए इंजन और डिब्बे को शिवपुरी-ब्यासी खंड पर ही तैयार किया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर ही तकनीकी परीक्षण किया जा सके। यह कदम सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। यह रेल लाइन न केवल दूरी कम करेगी, बल्कि खराब मौसम और भूस्खलन के दौरान भी संपर्क बनाए रखने में मदद करेगी। इससे सड़क मार्ग पर निर्भरता कम होगी और लोगों को एक भरोसेमंद विकल्प मिलेगा।

चारधाम यात्रा से लेकर अर्थव्यवस्था तक, हर क्षेत्र में दिखेगा असर

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का सबसे बड़ा प्रभाव चारधाम यात्रा पर पड़ेगा। अभी जहां यात्रियों को लंबा और थकाऊ सफर तय करना पड़ता है, वहीं रेल सुविधा आने के बाद यह यात्रा काफी हद तक आसान हो जाएगी। रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग तक तेज पहुंच होने से बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा का समय कई घंटों तक घट जाएगा। इससे श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी और यात्रा अधिक व्यवस्थित हो सकेगी। इसके अलावा सड़क मार्ग पर दबाव भी कम होगा। वर्तमान में भारी संख्या में वाहन एक ही मार्ग पर चलते हैं, जिससे जाम और दुर्घटनाओं की संभावना बनी रहती है। रेल सेवा शुरू होने के बाद यह दबाव कम होगा और यात्रा अधिक सुरक्षित बनेगी। पर्यटन के लिहाज से भी यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड के दूरस्थ और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर क्षेत्रों तक पहुंच आसान होने से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी। इसका सीधा असर स्थानीय व्यवसायों पर पड़ेगा। होटल, परिवहन, गाइड और छोटे व्यापारियों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। 

रेल लाइन का एक और बड़ा फायदा यह होगा कि यह हर मौसम में संपर्क बनाए रखने में सक्षम होगी। पहाड़ों में बारिश और भूस्खलन के कारण सड़कें अक्सर बंद हो जाती हैं, जिससे लोगों को भारी परेशानी होती है। रेल सेवा इन परिस्थितियों में भी एक स्थिर विकल्प प्रदान करेगी। आपदा के समय यह परियोजना जीवन रक्षक साबित हो सकती है। राहत और बचाव कार्यों को तेज करने में मदद मिलेगी और आवश्यक सामान को प्रभावित क्षेत्रों तक जल्दी पहुंचाया जा सकेगा। यह परियोजना केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। 

करीब 100 साल पहले देखे गए इस सपने को अब साकार होते देखना अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण है। 1927 में दरवान सिंह नेगी द्वारा किए गए पहले सर्वे से लेकर आज तक इस परियोजना ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पहाड़ों में रेल को जरूरी बताया था। लंबे समय तक यह योजना ठहराव में रही, लेकिन अब यह तेजी से आगे बढ़ रही है। 2019 में केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी मिलने के बाद काम में तेजी आई और तमाम चुनौतियों के बावजूद परियोजना लगातार आगे बढ़ती रही। आज जब इसका अधिकांश हिस्सा पूरा हो चुका है, तो यह साफ है कि आने वाले समय में यह रेल लाइन उत्तराखंड के विकास की रीढ़ बनेगी। कुल मिलाकर, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना न केवल एक परिवहन सुविधा है, बल्कि यह उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक जीवन को नई दिशा देने वाली पहल है। आने वाले वर्षों में यह परियोजना राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

चारधाम यात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब, 11वें दिन 4 लाख पार, केदारनाथ मंदिर में सबसे ज्यादा पहुंच रहे श्रद्धालु

उत्तराखंड की वादियों में एक ओर जहां मौसम ने करवट लेकर गर्मी से राहत दी है, वहीं दूसरी ओर आस्था का ज्वार अपने चरम पर है। चारधाम यात्रा के 11वें दिन श्रद्धालुओं की संख्या ने नया रिकॉर्ड छू लिया है। अब तक 4 लाख से अधिक भक्त बाबा केदार, बद्रीविशाल, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन कर चुके हैं। जिला प्रशासन के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस बार भी केदारनाथ धाम श्रद्धालुओं की पहली पसंद बना हुआ है। यहां अब तक 2 लाख 7 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। कठिन चढ़ाई और मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ है। 

प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां लगातार व्यवस्थाओं को दुरुस्त बनाए रखने में जुटी हैं। वहीं बद्रीनाथ धाम में भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। अब तक यहां 1 लाख 58 हजार से अधिक लोग दर्शन कर चुके हैं। सड़क मार्ग से सुगम पहुंच और बेहतर व्यवस्थाओं के कारण बद्रीनाथ में भी भीड़ लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में भी श्रद्धालुओं की संख्या 1 लाख के पार पहुंच चुकी है, जो इस बार यात्रा की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।चारधाम यात्रा के दौरान इस बार प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। यात्रा मार्गों पर मेडिकल कैंप, सुरक्षा बलों की तैनाती, ट्रैफिक मैनेजमेंट और रजिस्ट्रेशन सिस्टम को पहले से ज्यादा मजबूत किया गया है। हेलीकॉप्टर सेवाओं के जरिए भी श्रद्धालुओं को सुविधा दी जा रही है, जिससे बुजुर्ग और अस्वस्थ यात्री भी आसानी से दर्शन कर पा रहे हैं। हालांकि, बढ़ती भीड़ के साथ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। 

खासकर केदारनाथ मार्ग पर पैदल यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण भीड़ प्रबंधन एक बड़ी जिम्मेदारी बन गया है। प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि वे तय नियमों का पालन करें और मौसम की जानकारी लेकर ही यात्रा करें। स्थानीय कारोबारियों के लिए भी यह यात्रा आर्थिक संजीवनी लेकर आई है। होटल, ढाबे, टूर ऑपरेटर और स्थानीय दुकानदारों की आमदनी में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। वहीं सरकार भी इस यात्रा को सुरक्षित और सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

उत्तराखंड में बदला मौसम, बारिश-ओलावृष्टि और बर्फबारी का अलर्ट

भीषण गर्मी से जूझ रहे उत्तराखंड के लोगों को अब राहत मिली है। राज्य के कई जिलों में हुई बारिश ने तापमान में गिरावट ला दी है और मौसम सुहावना हो गया है। मौसम विज्ञान केंद्र ने आने वाले दिनों में और भी तेज बदलाव के संकेत दिए हैं। मौसम विभाग के अनुसार, नैनीताल, देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में कहीं-कहीं भारी बारिश और ओलावृष्टि का ‘तीव्र दौर’ देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और आकाशीय बिजली गिरने की भी संभावना जताई गई है। ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम और ज्यादा सख्त हो सकता है। 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी की प्रबल संभावना है, जिससे तापमान में अचानक गिरावट आ सकती है। 

इसका असर चारधाम यात्रा मार्गों पर भी देखने को मिल सकता है, खासकर केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों के लिए मौसम विभाग ने यलो अलर्ट जारी किया है। यहां तेज हवाओं के साथ हल्की बारिश और बिजली चमकने की संभावना है। प्रशासन ने लोगों को सतर्क रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है। मंगलवार को राज्य के 9 जिलों में बारिश दर्ज की गई। इनमें अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और देहरादून शामिल हैं। वहीं चंपावत और पौड़ी जिलों में ओलावृष्टि भी हुई, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। 

बागेश्वर जिले में आए आंधी-तूफान ने खासा नुकसान पहुंचाया है। तेज हवाओं के चलते कई पेड़ उखड़ गए और टीन की छतें उड़ गईं। इस घटना में तीन लोग घायल हो गए, जिन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मौसम विभाग और प्रशासन ने खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और यात्रियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। अचानक बदलते मौसम के कारण भूस्खलन और रास्तों के बाधित होने का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में यात्रा से पहले मौसम की जानकारी लेना बेहद जरूरी हो गया है। जहां एक तरफ बारिश ने गर्मी से राहत दी है, वहीं दूसरी ओर यह बदलता मौसम सावधानी की भी मांग कर रहा है, खासकर उन लोगों के लिए जो चारधाम यात्रा पर निकले हुए हैं या जाने की योजना बना रहे हैं।

इरफान खान की 6वीं पुण्यतिथि : पर्दे का वो सितारा, जिसकी चमक आज भी बरकरार है, प्रशंसकों ने अपने चहेते अभिनेता को दी श्रद्धांजलि 

29 अप्रैल भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक गहरी खाली जगह का एहसास भी है। आज महान अभिनेता इरफान खान की छठी पुण्यतिथि है। साल 2020 में इसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा था, लेकिन उनका काम, उनकी अदाकारी और उनका व्यक्तित्व आज भी करोड़ों दिलों में सांस ले रहा है। सोशल मीडिया पर आज सुबह से ही उनके प्रशंसक उन्हें याद कर भावुक हो रहे हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।इरफान खान उन कलाकारों में से थे, जिन्होंने अभिनय को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक सच्चाई की तरह जिया। उन्होंने अपने करियर में करीब 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और हर किरदार को इस तरह निभाया कि वह हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में बस गया। उनकी खासियत यह थी कि वह किसी भी भूमिका में खुद को पूरी तरह ढाल लेते थे, चाहे वह आम आदमी का किरदार हो या फिर कोई जटिल और गहरा व्यक्तित्व।

राजस्थान के टोंक में जन्मे इरफान खान का सफर आसान नहीं रहा। 

उन्होंने नेशनल स्कूल ड्रामा से अभिनय की पढ़ाई की और इसके बाद टीवी से अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्हें छोटे-छोटे रोल मिले, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। धीरे-धीरे अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर उन्होंने बॉलीवुड में एक अलग पहचान बनाई। उनकी फिल्म पान सिंह तोमर ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इस फिल्म में उनके अभिनय को इतना सराहा गया कि उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा The Lunchbox, Maqbool, Hindi Medium, Life of Pi और Haider जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई। 

इरफान खान की अदाकारी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी और गहराई थी। वह बिना ज्यादा संवाद बोले ही अपने चेहरे के भाव और आंखों से पूरी कहानी कह देते थे। उनके अभिनय में एक सच्चाई होती थी, जो सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंचती थी। यही वजह है कि वह हर उम्र और हर वर्ग के दर्शकों के पसंदीदा बन गए। साल 2018 में इरफान खान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारी का पता चला। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इलाज के दौरान भी अपने काम के प्रति समर्पित रहे। उनकी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम थी, जो उनके निधन से कुछ समय पहले ही रिलीज हुई थी।

संघर्ष से शिखर तक, इरफान खान की जिंदगी और अभिनय की विरासत

इरफान खान का पूरा नाम साहबजादे इरफान अली खान था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत छोटे पर्दे से की, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों में काम किया। लेकिन उनका सपना हमेशा बड़े पर्दे पर अपनी पहचान बनाने का था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने अभिनय से यह साबित कर दिया कि एक कलाकार की असली ताकत उसके हुनर में होती है, न कि उसकी पृष्ठभूमि में। इरफान खान ने सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं, बल्कि हॉलीवुड में भी अपनी छाप छोड़ी। Slumdog Millionaire, Jurassic World और Inferno जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में उन्होंने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। 

वह उन चुनिंदा भारतीय कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने विश्व सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बीमारी से जूझते हुए भी उन्होंने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया, वह लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। 29 अप्रैल 2020 को मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फैंस उनके डायलॉग, सीन और तस्वीरें साझा कर उन्हें याद कर रहे हैं। 

कई लोगों के लिए इरफान खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक भावना थे, एक ऐसा कलाकार, जिसने सिनेमा को नई ऊंचाई दी। इरफान खान की विरासत उनके काम में हमेशा जिंदा रहेगी। उन्होंने यह साबित किया कि सच्चा कलाकार वही होता है, जो अपने अभिनय से लोगों के दिलों को छू ले। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनका अभिनय हमेशा हमें उनकी याद दिलाते रहेंगे।

Ganga Expressway : यूपी का सबसे लंबा 594 किलोमीटर गंगा एक्सप्रेसवे का आज पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन, 12 जिलों से होकर गुजरेगा

इंतजार खत्म । आखिरकार उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे आज शुरू होने जा रहा है। यूपी आज एक ऐतिहासिक बुनियादी ढांचा उपलब्धि का साक्षी बनने जा रहा है, जब नरेंद्र मोदी हरदोई में यूपी के सबसे लंबे और आधुनिक एक्सप्रेसवे में से एक गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना सिर्फ एक सड़क नहीं बल्कि प्रदेश के आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास की नई धुरी मानी जा रही है। 594 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्वी हिस्सों से जोड़ते हुए एक हाई-स्पीड कॉरिडोर का निर्माण करता है, जो प्रदेश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने की क्षमता रखता है। कार्यक्रम को लेकर हरदोई में व्यापक तैयारियां की गई हैं और जनसभा स्थल को भव्य रूप दिया गया है।

इस एक्सप्रेसवे का 99 किलोमीटर हिस्सा हरदोई जिले से होकर गुजरता है, जिससे यह क्षेत्र सीधे विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। 

कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहेंगे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं एसपीजी के साथ हजारों पुलिसकर्मी तैनात हैं। बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मियों की भी ड्यूटी लगाई गई है, जिससे आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया जा सके। इस कार्यक्रम में करीब डेढ़ लाख लोगों के जुटने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सीधे हरदोई पहुंचेंगे, जहां वे इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लोकार्पण करेंगे और जनसभा को संबोधित करेंगे। यह दौरा राजनीतिक और विकासात्मक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया गंगा एक्सप्रेसवे 6-लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे है, जिसे भविष्य में 8-लेन तक विस्तारित किया जा सकता है। 

यह मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जैसे 12 जिलों को जोड़ता है। इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने से मेरठ से प्रयागराज के बीच यात्रा समय में भारी कमी आएगी – जहां पहले 10 से 12 घंटे लगते थे, अब यह दूरी लगभग 6 घंटे में तय की जा सकेगी। इससे यात्रियों को समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। परियोजना की एक खास विशेषता शाहजहांपुर में बनी 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन हवाई पट्टी है, यह देश का पहला ऐसा एक्सप्रेसवे है जहां जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान भी उतर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। गंगा एक्सप्रेसवे को एक बड़े आर्थिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है । इसके किनारे करीब 2,635 हेक्टेयर क्षेत्र में औद्योगिक और लॉजिस्टिक हब बनाए जाएंगे, जिससे उद्योगों को नई गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

गंगा एक्सप्रेसवे से प्रदेश की बदलेगी विकास की तस्वीर

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने से उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है। यह परियोजना सिर्फ यात्रा को आसान बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम करेगी। सबसे बड़ा फायदा लॉजिस्टिक्स सेक्टर को होगा । माल ढुलाई तेज और सस्ती होगी, जिससे उद्योगों की लागत घटेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे प्रदेश में निवेश आकर्षित होगा और नए उद्योग स्थापित होंगे। किसानों के लिए भी यह एक्सप्रेसवे बेहद फायदेमंद साबित होगा । उन्हें अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने में कम समय लगेगा और बेहतर कीमत मिलेगी। 

इससे उनकी आय में वृद्धि होगी। पर्यटन के क्षेत्र में भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा । मेरठ से प्रयागराज तक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंच आसान होगी, जिससे पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलेगा। रोजगार के लिहाज से भी यह परियोजना अहम है, निर्माण के दौरान हजारों लोगों को काम मिला और आगे भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर बनेंगे। 

यह एक्सप्रेसवे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, जेवर लिंक एक्सप्रेसवे और प्रस्तावित मेरठ-हरिद्वार कॉरिडोर से जुड़कर एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनेगा। इससे उत्तर प्रदेश में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी मजबूत होगी। गंगा एक्सप्रेसवे एक परिवर्तनकारी पहल के रूप में उभर रहा है । यह न केवल आवागमन को आसान बनाएगा बल्कि औद्योगिक विकास, कृषि उन्नति और क्षेत्रीय संतुलन को भी नई दिशा देगा। आने वाले समय में यह परियोजना प्रदेश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ साबित हो सकती है।

गंगा एक्सप्रेसवे शुरू होते ही यूपी में हो जाएंगे आठ बड़े एक्सप्रेसवे

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने के साथ उत्तर प्रदेश का एक्सप्रेसवे नेटवर्क और मजबूत हो गया है। इस नए कॉरिडोर के जुड़ने के बाद अब प्रदेश में कुल 8 प्रमुख एक्सप्रेसवे हो गए हैं, जो राज्य को देश के सबसे बेहतर सड़क नेटवर्क वाले राज्यों में शामिल करते हैं। इनमें यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे (आंशिक रूप से चालू), दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और अब गंगा एक्सप्रेसवे शामिल हैं। 

इन सभी परियोजनाओं ने मिलकर उत्तर प्रदेश में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी का मजबूत जाल तैयार किया है। जिससे यात्रा समय में भारी कमी आएगी। साथ ही यह एक्सप्रेसवे पश्चिम, मध्य और पूर्वी यूपी को एक साथ जोड़कर आर्थिक गतिविधियों को नई गति देगा। इन एक्सप्रेसवे के जरिए औद्योगिक निवेश बढ़ेगा, लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और किसानों को बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। आने वाले समय में प्रस्तावित और निर्माणाधीन एक्सप्रेसवे भी जुड़ने से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे हब बनता जा रहा है।