हिमाचल का लाहौल-स्पीति में बांध विवाद बना बड़ी चुनौती : कोकसर बंद से पर्यटक परेशान, पीक सीजन में सैलानियों की वापसी
हिमाचल प्रदेश का शांत, बर्फीली वादियों से घिरा लाहौल-स्पीति इन दिनों सियासत और जनआंदोलन के बीच उलझा हुआ है। गर्मियों की शुरुआत के साथ ही जहां देशभर से पर्यटक ठंडी हवाओं और बर्फ के दीदार के लिए इस क्षेत्र की ओर रुख करते हैं, वहीं इस बार हालात कुछ अलग हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे कोकसर में डिंफुक नाले पर प्रस्तावित बांध को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध तेज हो गया है, जिसका सीधा असर पर्यटन गतिविधियों पर पड़ रहा है। हर साल अप्रैल-मई के महीने में जैसे ही मैदानी इलाकों में तापमान बढ़ता है, हिमाचल की पहाड़ियां राहत की तलाश में आने वाले सैलानियों से भर जाती हैं। लेकिन इस बार कोकसर में पसरी खामोशी पर्यटकों को हैरान कर रही है। बर्फ देखने की उम्मीद लेकर पहुंचे लोग न तो चाय की दुकानों पर रुक पा रहे हैं और न ही ढाबों में खाना मिल रहा है।
स्थानीय व्यापारियों और ग्रामीणों ने 25 अप्रैल तक पूर्ण बंद का एलान किया है, जिससे पूरे इलाके की रौनक अचानक थम सी गई है। डिंफुक नाले पर बांध निर्माण के खिलाफ उठी यह आवाज अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परियोजना न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि उनकी आजीविका पर भी गहरा असर डालेगी। कोकसर जैसे पर्यटन-आधारित क्षेत्र में होटल, ढाबे और छोटी दुकानें ही लोगों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। ऐसे में लंबे समय तक बंद रहने से आर्थिक संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
पर्यटकों के लिए यह स्थिति निराशाजनक बन गई है। कई सैलानी जो दूर-दराज से यहां पहुंचे, उन्हें बिना ठहराव के ही वापस लौटना पड़ रहा है। सड़क किनारे ठहरने, गर्म चाय पीने या स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने का अनुभव इस बार अधूरा रह गया है। कुछ पर्यटक तो सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर कर रहे हैं, जहां वे इस अप्रत्याशित बंद को अपनी यात्रा के लिए बड़ा झटका बता रहे हैं। स्थानीय प्रशासन और सरकार के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय बन गई है। एक ओर विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का दबाव है, तो दूसरी ओर जनता की भावनाओं और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने की चुनौती है। अभी तक इस मामले में कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है, जिससे असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
ग्रामीणों का आरोप- बांध परियोजना से जल स्रोतों पर असर पड़ेगा
कोकसर में जारी विरोध ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय समुदाय अपनी जमीन और पर्यावरण को लेकर बेहद संवेदनशील है। ग्रामीणों का आरोप है कि बांध परियोजना से जल स्रोतों पर असर पड़ेगा और भूस्खलन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, उनका यह भी मानना है कि इससे क्षेत्र की पारंपरिक जीवनशैली पर खतरा मंडराने लगेगा। पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों के लिए यह समय आमतौर पर सबसे व्यस्त होता है। होटल मालिक, टैक्सी चालक और छोटे दुकानदार पूरे साल इसी सीजन का इंतजार करते हैं। लेकिन इस बार विरोध के चलते उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। कई व्यापारियों ने कहा कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
प्रशासन की ओर से स्थिति को संभालने की कोशिशें जारी हैं। अधिकारियों का कहना है कि वे स्थानीय लोगों से बातचीत कर रहे हैं और उनकी चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, अभी तक कोई ठोस आश्वासन सामने नहीं आया है, जिससे आंदोलन थमने के संकेत नहीं मिल रहे। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस को तेज कर दिया है। जहां एक ओर बुनियादी ढांचे के विकास की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और स्थानीय लोग किस तरह इस मुद्दे का समाधान निकालते हैं। फिलहाल, कोकसर की बंद पड़ी दुकानें और खाली सड़कें यह कहानी बयां कर रही हैं कि जब विकास और स्थानीय हित टकराते हैं, तो सबसे ज्यादा असर आम जनजीवन और पर्यटन पर पड़ता है।

