मौसम विभाग का कमजोर मानसून का अलर्ट, सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान, जल संकट और गर्मी दोनों बढ़ा सकते हैं परेशानी

देश में इस वर्ष मानसून को लेकर मौसम विभाग का ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने नवीनतम पूर्वानुमान में कहा है कि वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देशभर में औसत वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। विभाग के अनुसार जून से सितंबर तक होने वाली कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। पूर्वानुमान में चार प्रतिशत तक की त्रुटि की संभावना भी जताई गई है, लेकिन इसके बावजूद संकेत यही हैं कि इस बार मानसून कमजोर रह सकता है। मौसम विभाग के इस अनुमान ने किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी आज भी खेती और पेयजल के लिए मानसून पर निर्भर है। विशेष रूप से वे इलाके जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहां कम बारिश का सीधा असर फसलों की बुआई और उत्पादन पर पड़ सकता है। सामान्य से कम वर्षा की स्थिति में धान, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका है। 

मौसम विभाग के अनुसार इस बार मानसून का असर देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में दिखाई देगा। उत्तर-पूर्वी भारत में वर्षा सामान्य रहने की संभावना जताई गई है। यहां वर्षा दीर्घकालिक औसत के 94 से 106 प्रतिशत के बीच रह सकती है। दूसरी ओर मध्य भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका व्यक्त की गई है। उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश औसत से नीचे रह सकती है। मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि मानसून कोर क्षेत्र, जहां देश की अधिकांश वर्षा आधारित खेती होती है, वहां भी बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना अधिक है।

देश के अधिकांश हिस्सों में जून से सितंबर के दौरान कमजोर मानसून की स्थिति देखने को मिल सकती है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में राहत के संकेत भी हैं। मौसम विभाग का अनुमान है कि उत्तर-पश्चिम भारत, उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्सों, दक्षिण भारत के सीमित इलाकों और पूर्वी-मध्य भारत के कुछ भागों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। 

इसके बावजूद व्यापक स्तर पर बारिश की कमी की आशंका बनी हुई है। जून महीने को लेकर भी मौसम विभाग का अनुमान ज्यादा उत्साहजनक नहीं है। विभाग के अनुसार जून 2026 में देशभर में वर्षा सामान्य से कम रह सकती है और यह दीर्घकालिक औसत के 92 प्रतिशत से नीचे रहने का अनुमान है। जून के दौरान अधिकतर क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना जताई गई है। वहीं न्यूनतम तापमान भी अधिकांश इलाकों में सामान्य से ज्यादा रह सकता है। इसका मतलब है कि दिन के साथ-साथ रातों में भी गर्मी से राहत मिलने की संभावना कम रहेगी। 

मौसम विभाग ने कई राज्यों में भीषण गर्मी और लू चलने की आशंका भी जताई है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक लू वाले दिन देखने को मिल सकते हैं। बढ़ते तापमान और कम वर्षा का संयुक्त प्रभाव जनजीवन पर भारी पड़ सकता है। बिजली की मांग बढ़ने, जल संकट गहराने और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि राजस्थान और झारखंड में लू वाले दिनों की संख्या सामान्य से कम रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

एल नीनो की सक्रियता से कमजोर पड़ सकता है मानसून

मौसम विभाग के अनुसार प्रशांत महासागर में इस समय तटस्थ स्थिति बनी हुई है, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां एल नीनो की ओर बढ़ रही हैं। विभाग का अनुमान है कि मानसून सत्र के दौरान एल नीनो विकसित होने की संभावना लगभग 92 प्रतिशत तक है। सामान्य तौर पर एल नीनो की स्थिति भारतीय मानसून को कमजोर करती है और वर्षा में कमी का कारण बनती है। यही वजह है कि इस बार मौसम वैज्ञानिक मानसून को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं। एल नीनो के प्रभाव से समुद्री तापमान बढ़ता है, जिससे मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है। इसका असर केवल बारिश की मात्रा पर ही नहीं बल्कि वर्षा के वितरण पर भी पड़ता है। कई बार कुछ क्षेत्रों में बहुत कम बारिश होती है जबकि कुछ इलाकों में अचानक भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इससे खेती और जल प्रबंधन दोनों प्रभावित होते हैं।

हिंद महासागर की स्थिति फिलहाल तटस्थ बनी हुई है। मौसम विभाग का कहना है कि पूरे मानसून सत्र के दौरान इसके तटस्थ बने रहने की संभावना है। 

हालांकि यदि समुद्री परिस्थितियों में बदलाव होता है तो मानसून के स्वरूप पर उसका असर पड़ सकता है। कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न उत्पादन, जलाशयों का स्तर और महंगाई पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। यदि वर्षा कम होती है तो खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है, जिससे बाजार में दाम बढ़ने की आशंका रहती है। साथ ही बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में जलविद्युत परियोजनाएं वर्षा पर निर्भर हैं। मौसम विभाग ने यह भी बताया कि वर्ष 2021 से मासिक और मौसमी पूर्वानुमान के लिए बहु-मॉडल प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। 

इस प्रणाली में दुनिया के विभिन्न जलवायु मॉडलों और भारतीय मानसून मॉडल से प्राप्त आंकड़ों को एक साथ मिलाकर विश्लेषण किया जाता है। इसके आधार पर मौसम की संभावित स्थिति का अनुमान तैयार किया जाता है। विभाग का कहना है कि नई तकनीक और उन्नत मॉडल के कारण पूर्वानुमान पहले की तुलना में अधिक सटीक हुए हैं। अब देशभर की नजरें मानसून की वास्तविक प्रगति पर टिकी हैं। यदि शुरुआती महीनों में पर्याप्त बारिश नहीं होती तो खेती और जल संकट की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकारों के लिए जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और राहत योजनाओं को लेकर पहले से तैयारी करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

वर्ष 2026 से प्रतिवर्ष आयोजित होगी न्यू इंडिया फाउंडेशन की प्रतिष्ठित बुक फेलोशिप

भारत में गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन और शोध संस्कृति को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए न्यू इंडिया फाउंडेशन (NIF) ने घोषणा की है कि उसकी प्रतिष्ठित बुक फेलोशिप अब वर्ष 2026 से द्विवार्षिक (दो वर्ष में एक बार) के बजाय प्रतिवर्ष आयोजित की जाएगी। इसके अंतर्गत आवेदन प्रक्रिया हर वर्ष खुलेगी और लगभग तीन माह तक जारी रहेगी।

पिछले लगभग दो दशकों से भारत की स्वतंत्रता-उपरांत यात्रा, सामाजिक परिवर्तन, राजनीति, संस्कृति और समकालीन विषयों पर गंभीर विमर्श को प्रोत्साहित करने वाली NIF बुक फेलोशिप अब और अधिक लेखकों, शोधकर्ताओं तथा विचारकों तक पहुंच बना सकेगी।

यह फेलोशिप केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि चयनित फेलोज़ को मासिक वित्तीय सहयोग, संपादकीय मार्गदर्शन, विशेषज्ञ परामर्श (मेंटरशिप) तथा बौद्धिक समुदाय का सहयोग भी प्रदान करती है। यही कारण है कि इसे भारत की सबसे प्रतिष्ठित लेखन फेलोशिपों में गिना जाता है।

फाउंडेशन के अनुसार, यह परिवर्तन भारत में उभरते विमर्शों, नए शोध विषयों और बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्यों के अनुरूप अधिक सक्रिय और समावेशी भूमिका निभाने की दिशा में उठाया गया कदम है। इससे वे लेखक भी लाभान्वित होंगे जो पूर्व चयन प्रक्रिया में मामूली अंतर से पीछे रह गए थे और जिन्हें पुनः आवेदन के लिए दो वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।

समय के साथ प्रतिवर्ष चयनित होने वाले फेलोज़ का विस्तृत नेटवर्क एक सशक्त बौद्धिक समुदाय का निर्माण करेगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लेखकों को सहयोग, संवाद और मार्गदर्शन प्रदान कर सकेगा। इससे भारत में गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन की सांस्कृतिक उपस्थिति भी अधिक सुदृढ़ होगी।

निराजा गोपाल जायल, न्यू इंडिया फाउंडेशन की गवर्निंग बोर्ड सदस्य ने कहा:

“प्रतिवर्ष फेलोशिप आयोजित करना NIF की स्वाभाविक अगली यात्रा है। हमारा मानना रहा है कि गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन भारत को स्वयं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हम इस सहयोग को अधिक सुलभ, निरंतर और प्रभावी बनाना चाहते हैं।”

वहीं श्रीनाथ राघवन, गवर्निंग बोर्ड सदस्य ने कहा:

“हर वर्ष प्राप्त होने वाले बड़ी संख्या में आवेदन इस बात का संकेत हैं कि भारत में गैर-काल्पनिक लेखन का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। वार्षिक फेलोशिप चक्र इस क्षेत्र को विस्तार देने के साथ-साथ इसकी गुणवत्ता को भी समृद्ध करेगा।”

लगभग 20 वर्ष पूर्व स्थापित न्यू इंडिया फाउंडेशन का उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद के भारत के इतिहास और परिवर्तनशील समाज को समझने के लिए गंभीर शोध और लेखन को प्रोत्साहित करना था। वर्तमान में संस्था NIF Book Fellowship, Translation Fellowship, तथा Kamaladevi Chattopadhyay NIF Book Prize जैसे प्रमुख कार्यक्रम संचालित करती है।

पिछले दो दशकों में यह फेलोशिप लगभग 40 उच्च गुणवत्ता वाली गैर-काल्पनिक पुस्तकों को समर्थन प्रदान कर चुकी है, जिनमें राजनीतिक जीवनियों से लेकर सांस्कृतिक इतिहास और संस्मरण तक शामिल हैं।

प्रख्यात साहित्यकार, कवि एवं पत्रकार स्व. श्रीकांत वर्मा को भारत रत्न देने की माँग

देश के प्रख्यात साहित्यकार, कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि के अवसर पर सोमवार को नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में ‘विश्व हिंदी परिषद’ एवं ‘श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट’ द्वारा ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया।
इस अवसर पर साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने स्व. श्रीकांत वर्मा के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी वैचारिक विरासत पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का आरंभ संचालक डॉ. हर्षबाला शर्मा द्वारा स्व. श्रीकांत वर्मा के जीवन, साहित्यिक अवदान, पत्रकारिता तथा राजनीतिक योगदान के परिचय से हुआ। इसके उपरांत विशिष्ट अतिथियों, वरिष्ठ साहित्यकारों एवं वर्मा परिवार के सदस्यों द्वारा स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए स्व. श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान का स्मरण किया।
इस अवसर पर डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्रीकांत वर्मा की पुस्तक ‘मगध’ और मोती माला भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
डॉ. विपिन कुमार ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीकांत वर्मा ने अपने समय की पीड़ा, लोगों की वेदना और सत्ता की खामोशी को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। सत्ता के नजदीक रहते हुए भी उन्होंने सत्ता से सवाल करने का साहस दिखाया । वे अतीत में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखते थे। वे भारतीय संस्कृति में विश्वास करते थे और देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था। डॉ. विपिन कुमार ने श्रीकांत वर्मा को देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने की माँग करते हुए कहा कि इस संबंध में भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।
डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा से जुड़ी स्मृतियों तथा ‘श्रीकांत वर्मा सम्मान’ की जानकारी साझा की। उन्होंने अपने पिता श्रीकांत वर्मा के आखिरी दिनों को याद किया। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले चार पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता, कला के क्षेत्र में दिए जाएँगे। इसमें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक है।
इसके बाद आयोजित स्मृति एवं साहित्यिक विमर्श सत्र में अनेक वक्ताओं ने श्रीकांत वर्मा के जीवन और साहित्य के विविध पक्षों पर अपने विचार रखे।
मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री अशोक वाजपेयी ने स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साथ बिताए समय और उनसे जुड़ी अविस्मरणीय साहित्यिक यादों को जीवंत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा एक लड़ाकू कवि थे। किसी भी सभा में वे अपने वैचारिक और कविता के तेवर को स्थगित नहीं करते थे। वे जो कहना चाहते थे, कह देते थे। वे हिंदी के नाराज़ कवि थे। वे 20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे।
प्रख्यात साहित्यकार एवं कला समीक्षक श्री विनोद भारद्वाज ने ‘कला एवं आलोचना’ विषय पर अत्यंत सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा के तेवर अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिल्कुल अलग थे। श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए विनोद भारद्वाज ने कहा कि दुनिया बदल जाती है, लेकिन स्मृतियाँ रह जाती हैं।
वहीं जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी ने ‘श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर’ विषय पर केंद्रित व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने श्रीकांत वर्मा की वैचारिक प्रखरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, श्रीकांत जी बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। आज जिस तरह की पत्रकारिता है, उसके संदर्भ में जब दिनमान के दौर की पत्रकारिता को देखते हैं, तो श्रीकांत वर्मा बहुत याद आते हैं। वे पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे।
कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक श्री रवीन्द्र त्रिपाठी ने श्रीकांत वर्मा से अपनी मुलाकातों को याद किया और साहित्य तथा पत्रकारिता के अंतरसंबंधों को उजागर करते हुए “पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर अपनी बात रखी। उनकी दृष्टि में समाज में जो हो रहा है, उसको जानने का माध्यम पत्रकारिता है। पत्रकारिता और आधुनिक साहित्य का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा है।
एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार अदिति राजपूत ने समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा पर प्रकाश डालते हुए “वर्तमान पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया। उनके अनुसार श्रीकांत वर्मा पत्रकारिता को एक उद्योग नहीं, लोक चेतना मानते थे । उन्होंने कहा, “पहले पत्रकारिता मिशन थी, फिर प्रोफेशन में बदली और अब मार्केट में बदल गई है।”
प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने ‘श्रीकांत वर्मा के कथा एवं गद्य साहित्य’ विषय पर अकादमिक और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी और सहृदयता के साथ अपनी बात कहना बहुत कठिन होता है। श्रीकांत वर्मा के गद्य में उनका निष्पाप कवि मन प्रतिबिंबित होता है। उनके साहित्य में युगबोध और कालबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की पीड़ा और कुंठा को चित्रित किया है। उनका लेखन बहुत अनुशासित है, जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि रहा है।
कार्यक्रम के अंत में, प्रसिद्ध आलोचक प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया । उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, साहित्यकारों, सहयोगी संस्थाओं तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम साहित्य, पत्रकारिता और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के अमूल्य योगदान को स्मरण करने का एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ।

जानलेवा बनता जा रहा बढ़ता तापमान– ज्ञानेन्द्र रावत

बढ़ता तापमान अब जानलेवा बनता जा रहा है। देखा जाये तो मौजूदा दौर में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। असलियत में हीटवेव कहें, उष्ण लहर कहें या फिर लू कहें, की तीव्रता और घातकता में दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। दिन-ब-दिन बढ़ते तापमान और गर्म हवा के भीषण थपेड़ों ने दिन तो दिन रातों में भी जीना हराम कर दिया है। रातों में भी लू जैसे हालात से लोग चैन की नींद तक नहीं ले पा रहे हैं।मौसम विभाग भी कह रहा है कि अगले हफ्ते तक इस गर्मी से निजात मिल पाना संभव नहीं है।और तो और आने वाले दिनों में पारा 47-48 डिग्री को भी पार कर जायेगा, ऐसी आशंका है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सवाल है, वहां तापमान 45 डिग्री के ऊपर पहुंच गया है। वह तप रही है और आग की भट्टी बनकर रह गयी है। मौसम विभाग की मानें तो इस हफ्ते देश के उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत और देश के कई हिस्सों यथा- पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, विदर्भ, मराठवाडा,मध्य महाराष्ट्र,बिहार और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को भीषण लू का सामना करना पड़ेगा। यही नहीं तापमान में अगले दिनों में धीरे-धीरे दो से चार डिग्री तक की बढ़त हालात को और विषम बना देगी। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का बांदा जिला बीते दिनों सूरज के तीखे तेवरों का शिकार रहा और यहां के लोग 48 डिग्री सेल्सियस की गर्मी की तपिश में बेहाल झुलसते दिखे। फिर नौतपा के कहर जिसका असर 25 मई से 2 जून तक रहेगा और जिसमें तापमान 48 डिग्री सेल्सियस पहुंचने की चेतावनी दी गयी है, इस खतरे को और भयावह बना देगा।

इस बाबत हुए अध्ययनों से पता चलता है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। 1950 के बाद से अबतक हीटवेव की भयावहता और उसके कारणों का विश्लेषण करने के बाद खुलासा हुआ है कि जो हीटवेव साल 1950 और साल 2000 के बीच चलती थी, उसमें और मौजूदा हीटवेव में काफी अंतर आ चुका है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूरोपीय मौसम विज्ञान एजेंसी कापरनिक्स का कहना है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री और ज्यादा गर्म हो चुकी है। इससे मानव स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए मानव जनित जलवायु परिवर्तन पूरी तरह जिम्मेदार है। गौरतलब है कि इसमें प्राकृतिक कारणों से उपजे जलवायु परिवर्तन की भूमिका लगभग नगण्य ही है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ-साथ मौसम में भी कई बदलाव देखे जाने का उल्लेख है। इनमें सतह के वायु दबाव में बढ़ोतरी, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न मैं हुए काफी बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट की मानें तो इन बदलावों में नमी का बढ़ना, हवाओं की गति में यकायक कमी और सर्दी प्रमुख है। इसके अलावा पिछले 80 वर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्याधिक गर्मी का अनुभव करने वाले दिनों की तादाद भी तीन गुणा हो गयी है। दरअसल 1940 के दशक में औसतन वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना लगभग 15 दिन अत्याधिक गर्मी देखी जाती थी लेकिन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष हो गया है। प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडेमी आफ साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अब समुद्री हीटवेव लम्बे समय तक सामान्य से काफी ऊपर रहती है। यह भी कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते अत्याधिक समुद्री गर्मी की घटनाएं लम्बे समय तक बनी रहती हैं।

असलियत में तापमान में बढ़ोतरी से घातक लू चलने की घटनाओं में बीते दशकों में तेजी से वृद्धि हुई है। बीते दो दशक तो लू से मरने वालों की तादाद में हुई बढ़ोतरी के जीते-जागते सबूत हैं। हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इसमें पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं। यहां करीब 14 फीसदी मौतें हुयी हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशक में हर साल कुल 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। यह भी कि हर साल गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया से और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में हुई हैं। फिर जलवायु परिवर्तन ने एशिया में हीटवेव की तीव्रता को काफी बढा़ने में अहम भूमिका निबाही है। इससे अरबों लोग प्रभावित हुए हैं। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।

ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के नये अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि इसी प्रकार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की घटनाओं में और बढ़ोतरी हुयी तो उससे लू सम्बन्धी मामलों में मृत्यु दर बढ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। गौरतलब है 2003 में यूरोप में 47.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पहुंच गया था जिससे लू लगने के दौरान 45 हजार लोगों की मौत हो गयी थी। बीते 20 सालों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। इसके अलावा 2013 से यूरोप, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा सहित दुनिया के 47 देशों के 748 शहरों में गर्मी से सम्बन्धित मृत्यु दर सम्बन्धी आंकडे़ के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि लू की घटनाओं में कहीं भी कमी नहीं आयी है और वहां लू से मरने वालों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुई रिकार्ड बढ़त और तापमान में लगातार होती बढ़ोतरी के चलते हीटवेव की भयावहता की आशंका व्यक्त की है।

दरअसल हीटवेव की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका व्यक्त की गयी है। विशेषज्ञों की मानें तो हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्याधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाईड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफडो़ं की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुडे़ लोग ज्यादा आते हैं। इन पर हीटवेव का जोखिम ज्यादा रहता है। फिर पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं है कि बीते बरसों में हर महाद्वीप को हीटवेव ने प्रभावित किया है। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी हुई। साल 1992 से लेकर अभी तक लू के चलते तकरीब 24 हजार लोगों की मौतें हुयी हैं। आने वाले सालों में 60 करोड़ लोग इससे सर्वाधिक प्रमावित होंगे। इससे 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी दर्ज की जायेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की मानें तो 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। चिंता की बात यह है कि यदि तापमान वृद्धि की दर पर अंकुश नहीं लगा तो सदी के अंत तक गर्मी से 1.5 करोड़ लोग मौत के मुहाने तक पहुंच जायेंगे।

कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस का उत्सर्जन स्तर यदि 2050 तक यही रहा तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर तक पहुंच जायेगी। उसका नतीजा लाखों लोगों की मौत होगा। यह भी कि प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में बढो़तरी से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव की घटनाओं में बढो़तरी होगी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार धरती के गर्म होने की रफ्तार अनुमान से कहीं ज्यादा है। अहम सवाल कार्बन उत्सर्जन कम करने का है, यदि ऐसा नहीं हुआ जिसकी संभावना अधिक है। उस दशा में सदी के आखिर तक धरती का तापमान बढ़कर चार डिग्री सेल्सियस पहुंच जायेगा। उस दशा में धरती रहने काबिल बची रह पायेगी?
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

लोकतंत्र और पत्रकारिता के प्रहरी थे स्वर्गीय हेमंत विश्नोई

मनोज वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार संसद टीवी
स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई भारतीय पत्रकारिता के उन चुनिंदा नामों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों, साहस और सत्यनिष्ठा से पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया। उनका पूरा जीवन सच के पक्ष में खड़े रहने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित रहा। वे ऐसे दौर में पत्रकारिता कर रहे थे जब सत्ता के दबाव के सामने झुकना आसान था लेकिन हेमंत विश्नोई ने कभी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उनकी लेखनी में निर्भीकता, स्पष्टता और जनसरोकारों की गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। वे मानते थे कि पत्रकार का पहला दायित्व जनता, समाज और राष्ट्र के प्रति होता है न कि सत्ता के लिए। हेमंत बिश्नोई की पत्रकारिता में आम जनता की समस्याओं, सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को विशेष महत्व मिलता था। वे पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता के साथ साथ सत्ता से सवाल पूछने का साहस भी दिखाई देता था। यही कारण है कि वे लोगों के बीच अत्यंत सम्मानित रहे।

आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र का एक कठिन काल था। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति की आवाजों को दबाने का प्रयास किया गया। ऐसे कठिन समय में भी हेमंत विश्नोई ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 1975-77 में आपातकाल और छात्र आंदोलन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के साथ हेमंत विश्नोई भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में सक्रिय थे। उस समय अरुण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और उन्होंने आपातकाल विरोधी गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। 19 माह तक जेल में रहना पड़ा लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि यह लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था। जेल की यातनाएं और कठिन परिस्थितियाँ भी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकीं। वे अंत तक सच और न्याय के पक्षधर बने रहे।

आज जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों और दबावों का सामना कर रही है तब हेमंत विश्नोई का जीवन और कार्य नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि सच्ची पत्रकारिता वही है जो निष्पक्ष, ईमानदार और निर्भीक हो। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई का जीवन लोकतंत्र, सत्य और पत्रकारिता की गरिमा के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ने पत्रकार समाज को संगठित करने का कार्य किया। वे मानते थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत हो सकता है जब पत्रकार आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर रूप से सुरक्षित हों। इसी सोच के साथ उन्होंने पत्रकारों की कार्य स्थितियों, वेतन, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों को लगातार उठाया। बिश्नोई जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड की मांग को लेकर किए गए संघर्ष में रहा। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन अत्यंत आवश्यक था। उन्होंने देखा कि अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं लेकिन उन्हें उचित वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसी कारण उन्होंने श्रम कानूनों में सुधार और पत्रकारों के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया। उन्होंने विभिन्न मंचों, संगठनों और विचार गोष्ठियों के माध्यम से पत्रकारों की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनका स्पष्ट मत था कि पत्रकारों को भी अन्य कर्मचारियों की तरह सम्मानजनक वेतन स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, पेंशन तथा सुरक्षित कार्य वातावरण मिलना चाहिए। वे पत्रकारों के शोषण के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाते थे और मीडिया संस्थानों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की वकालत करते थे। हेमंत बिश्नोई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और पत्रकार संगठनों को एकजुट कर आंदोलन को मजबूत बनाया।स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का व्यक्तित्व संघर्षशील होने के साथ साथ प्रेरणादायक भी था। वे संवाद और संगठन की शक्ति में विश्वास रखते थे। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर उन्होंने अनेक मंचों पर आवाज उठाई और यह साबित किया कि संगठित प्रयासों से बदलाव संभव है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई की नेतृत्व क्षमता का प्रभाव यह था कि वे केवल वरिष्ठ पत्रकारों तक सीमित नहीं रहे बल्कि युवा पत्रकारों को भी संगठन से जोडते रहे। वे हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है। इसी कारण वे पत्रकारों के अधिकारों के साथ साथ पत्रकारिता की गरिमा और नैतिक मूल्यों की भी बात करते थे।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल समाचार लिखने तक सीमित नहीं रहते बल्कि अपने विचारों, लेखनी और वैचारिक प्रतिबद्धता से समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता को केवल एक विचार नहीं बल्कि जन चेतना का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया। हेमंत बिश्नोई का मानना था कि पत्रकारिता केवल सत्ता से प्रश्न पूछने का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रहित और समाज हित के पक्ष में जनमत निर्माण का दायित्व भी है। यही कारण था कि उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। उन्होंने पत्रकारिता को पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव से हटाकर भारतीय दृष्टिकोण से देखने और समझने का प्रयास किया। जब देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस होती थी तब स्व हेमंत विश्नोई ने निर्भीक होकर अपनी बात रखी। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ राष्ट्रहित की मर्यादा को भी उतना ही आवश्यक माना। उनकी लेखनी में संतुलन, तर्क और राष्ट्र के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई देता था। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है जिसकी रक्षा प्रत्येक जागरूक नागरिक और पत्रकार का कर्तव्य है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय भी उनके चिंतन और लेखन का प्रमुख हिस्सा रहा। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को केवल धार्मिक मुद्दा नहीं माना बल्कि भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न बताया। अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भगवान श्रीराम भारत की आस्था, आदर्श और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ा विषय था। हेमंत विश्नोई ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से यह सिद्ध किया कि राष्ट्रवादी विचारधारा संकीर्णता नहीं बल्कि भारत की विविधता, संस्कृति और परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ने की भावना है। उन्होंने हमेशा भारतीयता को केंद्र में रखकर लेखन किया और युवा पत्रकारों को भी राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। हेमंत विश्नोई ने सदैव उन विषयों को प्रमुखता दी जो देश की अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े थे। चाहे आतंकवाद का प्रश्न हो सीमा सुरक्षा का विषय हो या कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा , उन्होंने बिना किसी दबाव या भय के अपनी बात रखी। उनका मानना था कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सत्ता से प्रश्न पूछना ही नहीं बल्कि राष्ट्रहित के पक्ष में जनमत तैयार करना भी है।उनका कहना था कि धारा 370 ने वर्षों तक कश्मीर को मुख्यधारा से दूर रखा और अलगाववाद को बढ़ावा दिया। वे अपने लेखों और वक्तव्यों में यह तर्क देते थे कि जब देश के अन्य राज्यों के नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो कश्मीर भी समान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए। असल में हेमंत बिश्नोई की लेखनी में राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा नहीं था बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समन्वय था। वे मानते थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देना नहीं हो सकता। इसी कारण उनकी पत्रकारिता में स्पष्टता, तर्क और राष्ट्र प्रेम का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से गहरा आत्मीय रिश्ता था। बरेली की गलियों, वहां की संस्कृति और अपने लोगों की चर्चा वे अक्सर बड़े अपनत्व के साथ किया करते थे। उनके शब्दों में हमेशा अपने शहर के प्रति सम्मान और लगाव झलकता था। वे अपनी पारिवारिक जड़ों से पूरी तरह जुड़े हुए व्यक्ति थे जिन्होंने जीवन भर रिश्तों और मूल्यों को सर्वोपरि रखा। खुद भी बरेली का रहने वाला हूं और जब दिल्ली आया तो 1992 में सर्व प्रथम स्वर्गीय हेमंत जी से परिचय हुआ तब पता चला कि उनके रिश्तों की डोर बरेली के बडे बाजार से भी जुड़ी है। हेमंत जी ने एक बडे भाई के रूप में सदैव मार्गदर्शन मिला। सही मानों में वे केवल एक पत्रकार नहीं बल्कि संवेदनशील इंसान और सच्चे मार्गदर्शक थे। पत्रकारिता जगत में भी उनका व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायी रहा। कठिन परिस्थितियों में वे अपने पत्रकार साथियों के साथ मजबूती से खड़े रहते थे। चाहे किसी साथी पर संकट हो या किसी युवा पत्रकार को मार्गदर्शन की आवश्यकता। हेमंत विश्नोई हमेशा एक संरक्षक और शुभचिंतक की भूमिका में दिखाई देते थे। उनका व्यवहार सहज, सहयोगी और आत्मीय था जिसने उन्हें सभी के बीच विशेष सम्मान दिलाया। आज जब पत्रकारिता कई बार वैचारिक भ्रम और बाजारवाद के दबाव में दिखाई देती है तब स्व हेमंत विश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनकी लेखनी हमें यह संदेश देती है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य समाज को सत्य संस्कार और राष्ट्रचेतना से जोड़ना होना चाहिए। स्व. हेमंत विश्नोई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार, उनकी लेखनी और राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण सदैव प्रेरणा देता रहेगा। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।आज भले ही हेमंत विश्नोई हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पत्रकारों के अधिकारों और श्रम कानूनों को लेकर उनकी सोच और संघर्ष प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए पत्रकारों का सम्मान और सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। पत्रकार हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सदैव स्मरणीय रहेगी।

आज जब मीडिया जगत नई चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है तब हेमंत विश्नोई जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन पत्रकार एकता, अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का संदेश देता है। पत्रकार समाज हमेशा उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करेगा। आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग सनसनी और राजनीतिक पक्षधरता के आरोपों से घिरा दिखाई देता है तब हेमंत बिश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने दिखाया कि निष्पक्षता का अर्थ राष्ट्रहित से विमुख होना नहीं बल्कि सत्य और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होना है। स्व हेमंत विश्नोई की राष्ट्रवादी पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन और लेखन यह संदेश देता है कि कलम की शक्ति तब सबसे प्रभावशाली होती है जब वह राष्ट्र और समाज के हित में समर्पित हो। उनकी निर्भीक आवाज भले ही आज हमारे बीच न हो लेकिन उनके विचार और सिद्धांत सदैव भारतीय पत्रकारिता को दिशा देते रहेंगे।

बंगाल में शुभेंदु सरकार की अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई का असर : सीमा पार लौटने के इंतजार में बैठे बांग्लादेशी घुसपैठिये 

पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ और बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ तेज हुई कार्रवाई के बीच भारत-बांग्लादेश सीमा पर अचानक बढ़ी हलचल ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट स्थित हाकिमपुर सीमा चेकपोस्ट पर मंगलवार सुबह ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सीमा सुरक्षा और अवैध प्रवासन के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। सीमा चौकी के पास बड़ी संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे अपने घरेलू सामान, ट्रॉली बैग, बर्तन और कपड़ों के साथ जमा दिखाई दिए। कई परिवार खुले आसमान के नीचे घंटों तक बैठे रहे। बच्चों को गोद में उठाए महिलाएं और सामान संभालते पुरुष सीमा पार कर वापस बांग्लादेश जाने की प्रतीक्षा करते नजर आए। अचानक इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। 

स्थानीय लोगों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से सीमा क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियां लगातार बढ़ रही थीं, लेकिन मंगलवार सुबह स्थिति और गंभीर दिखाई दी। सुबह होते ही सीमा चौकी के आसपास लोगों की भीड़ जुटने लगी। देखते ही देखते पूरा इलाका लोगों और सुरक्षा बलों की गतिविधियों से भर गया। कई परिवारों के चेहरे पर चिंता और डर साफ दिखाई दे रहा था। सोमवार को भी करीब 100 लोग हाकिमपुर सीमा चौकी के आसपास पहुंचे थे। इसके अलावा 30 से 40 अन्य लोग सीमा के बाहर अलग-अलग स्थानों पर इंतजार करते देखे गए। बताया जा रहा है कि ये लोग लंबे समय से पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में रह रहे थे और अब प्रशासनिक सख्ती बढ़ने के बाद वापस लौटने की कोशिश कर रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, इनमें से कई लोग न्यूटाउन, दमदम, डानकुनी और आसपास के इलाकों में मजदूरी, घरेलू कामकाज और छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े हुए थे। हाल के दिनों में राज्य में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के कारण इन लोगों में भय का माहौल बन गया है। 

पुलिस और प्रशासन की टीमों द्वारा दस्तावेजों की जांच और पहचान सत्यापन अभियान तेज किए जाने के बाद बड़ी संख्या में लोग सीमा की ओर पहुंचने लगे हैं। सीमा चौकी पर मौजूद लोगों में महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल थे। कुछ लोग अपने साथ खाने-पीने का सामान और जरूरी घरेलू वस्तुएं भी लेकर आए थे। कई परिवार इस उम्मीद में सीमा के पास बैठे रहे कि उन्हें वापस बांग्लादेश जाने की अनुमति मिल जाएगी। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों ने बिना वैध दस्तावेजों के किसी को भी सीमा पार करने की अनुमति नहीं दी। सीमा सुरक्षा बल और स्थानीय प्रशासन की टीमें पूरे इलाके में लगातार निगरानी बनाए हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि हर व्यक्ति की पहचान और दस्तावेजों की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा चौकी और आसपास के संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त जवान भी तैनात किए हैं।

हाकिमपुर सीमा चेकपोस्ट पर बढ़ती भीड़ को देखते हुए सीमा सुरक्षा बल ने चौकसी और बढ़ाई

हाकिमपुर सीमा चेकपोस्ट पर बढ़ती भीड़ को देखते हुए सीमा सुरक्षा बल ने चौकसी और बढ़ा दी है। जवान लगातार गश्त कर रहे हैं और हर आने-जाने वाले व्यक्ति पर नजर रखी जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, सीमा पार गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की अवैध आवाजाही को रोका जा सके। कई लोगों के पास वैध पहचान दस्तावेज नहीं मिले हैं। ऐसे में एजेंसियां उनकी नागरिकता और भारत में रहने की अवधि की जांच कर रही हैं। इसके अलावा यह भी पता लगाया जा रहा है कि ये लोग किन रास्तों से भारत में दाखिल हुए थे और किन इलाकों में रह रहे थे। जांच एजेंसियों को आशंका है कि सीमा पार घुसपैठ का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। 

इसी वजह से सीमा से जुड़े कई इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है। पुलिस स्थानीय मकान मालिकों और व्यापारियों से भी पूछताछ कर रही है ताकि उन लोगों की पहचान की जा सके जिन्होंने संदिग्ध नागरिकों को रहने या काम देने में मदद की। इधर, सीमा क्षेत्र में जमा लोगों के बीच अनिश्चितता बनी हुई है। कई परिवार घंटों तक सीमा चौकी के पास बैठे रहे और आगे की कार्रवाई का इंतजार करते रहे। महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी के कारण स्थिति मानवीय दृष्टि से भी संवेदनशील बन गई है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां स्पष्ट कर चुकी हैं कि कानून और नियमों के तहत ही कार्रवाई की जाएगी। भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे इलाकों में अवैध घुसपैठ लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। 

समय-समय पर सुरक्षा एजेंसियां कार्रवाई करती रही हैं, लेकिन सीमा की भौगोलिक स्थिति और घनी आबादी के कारण इस समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण आसान नहीं है। ऐसे में हाकिमपुर सीमा चौकी पर सामने आया यह घटनाक्रम सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है। फिलहाल सीमा क्षेत्र में स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां हर गतिविधि की निगरानी कर रही हैं और बिना अनुमति किसी को भी सीमा पार नहीं करने दिया जा रहा। आने वाले दिनों में जांच के दौरान इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

शिमला में महंगाई के खिलाफ कांग्रेस का प्रदर्शन, कहा- बढ़ती कीमतों ने बिगाड़ दिया आम आदमी का बजट, केंद्र सरकार को घेरा

देश में लगातार बढ़ती महंगाई को लेकर सियासी पारा चढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला सोमवार को उस समय राजनीतिक नारों से गूंज उठी, जब कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार के खिलाफ बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। नगर निकाय और पंचायती राज चुनावों से पहले आयोजित इस प्रदर्शन में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बढ़ती कीमतों को लेकर भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा और आम जनता की परेशानियों को सड़क पर उठाया। शहर के विभिन्न इलाकों से जुटे कांग्रेस कार्यकर्ता हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर प्रदर्शन में शामिल हुए। “महंगाई की मार, नहीं सहेंगे यार”, “जनता परेशान, केंद्र सरकार जवाब दो” और “रसोई का बजट बिगाड़ने वाली सरकार मुर्दाबाद” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंजता रहा। 

प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण आम आदमी का जीवन लगातार मुश्किल होता जा रहा है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने लोगों की आर्थिक स्थिति को हिला कर रख दिया है। उन्होंने दावा किया कि महंगाई अब सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि आम परिवारों के अस्तित्व से जुड़ा बड़ा संकट बन चुकी है। प्रदर्शन का नेतृत्व शिमला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सरदार इंद्रजीत सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि आज देश का मध्यम वर्ग, मजदूर, किसान और गरीब परिवार सबसे ज्यादा परेशान हैं। रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदना कठिन हो गया है और घर का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। 

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जनता को राहत देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से परिवहन खर्च बढ़ गया है, जिसका असर सीधे खाद्य वस्तुओं और अन्य सामानों की कीमतों पर पड़ रहा है। वहीं रसोई गैस सिलेंडर के दामों ने गृहिणियों की चिंता और बढ़ा दी है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि चुनावों के समय जनता से राहत और विकास के वादे किए गए थे, लेकिन अब आम लोगों को सिर्फ महंगाई और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। 

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है, जबकि जनता हर दिन बढ़ती कीमतों से जूझ रही है। प्रदर्शन में शामिल कार्यकर्ताओं ने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई के कारण मजदूर वर्ग और छोटे कारोबारियों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई है। आम लोगों की आय सीमित है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो गया है। कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में महंगाई का असर ज्यादा गंभीर होता है, क्योंकि यहां परिवहन लागत पहले से अधिक रहती है। ईंधन की कीमतों में हर बढ़ोतरी का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है।

कांग्रेस ने दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी

सरदार इंद्रजीत सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि कांग्रेस पार्टी जनता की आवाज को दबने नहीं देगी और महंगाई के खिलाफ संघर्ष लगातार जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने जल्द कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया तो कांग्रेस प्रदेशभर में बड़े स्तर पर आंदोलन करेगी।उन्होंने मांग की कि पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में तुरंत राहत दी जाए। साथ ही खाद्य वस्तुओं और अन्य घरेलू जरूरतों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि आम जनता को राहत मिल सके। 

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि देश की जनता इस समय आर्थिक संकट से गुजर रही है और सरकार को राजनीतिक प्रचार के बजाय जनता की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना था कि महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग की जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है और लोगों में सरकार के खिलाफ नाराजगी लगातार बढ़ रही है। कांग्रेस आने वाले चुनावों में महंगाई के मुद्दे को बड़े चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है। शिमला में हुआ यह प्रदर्शन उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में महंगाई का मुद्दा और अधिक गर्माने की संभावना जताई जा रही है।

नवादा मेट्रो के पास 45 दिन का ट्रैफिक ‘लॉक’, दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल नजफगढ़ रोड बंद, यात्रियों की बढ़ेगी परेशानी

दिल्ली की रफ्तार अगले डेढ़ महीने तक एक बड़े ट्रैफिक संकट से गुजरने वाली है। राजधानी के पश्चिमी हिस्से में रोजाना लाखों लोगों की आवाजाही वाली नजफगढ़-उत्तम नगर मुख्य सड़क अब 45 दिनों तक बंद रहेगी। नवादा मेट्रो स्टेशन के पास शुरू हुए बड़े मरम्मत कार्य ने दिल्ली वालों की टेंशन बढ़ा दी है। सुबह ऑफिस जाने वालों से लेकर स्कूल बसों, कैब, ई-रिक्शा और लोकल ट्रैफिक तक, हर कोई इस असर से बच नहीं पाएगा। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में इस इलाके में भारी जाम लग सकता है। खासतौर पर सुबह और शाम के पीक आवर्स में वाहन चालकों को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसे में लोगों को घर से पहले निकलने और वैकल्पिक मार्ग अपनाने की सलाह दी गई है। 

दिल्ली जल बोर्ड द्वारा नवादा मेट्रो स्टेशन के नीचे से गुजर रही पुरानी और क्षतिग्रस्त सीवर लाइन को दुरुस्त करने का काम शुरू किया गया है। यह काम ट्रेंचलेस टेक्नोलॉजी के जरिए किया जा रहा है, ताकि सड़क को पूरी तरह खोदने की जरूरत न पड़े। हालांकि तकनीक आधुनिक है, लेकिन इसके बावजूद सड़क का बड़ा हिस्सा बंद करना जरूरी बताया गया है। जानकारी के मुताबिक, द्वारका मोड़ से उत्तम नगर की ओर जाने वाली नजफगढ़-उत्तम नगर रोड का हिस्सा मेट्रो पिलर नंबर 722 से 723 के बीच पूरी तरह बंद रहेगा। यह बंदी 20 मई की रात 10 बजे से लागू हो चुकी है और अगले 45 दिनों तक जारी रहेगी। इस मार्ग को पश्चिमी दिल्ली की लाइफलाइन माना जाता है। रोजाना हजारों निजी वाहन, बसें और कमर्शियल वाहन इस सड़क से गुजरते हैं। 

नवादा, मोहन गार्डन, उत्तम नगर, द्वारका, नजफगढ़ और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक, सड़क बंद होने के कारण आसपास की गलियों और वैकल्पिक मार्गों पर दबाव बढ़ेगा। इसके चलते कई जगहों पर ट्रैफिक स्लो रहने की आशंका है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे गैरजरूरी यात्रा से बचें और मेट्रो का अधिक इस्तेमाल करें। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने इलाके में अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती भी की है। प्रमुख चौराहों और कट पॉइंट्स पर ट्रैफिक स्टाफ निगरानी करेगा ताकि वाहनों की आवाजाही नियंत्रित की जा सके। साथ ही ट्रैफिक डायवर्जन के बोर्ड भी लगाए जा रहे हैं। पुलिस ने कहा है कि वाहन चालक जीपीएस या ऑनलाइन मैप्स के बजाय ट्रैफिक पुलिस द्वारा जारी डायवर्जन प्लान को प्राथमिकता दें, क्योंकि कई छोटे रास्तों पर भीड़ बढ़ सकती है। यात्रियों को सलाह दी गई है कि सुबह-शाम के व्यस्त समय में अतिरिक्त समय लेकर घर से निकलें। खासकर ऑफिस जाने वाले लोग और स्कूल वाहन चालकों को अपनी टाइमिंग में बदलाव करना पड़ सकता है। 

दिल्ली जल बोर्ड का कहना है कि यह कार्य लंबे समय से जरूरी था। सीवर लाइन काफी पुरानी हो चुकी थी और भविष्य में बड़े नुकसान की आशंका थी। अगर समय रहते मरम्मत नहीं होती तो इलाके में सीवर ओवरफ्लो और सड़क धंसने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती थीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क बंद होने से पहले ही आसपास के इलाकों में ट्रैफिक दबाव काफी रहता है। ऐसे में अगले 45 दिन बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं। दुकानदारों को भी चिंता है कि जाम और डायवर्जन की वजह से ग्राहकों की संख्या प्रभावित होगी। मेट्रो स्टेशन के आसपास रोजाना भारी भीड़ रहती है। ऐसे में सड़क बंद होने से पैदल यात्रियों और ऑटो चालकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। कई जगहों पर अस्थायी बैरिकेडिंग कर दी गई है। ट्रैफिक पुलिस ने लोगों से यह भी अपील की है कि वे अपने वाहन केवल निर्धारित पार्किंग स्थलों पर ही खड़े करें। सड़क किनारे गलत पार्किंग से जाम की स्थिति और खराब हो सकती है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अगर लोग नियमों का पालन करें और वैकल्पिक मार्गों का सही इस्तेमाल करें, तो स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

अगले डेढ़ महीने तक बदल जाएगा पश्चिमी दिल्ली का ट्रैफिक सिस्टम

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने कई वैकल्पिक मार्ग सुझाए हैं ताकि मुख्य सड़क पर दबाव कम किया जा सके। द्वारका और नजफगढ़ की ओर जाने वाले वाहन चालकों को अलग-अलग रूट्स का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। उत्तम नगर और नवादा की ओर जाने वाले लोग छोटे आंतरिक मार्गों और सर्विस लेन का उपयोग कर सकते हैं, हालांकि वहां भी ट्रैफिक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। राजधानी में इस तरह के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और सीवर मरम्मत कार्य अब लगातार बढ़ेंगे, क्योंकि शहर की पुरानी व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले समय में दिल्ली के कई अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की अस्थायी बंदी देखने को मिल सकती है। 

इस बीच दिल्ली जल बोर्ड ने दावा किया है कि काम को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की कोशिश की जाएगी। विभाग का कहना है कि इंजीनियरों और तकनीकी टीमों को लगातार निगरानी के निर्देश दिए गए हैं ताकि देरी न हो। हालांकि दिल्ली वालों को फिलहाल लंबी ट्रैफिक चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। ऑफिस टाइम में जाम, वैकल्पिक मार्गों पर दबाव और यात्रा में बढ़ता समय आने वाले 45 दिनों तक लोगों की दिनचर्या प्रभावित कर सकता है। 

लोग यदि निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन और मेट्रो का अधिक इस्तेमाल करें तो ट्रैफिक का दबाव काफी कम हो सकता है। फिलहाल पश्चिमी दिल्ली के लोगों के लिए अगले डेढ़ महीने ‘ट्रैफिक परीक्षा’ जैसे साबित होने वाले हैं। सड़क बंद होने का असर केवल एक इलाके तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर आसपास के कई बड़े मार्गों और कॉलोनियों तक महसूस किया जाएगा।

ऑफिस का तनाव बन रहा सिरदर्द की वजह ! समय रहते संभल जाइए, नहीं तो शरीर और दिमाग दोनों पर पड़ेगा असर

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का दबाव लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। सुबह ऑफिस की भागदौड़, दिनभर मीटिंग्स, लगातार स्क्रीन पर काम और देर रात तक टारगेट पूरा करने की चिंता इन सबने लोगों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। खासकर कॉर्पोरेट कल्चर में काम करने वाले लोग लगातार तनाव, चिंता और थकान से जूझ रहे हैं। यही वजह है कि अब कम उम्र में भी लोग सिरदर्द, माइग्रेन, नींद की कमी और एंग्जायटी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कई लोग इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन बार-बार होने वाला सिरदर्द शरीर का संकेत हो सकता है कि आपका दिमाग और नर्वस सिस्टम लगातार दबाव में काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जब इंसान लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो शरीर का नर्वस सिस्टम ‘फाइट या फ्लाइट मोड’ में चला जाता है। 

इस स्थिति में शरीर हर समय अलर्ट रहता है, जिससे दिल की धड़कन तेज हो जाती है, मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है और दिमाग लगातार तनाव महसूस करता है। यही तनाव धीरे-धीरे सिरदर्द का कारण बन जाता है। वर्क स्ट्रेस से होने वाला सिरदर्द केवल काम के समय ही नहीं, बल्कि घर लौटने के बाद भी परेशान करता है। कई लोग शाम तक इतना थक जाते हैं कि परिवार के साथ समय बिताने या आराम करने का मन भी नहीं करता। लगातार सिर भारी रहना, आंखों में दर्द, गर्दन में अकड़न और चिड़चिड़ापन इसके सामान्य लक्षण माने जाते हैं। अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या माइग्रेन, हाई ब्लड प्रेशर और मानसिक थकान जैसी गंभीर परेशानियों में बदल सकती है।

लगातार स्क्रीन पर काम करना भी सिरदर्द की एक बड़ी वजह है। कंप्यूटर और मोबाइल की तेज रोशनी आंखों और दिमाग पर दबाव डालती है। कई लोग घंटों बिना ब्रेक लिए काम करते रहते हैं, जिससे शरीर को आराम नहीं मिल पाता। यही कारण है कि काम खत्म होने के बाद भी दिमाग शांत नहीं हो पाता और व्यक्ति तनाव महसूस करता रहता है। तनाव के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाते हैं। ये हार्मोन शरीर को अलर्ट मोड में रखते हैं, लेकिन लंबे समय तक इनका स्तर बढ़ा रहना नुकसानदायक साबित होता है। इससे शरीर का पेन थ्रेशहोल्ड यानी दर्द सहने की क्षमता कम हो जाती है। नतीजतन, हल्का तनाव भी तेज सिरदर्द में बदल जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि वर्क स्ट्रेस को पूरी तरह खत्म करना शायद संभव न हो, लेकिन सही लाइफस्टाइल और छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। सबसे जरूरी है कि लोग अपने शरीर और दिमाग को आराम देने के लिए समय निकालें। काम के बीच लगातार बिना रुके बैठे रहना सबसे बड़ी गलती मानी जाती है। 

ऑफिस में काम करते समय हर एक से डेढ़ घंटे में छोटा ब्रेक लेना बेहद जरूरी है। एक मीटिंग खत्म होने के तुरंत बाद दूसरी मीटिंग में जाने के बजाय 5 से 10 मिनट का गैप लेना शरीर और दिमाग दोनों के लिए फायदेमंद होता है। इस दौरान गहरी सांस लेना, हल्की वॉक करना या आंखें बंद करके कुछ मिनट शांत बैठना तनाव को कम करने में मदद करता है। डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि काम के दौरान पानी पीने की आदत बनाए रखें। शरीर में पानी की कमी भी सिरदर्द को बढ़ा सकती है। इसके अलावा कैफीन का जरूरत से ज्यादा सेवन करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को कुछ समय के लिए एक्टिव जरूर बनाता है, लेकिन बाद में थकान और सिरदर्द को बढ़ा सकता है।

वर्क स्ट्रेस और सिरदर्द से बचने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय

तनाव और सिरदर्द से राहत पाने के लिए सबसे पहले अपनी दिनचर्या को संतुलित बनाना जरूरी है। अच्छी नींद सबसे बड़ा इलाज मानी जाती है। रोजाना कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेने से दिमाग को आराम मिलता है और स्ट्रेस कम होता है। देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे दिमाग लगातार एक्टिव रहता है और नींद प्रभावित होती है। योग और मेडिटेशन भी तनाव कम करने का बेहद असरदार तरीका माना जाता है। रोजाना 15 से 20 मिनट ध्यान लगाने या प्राणायाम करने से दिमाग शांत होता है और शरीर रिलैक्स महसूस करता है। 

खासकर गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज नर्वस सिस्टम को शांत करने में मदद करती है। इसके अलावा अपनी डाइट पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है। ज्यादा जंक फूड, तला-भुना खाना और अनियमित भोजन शरीर की ऊर्जा को प्रभावित करता है। हरी सब्जियां, फल, ड्राई फ्रूट्स और प्रोटीन से भरपूर भोजन दिमाग और शरीर दोनों को स्वस्थ रखने में मदद करता है। काम के दौरान सही पोस्चर में बैठना भी जरूरी है। गलत तरीके से बैठने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है, जो सिरदर्द की वजह बन सकता है। इसलिए कुर्सी और कंप्यूटर स्क्रीन की सही ऊंचाई बनाए रखना जरूरी है। मानसिक तनाव कम करने के लिए काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन बनाना भी बेहद जरूरी है। 

ऑफिस का तनाव घर तक न लाएं। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना, पसंदीदा संगीत सुनना या अपनी हॉबी को समय देना दिमाग को रिलैक्स करता है। अगर लगातार सिरदर्द की समस्या बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बार-बार दर्द निवारक दवाइयां लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है। कई बार लगातार सिरदर्द शरीर में किसी दूसरी समस्या का संकेत भी हो सकता है। आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य का। काम जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी आपका स्वास्थ्य है। अगर शरीर और दिमाग स्वस्थ रहेंगे, तभी व्यक्ति बेहतर तरीके से काम कर पाएगा और जिंदगी का आनंद ले सकेगा।

हैचबैक सेगमेंट में टाटा मोटर्स का बड़ा दांव, नए डिजाइन और 6 एयरबैग के साथ टियागो फेसलिफ्ट जल्द होगी लॉन्च

भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रही टाटा मोटर अब अपनी लोकप्रिय हैचबैक कार टाटा टियागो (Tata Tiago) को नए अंदाज में पेश करने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी नई टाटा टियागो फेसलिफ्ट को 28 मई के आसपास भारतीय बाजार में लॉन्च कर सकती है। माना जा रहा है कि यह अपडेटेड मॉडल डिजाइन, फीचर्स और सेफ्टी के मामले में पहले से कहीं ज्यादा बेहतर होगा। खास बात यह है कि नई टियागो फेसलिफ्ट सीधे तौर पर Maruti Suzuki WagonR जैसी लोकप्रिय कारों को चुनौती देती नजर आ सकती है। पिछले कुछ वर्षों में टाटा मोटर्स ने भारतीय ग्राहकों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई है। कंपनी की कारों को खासतौर पर उनकी मजबूती, सेफ्टी और दमदार बिल्ड क्वालिटी के लिए पसंद किया जाता है। टियागो भी कंपनी की उन कारों में शामिल है जिसने कम कीमत में प्रीमियम अनुभव देकर ग्राहकों का भरोसा जीता है। अब कंपनी इसके फेसलिफ्ट वर्जन के जरिए इसे और ज्यादा मॉडर्न और एडवांस बनाने जा रही है। 

नई टाटा टियागो फेसलिफ्ट के डिजाइन में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। बताया जा रहा है कि कंपनी इसके फ्रंट लुक को ज्यादा आकर्षक और स्पोर्टी बनाने पर काम कर रही है। नई कार में रीडिजाइन फ्रंट ग्रिल दिया जा सकता है, जो इसे ज्यादा प्रीमियम अपील देगा। इसके साथ नए LED हेडलैंप और शार्प DRLs कार को आधुनिक लुक देंगे। फ्रंट और रियर बंपर को भी नए डिजाइन के साथ पेश किया जा सकता है ताकि कार पहले से ज्यादा स्टाइलिश दिखाई दे। कार के साइड प्रोफाइल में नए डिजाइन वाले 15 इंच के अलॉय व्हील देखने को मिल सकते हैं। वहीं पीछे की तरफ अपडेटेड टेललैंप और स्पोर्टी टच के साथ नया डिजाइन ग्राहकों को आकर्षित कर सकता है। 

कुल मिलाकर कंपनी इस फेसलिफ्ट मॉडल को युवाओं और फैमिली दोनों वर्गों को ध्यान में रखकर तैयार कर रही है। इंटीरियर की बात करें तो नई टियागो फेसलिफ्ट में केबिन अनुभव को और बेहतर बनाया जा सकता है। इसमें नया डैशबोर्ड लेआउट, अपडेटेड सेंटर कंसोल और प्रीमियम फिनिश वाली नई अपहोल्स्ट्री देखने को मिल सकती है। कार के अंदर पहले से ज्यादा प्रीमियम और आधुनिक फील मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा कंपनी केबिन स्पेस और कम्फर्ट पर भी खास ध्यान दे सकती है। 

फीचर्स की बात करें तो टाटा अपनी इस नई हैचबैक को एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस कर सकती है। इसमें बड़ा 10.25 इंच टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम दिया जा सकता है, जो वायरलेस Android Auto और Apple CarPlay सपोर्ट करेगा। इसके अलावा ऑटोमैटिक क्लाइमेट कंट्रोल, इलेक्ट्रिकली एडजस्टेबल ORVMs, कूल्ड ग्लव बॉक्स, फ्रंट फॉग लैंप और प्रीमियम साउंड सिस्टम जैसे फीचर्स भी देखने को मिल सकते हैं। कंपनी मौजूदा मॉडल के मुकाबले इस फेसलिफ्ट को ज्यादा स्मार्ट और टेक-फ्रेंडली बनाने की तैयारी में है।

नई टाटा टियागो फेसलिफ्ट में सेफ्टी पर भी कंपनी का बड़ा फोकस

नई टाटा टियागो फेसलिफ्ट में सेफ्टी पर भी कंपनी बड़ा फोकस कर सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें 6 एयरबैग दिए जाने की संभावना है, जो इस सेगमेंट में इसे मजबूत दावेदार बना सकता है। इसके अलावा ABS with EBD, इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी प्रोग्राम यानी ESP, हिल होल्ड कंट्रोल, TPMS, रियर डिफॉगर और रिवर्स कैमरा जैसे कई जरूरी सेफ्टी फीचर्स भी इसमें शामिल रह सकते हैं। टाटा मोटर्स पहले से ही अपनी कारों की सुरक्षा को लेकर चर्चा में रहती है और नई टियागो फेसलिफ्ट भी इसी रणनीति को आगे बढ़ा सकती है।

इंजन की बात करें तो कंपनी इसमें ज्यादा बदलाव करने के मूड में नजर नहीं आ रही है। नई टियागो फेसलिफ्ट में वही 1.2 लीटर Revotron पेट्रोल इंजन मिलने की उम्मीद है, जो मौजूदा मॉडल में दिया जाता है। 

यह इंजन अच्छा माइलेज और संतुलित परफॉर्मेंस देने के लिए जाना जाता है। इसके साथ CNG विकल्प भी जारी रह सकता है, जिससे यह कार उन ग्राहकों के लिए भी बेहतर विकल्प बन जाएगी जो कम खर्च में ज्यादा माइलेज चाहते हैं। ट्रांसमिशन विकल्पों में 5 स्पीड मैनुअल गियरबॉक्स और 5 स्पीड AMT का विकल्प मिल सकता है। यानी ग्राहक अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से ट्रांसमिशन चुन सकेंगे। शहरों में ड्राइविंग करने वाले ग्राहकों के लिए AMT वेरिएंट खास आकर्षण बन सकता है। भारतीय बाजार में हैचबैक सेगमेंट हमेशा से बेहद प्रतिस्पर्धी रहा है। 

ऐसे में नई टियागो फेसलिफ्ट की एंट्री से मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। खासतौर पर वैगनआर, सेलेरियो और ग्रैंड i10 Nios जैसी कारों को इससे सीधी चुनौती मिलने की संभावना है। टाटा मोटर्स अगर इसे आकर्षक कीमत पर लॉन्च करती है तो यह कार बाजार में बड़ा असर डाल सकती है। ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि टाटा मोटर्स इस फेसलिफ्ट मॉडल के जरिए युवाओं, पहली बार कार खरीदने वालों और फैमिली ग्राहकों को एक साथ टारगेट कर सकती है। बेहतर डिजाइन, प्रीमियम फीचर्स, मजबूत सेफ्टी और CNG विकल्प जैसी खूबियां इसे बाजार में मजबूत दावेदार बना सकती हैं। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कंपनी इसे किस कीमत और किन वेरिएंट्स में लॉन्च करती है।