विकास की पटरी पर उत्तराखंड, अगले साल से शुरू होगा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल ट्रैक
पहाड़ों में सफर हमेशा से चुनौती और धैर्य की परीक्षा रहा है। संकरी सड़कें, मौसम की मार और लंबा समय ये सब उत्तराखंड के लोगों और यहां आने वाले यात्रियों की रोजमर्रा की कहानी का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब यह तस्वीर बदलने जा रही है। वर्षों से इंतजार में रही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ एक रेल लाइन नहीं, बल्कि पहाड़ों के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। उत्तराखंड के लिए यह परियोजना विकास, सुविधा और सुरक्षा का नया अध्याय लिखने जा रही है। वर्ष 2027 की शुरुआत में इस मार्ग पर परीक्षण रेल चलाने की तैयारी है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि अब यह सपना साकार होने के बेहद करीब है। 125 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के शुरू होने के बाद ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक का सफर, जो अभी करीब 6 घंटे लेता है, वह घटकर लगभग 2 घंटे में पूरा हो सकेगा।इस परियोजना का सीधा लाभ देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली जैसे महत्वपूर्ण जिलों को मिलेगा।
मई 2026 से शिवपुरी और ब्यासी के बीच लगभग 13 किलोमीटर लंबे हिस्से पर पटरियां बिछाने का काम शुरू किया जा रहा है। यही वह खंड होगा, जहां सबसे पहले परीक्षण रेल दौड़ाई जाएगी। अधिकारियों का अनुमान है कि दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 तक यह परीक्षण संभव हो सकेगा, जबकि पूरी परियोजना को वर्ष 2028 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस रेल परियोजना की लागत भी समय के साथ बढ़ी है। शुरुआत में जहां इसकी लागत 16,216 करोड़ रुपये आंकी गई थी, वहीं अब निर्माण की चुनौतियों और तकनीकी बदलावों के कारण यह बढ़कर लगभग 38 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। पहाड़ी क्षेत्र में निर्माण कार्य करना अपने आप में जटिल होता है, और यही वजह है कि इस परियोजना को विशेष इंजीनियरिंग के साथ तैयार किया जा रहा है। पूरे मार्ग का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा, जो इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत है। कुल 16 मुख्य और 12 सहायक सुरंगों का निर्माण किया जा रहा है, जिनमें से अधिकतर का काम पूरा हो चुका है। इसके अलावा 19 बड़े और 31 छोटे पुल भी बनाए जा रहे हैं, जो इस रेल लाइन को मजबूत और सुरक्षित बनाएंगे।
परियोजना के तहत कुल 13 रेलवे स्टेशन विकसित किए जा रहे हैं। ऋषिकेश के वीरभद्र और योगनगरी स्टेशन अभी से सक्रिय हैं, जबकि अन्य स्थानों पर तेजी से काम चल रहा है। कर्णप्रयाग को इस मार्ग का प्रमुख केंद्र बनाया जाएगा, जहां बड़े स्तर पर रेल सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इस परियोजना की एक खास बात यह भी है कि परीक्षण के लिए इंजन और डिब्बे को शिवपुरी-ब्यासी खंड पर ही तैयार किया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर ही तकनीकी परीक्षण किया जा सके। यह कदम सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। यह रेल लाइन न केवल दूरी कम करेगी, बल्कि खराब मौसम और भूस्खलन के दौरान भी संपर्क बनाए रखने में मदद करेगी। इससे सड़क मार्ग पर निर्भरता कम होगी और लोगों को एक भरोसेमंद विकल्प मिलेगा।
चारधाम यात्रा से लेकर अर्थव्यवस्था तक, हर क्षेत्र में दिखेगा असर
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का सबसे बड़ा प्रभाव चारधाम यात्रा पर पड़ेगा। अभी जहां यात्रियों को लंबा और थकाऊ सफर तय करना पड़ता है, वहीं रेल सुविधा आने के बाद यह यात्रा काफी हद तक आसान हो जाएगी। रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग तक तेज पहुंच होने से बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा का समय कई घंटों तक घट जाएगा। इससे श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी और यात्रा अधिक व्यवस्थित हो सकेगी। इसके अलावा सड़क मार्ग पर दबाव भी कम होगा। वर्तमान में भारी संख्या में वाहन एक ही मार्ग पर चलते हैं, जिससे जाम और दुर्घटनाओं की संभावना बनी रहती है। रेल सेवा शुरू होने के बाद यह दबाव कम होगा और यात्रा अधिक सुरक्षित बनेगी। पर्यटन के लिहाज से भी यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड के दूरस्थ और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर क्षेत्रों तक पहुंच आसान होने से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी। इसका सीधा असर स्थानीय व्यवसायों पर पड़ेगा। होटल, परिवहन, गाइड और छोटे व्यापारियों के लिए नए अवसर पैदा होंगे।
रेल लाइन का एक और बड़ा फायदा यह होगा कि यह हर मौसम में संपर्क बनाए रखने में सक्षम होगी। पहाड़ों में बारिश और भूस्खलन के कारण सड़कें अक्सर बंद हो जाती हैं, जिससे लोगों को भारी परेशानी होती है। रेल सेवा इन परिस्थितियों में भी एक स्थिर विकल्प प्रदान करेगी। आपदा के समय यह परियोजना जीवन रक्षक साबित हो सकती है। राहत और बचाव कार्यों को तेज करने में मदद मिलेगी और आवश्यक सामान को प्रभावित क्षेत्रों तक जल्दी पहुंचाया जा सकेगा। यह परियोजना केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है।
करीब 100 साल पहले देखे गए इस सपने को अब साकार होते देखना अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण है। 1927 में दरवान सिंह नेगी द्वारा किए गए पहले सर्वे से लेकर आज तक इस परियोजना ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पहाड़ों में रेल को जरूरी बताया था। लंबे समय तक यह योजना ठहराव में रही, लेकिन अब यह तेजी से आगे बढ़ रही है। 2019 में केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी मिलने के बाद काम में तेजी आई और तमाम चुनौतियों के बावजूद परियोजना लगातार आगे बढ़ती रही। आज जब इसका अधिकांश हिस्सा पूरा हो चुका है, तो यह साफ है कि आने वाले समय में यह रेल लाइन उत्तराखंड के विकास की रीढ़ बनेगी। कुल मिलाकर, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना न केवल एक परिवहन सुविधा है, बल्कि यह उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक जीवन को नई दिशा देने वाली पहल है। आने वाले वर्षों में यह परियोजना राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

