जानलेवा बनता जा रहा बढ़ता तापमान– ज्ञानेन्द्र रावत

बढ़ता तापमान अब जानलेवा बनता जा रहा है। देखा जाये तो मौजूदा दौर में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। असलियत में हीटवेव कहें, उष्ण लहर कहें या फिर लू कहें, की तीव्रता और घातकता में दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। दिन-ब-दिन बढ़ते तापमान और गर्म हवा के भीषण थपेड़ों ने दिन तो दिन रातों में भी जीना हराम कर दिया है। रातों में भी लू जैसे हालात से लोग चैन की नींद तक नहीं ले पा रहे हैं।मौसम विभाग भी कह रहा है कि अगले हफ्ते तक इस गर्मी से निजात मिल पाना संभव नहीं है।और तो और आने वाले दिनों में पारा 47-48 डिग्री को भी पार कर जायेगा, ऐसी आशंका है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सवाल है, वहां तापमान 45 डिग्री के ऊपर पहुंच गया है। वह तप रही है और आग की भट्टी बनकर रह गयी है। मौसम विभाग की मानें तो इस हफ्ते देश के उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत और देश के कई हिस्सों यथा- पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, विदर्भ, मराठवाडा,मध्य महाराष्ट्र,बिहार और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को भीषण लू का सामना करना पड़ेगा। यही नहीं तापमान में अगले दिनों में धीरे-धीरे दो से चार डिग्री तक की बढ़त हालात को और विषम बना देगी। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का बांदा जिला बीते दिनों सूरज के तीखे तेवरों का शिकार रहा और यहां के लोग 48 डिग्री सेल्सियस की गर्मी की तपिश में बेहाल झुलसते दिखे। फिर नौतपा के कहर जिसका असर 25 मई से 2 जून तक रहेगा और जिसमें तापमान 48 डिग्री सेल्सियस पहुंचने की चेतावनी दी गयी है, इस खतरे को और भयावह बना देगा।

इस बाबत हुए अध्ययनों से पता चलता है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। 1950 के बाद से अबतक हीटवेव की भयावहता और उसके कारणों का विश्लेषण करने के बाद खुलासा हुआ है कि जो हीटवेव साल 1950 और साल 2000 के बीच चलती थी, उसमें और मौजूदा हीटवेव में काफी अंतर आ चुका है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूरोपीय मौसम विज्ञान एजेंसी कापरनिक्स का कहना है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री और ज्यादा गर्म हो चुकी है। इससे मानव स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए मानव जनित जलवायु परिवर्तन पूरी तरह जिम्मेदार है। गौरतलब है कि इसमें प्राकृतिक कारणों से उपजे जलवायु परिवर्तन की भूमिका लगभग नगण्य ही है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ-साथ मौसम में भी कई बदलाव देखे जाने का उल्लेख है। इनमें सतह के वायु दबाव में बढ़ोतरी, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न मैं हुए काफी बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट की मानें तो इन बदलावों में नमी का बढ़ना, हवाओं की गति में यकायक कमी और सर्दी प्रमुख है। इसके अलावा पिछले 80 वर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्याधिक गर्मी का अनुभव करने वाले दिनों की तादाद भी तीन गुणा हो गयी है। दरअसल 1940 के दशक में औसतन वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना लगभग 15 दिन अत्याधिक गर्मी देखी जाती थी लेकिन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष हो गया है। प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडेमी आफ साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अब समुद्री हीटवेव लम्बे समय तक सामान्य से काफी ऊपर रहती है। यह भी कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते अत्याधिक समुद्री गर्मी की घटनाएं लम्बे समय तक बनी रहती हैं।

असलियत में तापमान में बढ़ोतरी से घातक लू चलने की घटनाओं में बीते दशकों में तेजी से वृद्धि हुई है। बीते दो दशक तो लू से मरने वालों की तादाद में हुई बढ़ोतरी के जीते-जागते सबूत हैं। हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इसमें पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं। यहां करीब 14 फीसदी मौतें हुयी हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशक में हर साल कुल 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। यह भी कि हर साल गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया से और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में हुई हैं। फिर जलवायु परिवर्तन ने एशिया में हीटवेव की तीव्रता को काफी बढा़ने में अहम भूमिका निबाही है। इससे अरबों लोग प्रभावित हुए हैं। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।

ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के नये अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि इसी प्रकार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की घटनाओं में और बढ़ोतरी हुयी तो उससे लू सम्बन्धी मामलों में मृत्यु दर बढ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। गौरतलब है 2003 में यूरोप में 47.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पहुंच गया था जिससे लू लगने के दौरान 45 हजार लोगों की मौत हो गयी थी। बीते 20 सालों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। इसके अलावा 2013 से यूरोप, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा सहित दुनिया के 47 देशों के 748 शहरों में गर्मी से सम्बन्धित मृत्यु दर सम्बन्धी आंकडे़ के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि लू की घटनाओं में कहीं भी कमी नहीं आयी है और वहां लू से मरने वालों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुई रिकार्ड बढ़त और तापमान में लगातार होती बढ़ोतरी के चलते हीटवेव की भयावहता की आशंका व्यक्त की है।

दरअसल हीटवेव की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका व्यक्त की गयी है। विशेषज्ञों की मानें तो हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्याधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाईड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफडो़ं की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुडे़ लोग ज्यादा आते हैं। इन पर हीटवेव का जोखिम ज्यादा रहता है। फिर पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं है कि बीते बरसों में हर महाद्वीप को हीटवेव ने प्रभावित किया है। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी हुई। साल 1992 से लेकर अभी तक लू के चलते तकरीब 24 हजार लोगों की मौतें हुयी हैं। आने वाले सालों में 60 करोड़ लोग इससे सर्वाधिक प्रमावित होंगे। इससे 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी दर्ज की जायेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की मानें तो 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। चिंता की बात यह है कि यदि तापमान वृद्धि की दर पर अंकुश नहीं लगा तो सदी के अंत तक गर्मी से 1.5 करोड़ लोग मौत के मुहाने तक पहुंच जायेंगे।

कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस का उत्सर्जन स्तर यदि 2050 तक यही रहा तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर तक पहुंच जायेगी। उसका नतीजा लाखों लोगों की मौत होगा। यह भी कि प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में बढो़तरी से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव की घटनाओं में बढो़तरी होगी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार धरती के गर्म होने की रफ्तार अनुमान से कहीं ज्यादा है। अहम सवाल कार्बन उत्सर्जन कम करने का है, यदि ऐसा नहीं हुआ जिसकी संभावना अधिक है। उस दशा में सदी के आखिर तक धरती का तापमान बढ़कर चार डिग्री सेल्सियस पहुंच जायेगा। उस दशा में धरती रहने काबिल बची रह पायेगी?
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

लोकतंत्र और पत्रकारिता के प्रहरी थे स्वर्गीय हेमंत विश्नोई

मनोज वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार संसद टीवी
स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई भारतीय पत्रकारिता के उन चुनिंदा नामों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों, साहस और सत्यनिष्ठा से पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया। उनका पूरा जीवन सच के पक्ष में खड़े रहने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित रहा। वे ऐसे दौर में पत्रकारिता कर रहे थे जब सत्ता के दबाव के सामने झुकना आसान था लेकिन हेमंत विश्नोई ने कभी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उनकी लेखनी में निर्भीकता, स्पष्टता और जनसरोकारों की गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। वे मानते थे कि पत्रकार का पहला दायित्व जनता, समाज और राष्ट्र के प्रति होता है न कि सत्ता के लिए। हेमंत बिश्नोई की पत्रकारिता में आम जनता की समस्याओं, सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को विशेष महत्व मिलता था। वे पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता के साथ साथ सत्ता से सवाल पूछने का साहस भी दिखाई देता था। यही कारण है कि वे लोगों के बीच अत्यंत सम्मानित रहे।

आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र का एक कठिन काल था। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति की आवाजों को दबाने का प्रयास किया गया। ऐसे कठिन समय में भी हेमंत विश्नोई ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 1975-77 में आपातकाल और छात्र आंदोलन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के साथ हेमंत विश्नोई भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में सक्रिय थे। उस समय अरुण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और उन्होंने आपातकाल विरोधी गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। 19 माह तक जेल में रहना पड़ा लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि यह लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था। जेल की यातनाएं और कठिन परिस्थितियाँ भी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकीं। वे अंत तक सच और न्याय के पक्षधर बने रहे।

आज जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों और दबावों का सामना कर रही है तब हेमंत विश्नोई का जीवन और कार्य नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि सच्ची पत्रकारिता वही है जो निष्पक्ष, ईमानदार और निर्भीक हो। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई का जीवन लोकतंत्र, सत्य और पत्रकारिता की गरिमा के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ने पत्रकार समाज को संगठित करने का कार्य किया। वे मानते थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत हो सकता है जब पत्रकार आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर रूप से सुरक्षित हों। इसी सोच के साथ उन्होंने पत्रकारों की कार्य स्थितियों, वेतन, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों को लगातार उठाया। बिश्नोई जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड की मांग को लेकर किए गए संघर्ष में रहा। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन अत्यंत आवश्यक था। उन्होंने देखा कि अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं लेकिन उन्हें उचित वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसी कारण उन्होंने श्रम कानूनों में सुधार और पत्रकारों के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया। उन्होंने विभिन्न मंचों, संगठनों और विचार गोष्ठियों के माध्यम से पत्रकारों की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनका स्पष्ट मत था कि पत्रकारों को भी अन्य कर्मचारियों की तरह सम्मानजनक वेतन स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, पेंशन तथा सुरक्षित कार्य वातावरण मिलना चाहिए। वे पत्रकारों के शोषण के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाते थे और मीडिया संस्थानों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की वकालत करते थे। हेमंत बिश्नोई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और पत्रकार संगठनों को एकजुट कर आंदोलन को मजबूत बनाया।स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का व्यक्तित्व संघर्षशील होने के साथ साथ प्रेरणादायक भी था। वे संवाद और संगठन की शक्ति में विश्वास रखते थे। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर उन्होंने अनेक मंचों पर आवाज उठाई और यह साबित किया कि संगठित प्रयासों से बदलाव संभव है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई की नेतृत्व क्षमता का प्रभाव यह था कि वे केवल वरिष्ठ पत्रकारों तक सीमित नहीं रहे बल्कि युवा पत्रकारों को भी संगठन से जोडते रहे। वे हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है। इसी कारण वे पत्रकारों के अधिकारों के साथ साथ पत्रकारिता की गरिमा और नैतिक मूल्यों की भी बात करते थे।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल समाचार लिखने तक सीमित नहीं रहते बल्कि अपने विचारों, लेखनी और वैचारिक प्रतिबद्धता से समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता को केवल एक विचार नहीं बल्कि जन चेतना का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया। हेमंत बिश्नोई का मानना था कि पत्रकारिता केवल सत्ता से प्रश्न पूछने का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रहित और समाज हित के पक्ष में जनमत निर्माण का दायित्व भी है। यही कारण था कि उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। उन्होंने पत्रकारिता को पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव से हटाकर भारतीय दृष्टिकोण से देखने और समझने का प्रयास किया। जब देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस होती थी तब स्व हेमंत विश्नोई ने निर्भीक होकर अपनी बात रखी। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ राष्ट्रहित की मर्यादा को भी उतना ही आवश्यक माना। उनकी लेखनी में संतुलन, तर्क और राष्ट्र के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई देता था। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है जिसकी रक्षा प्रत्येक जागरूक नागरिक और पत्रकार का कर्तव्य है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय भी उनके चिंतन और लेखन का प्रमुख हिस्सा रहा। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को केवल धार्मिक मुद्दा नहीं माना बल्कि भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न बताया। अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भगवान श्रीराम भारत की आस्था, आदर्श और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ा विषय था। हेमंत विश्नोई ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से यह सिद्ध किया कि राष्ट्रवादी विचारधारा संकीर्णता नहीं बल्कि भारत की विविधता, संस्कृति और परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ने की भावना है। उन्होंने हमेशा भारतीयता को केंद्र में रखकर लेखन किया और युवा पत्रकारों को भी राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। हेमंत विश्नोई ने सदैव उन विषयों को प्रमुखता दी जो देश की अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े थे। चाहे आतंकवाद का प्रश्न हो सीमा सुरक्षा का विषय हो या कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा , उन्होंने बिना किसी दबाव या भय के अपनी बात रखी। उनका मानना था कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सत्ता से प्रश्न पूछना ही नहीं बल्कि राष्ट्रहित के पक्ष में जनमत तैयार करना भी है।उनका कहना था कि धारा 370 ने वर्षों तक कश्मीर को मुख्यधारा से दूर रखा और अलगाववाद को बढ़ावा दिया। वे अपने लेखों और वक्तव्यों में यह तर्क देते थे कि जब देश के अन्य राज्यों के नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो कश्मीर भी समान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए। असल में हेमंत बिश्नोई की लेखनी में राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा नहीं था बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समन्वय था। वे मानते थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देना नहीं हो सकता। इसी कारण उनकी पत्रकारिता में स्पष्टता, तर्क और राष्ट्र प्रेम का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से गहरा आत्मीय रिश्ता था। बरेली की गलियों, वहां की संस्कृति और अपने लोगों की चर्चा वे अक्सर बड़े अपनत्व के साथ किया करते थे। उनके शब्दों में हमेशा अपने शहर के प्रति सम्मान और लगाव झलकता था। वे अपनी पारिवारिक जड़ों से पूरी तरह जुड़े हुए व्यक्ति थे जिन्होंने जीवन भर रिश्तों और मूल्यों को सर्वोपरि रखा। खुद भी बरेली का रहने वाला हूं और जब दिल्ली आया तो 1992 में सर्व प्रथम स्वर्गीय हेमंत जी से परिचय हुआ तब पता चला कि उनके रिश्तों की डोर बरेली के बडे बाजार से भी जुड़ी है। हेमंत जी ने एक बडे भाई के रूप में सदैव मार्गदर्शन मिला। सही मानों में वे केवल एक पत्रकार नहीं बल्कि संवेदनशील इंसान और सच्चे मार्गदर्शक थे। पत्रकारिता जगत में भी उनका व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायी रहा। कठिन परिस्थितियों में वे अपने पत्रकार साथियों के साथ मजबूती से खड़े रहते थे। चाहे किसी साथी पर संकट हो या किसी युवा पत्रकार को मार्गदर्शन की आवश्यकता। हेमंत विश्नोई हमेशा एक संरक्षक और शुभचिंतक की भूमिका में दिखाई देते थे। उनका व्यवहार सहज, सहयोगी और आत्मीय था जिसने उन्हें सभी के बीच विशेष सम्मान दिलाया। आज जब पत्रकारिता कई बार वैचारिक भ्रम और बाजारवाद के दबाव में दिखाई देती है तब स्व हेमंत विश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनकी लेखनी हमें यह संदेश देती है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य समाज को सत्य संस्कार और राष्ट्रचेतना से जोड़ना होना चाहिए। स्व. हेमंत विश्नोई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार, उनकी लेखनी और राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण सदैव प्रेरणा देता रहेगा। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।आज भले ही हेमंत विश्नोई हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पत्रकारों के अधिकारों और श्रम कानूनों को लेकर उनकी सोच और संघर्ष प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए पत्रकारों का सम्मान और सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। पत्रकार हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सदैव स्मरणीय रहेगी।

आज जब मीडिया जगत नई चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है तब हेमंत विश्नोई जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन पत्रकार एकता, अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का संदेश देता है। पत्रकार समाज हमेशा उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करेगा। आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग सनसनी और राजनीतिक पक्षधरता के आरोपों से घिरा दिखाई देता है तब हेमंत बिश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने दिखाया कि निष्पक्षता का अर्थ राष्ट्रहित से विमुख होना नहीं बल्कि सत्य और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होना है। स्व हेमंत विश्नोई की राष्ट्रवादी पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन और लेखन यह संदेश देता है कि कलम की शक्ति तब सबसे प्रभावशाली होती है जब वह राष्ट्र और समाज के हित में समर्पित हो। उनकी निर्भीक आवाज भले ही आज हमारे बीच न हो लेकिन उनके विचार और सिद्धांत सदैव भारतीय पत्रकारिता को दिशा देते रहेंगे।