सीजफायर के बाद फिर भड़का मिडिल ईस्ट, लेबनान पर इजरायली हमले, ईरान की जवाबी कार्रवाई से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर बढ़ा दबाव

अमेरिका और ईरान के बीच घोषित युद्धविराम की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि मिडिल ईस्ट में हालात फिर से विस्फोटक हो गए। सीजफायर लागू होने के कुछ ही घंटों बाद इजरायल ने लेबनान पर बड़ा हमला कर दिया, जिसके जवाब में ईरान ने मिसाइल दागते हुए क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया। इस घटनाक्रम ने युद्धविराम की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने आगे की रणनीति तय करना बड़ी चुनौती बन गया है। जानकारी के मुताबिक, बुधवार को इजरायल ने लेबनान के कई ठिकानों को निशाना बनाते हुए करीब 100 मिसाइलों से हमला किया। हमले में 254 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल बताए जा रहे हैं। यह हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर लागू हुआ ही था और क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन अचानक हुए इस हमले ने स्थिति को फिर से अस्थिर कर दिया। हमले के जवाब में ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। 

ईरान की ओर से इजरायल और खाड़ी देशों की दिशा में मिसाइलें दागी गईं। साथ ही तेहरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी फिर से शुरू करने का ऐलान किया। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है और तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। ईरान का कहना है कि किसी भी युद्धविराम या समझौते में लेबनान की स्थिति को शामिल करना जरूरी है। तेहरान का आरोप है कि लेबनान में जारी हमलों को नजरअंदाज कर शांति कायम नहीं की जा सकती। दूसरी ओर अमेरिका और इजरायल इसे अलग संघर्ष बताते हुए सीजफायर से सीधे तौर पर जोड़ने से बच रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा कि बेरूत और लेबनान में हुई झड़पें अलग घटनाएं हैं और उनका सीजफायर से सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि लेबनान का मुद्दा बाद में सुलझाया जाएगा और फिलहाल मुख्य ध्यान ईरान से जुड़े समझौते पर रहेगा। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ संकेत दिया है कि उनका लक्ष्य ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को कमजोर करना और लेबनान में हिज्बुल्लाह को पूरी तरह खत्म करना है। इस बीच क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। खाड़ी देशों ने भी सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिए हैं और कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के रूट बदले जा रहे हैं। समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। अगर यह टकराव जारी रहा तो युद्धविराम टिकना मुश्किल हो सकता है और संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने तीन रास्ते, कूटनीति या टकराव?

बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अब तीन बड़े विकल्प माने जा रहे हैं। पहला विकल्प है कि अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाए और युद्धविराम को समाप्त मानकर दबाव बनाए। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। दूसरा विकल्प कूटनीति को आगे बढ़ाने का है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को पाकिस्तान भेजने की योजना पर विचार किया जा रहा है, जहां ईरान से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की शुरुआत हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, ईरान वेंस को बातचीत के लिए अपेक्षाकृत भरोसेमंद मानता है। इस पहल के जरिए अमेरिका तनाव कम करने की कोशिश कर सकता है। तीसरा विकल्प इजरायल पर दबाव बनाकर लेबनान पर हमले रोकने का है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सबसे कठिन रास्ता है, क्योंकि इजरायल अपने सुरक्षा हितों को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। नेतन्याहू सरकार ने पहले ही संकेत दिया है कि वह हिज्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी। ऐसे में अमेरिका के लिए इजरायल को रोकना आसान नहीं होगा। 

अगर अमेरिका कूटनीतिक रास्ता चुनता है तो उसे एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। एक तरफ संभावित बातचीत के जरिए ईरान को शांत करना होगा, तो दूसरी तरफ इजरायल से हमले रोकने की अपील करनी होगी। ईरान की भी कई शर्तें बताई जा रही हैं, जिनमें अमेरिकी सैनिकों की वापसी, प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था शामिल है। इन मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा। इस पूरे घटनाक्रम का असर तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। सीजफायर की घोषणा के बाद तेल कीमतों में थोड़ी नरमी आई थी और ब्रेंट क्रूड तथा डब्ल्यूटीआई 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहे। लेकिन नई सैन्य गतिविधियों के बाद कीमतों में फिर उछाल की आशंका बढ़ गई है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ता है या आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा बन सकती है। पहले ही महंगाई और आपूर्ति संकट से जूझ रही दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। ऐसे में अब सबकी नजर अमेरिका की अगली रणनीति पर टिकी है। यदि कूटनीति सफल नहीं होती, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ सकता है।

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