नीतीश युग के बाद बिहार में एनडीए की नई सरकार: “सम्राट चौधरी के हाथों में प्रदेश की बागडोर”, 24वें मुख्यमंत्री के रूप में ली शपथ
बिहार की राजनीति में बुधवार का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया, जब सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर राज्य की कमान संभाली। पटना स्थित लोकभवन में आयोजित भव्य समारोह में सुबह 11 बजे राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसी के साथ सम्राट चौधरी बिहार के 24वें मुख्यमंत्री बन गए और राज्य के इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता इस पद तक पहुंचा। शपथ ग्रहण समारोह बेहद गरिमामय और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। इसमें कई बड़े राजनीतिक चेहरे मौजूद रहे, जिनमें केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और भाजपा के वरिष्ठ नेता शामिल थे। समारोह में मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह का माहौल साफ नजर आया। सम्राट चौधरी के साथ ही नई सरकार के गठन का भी औपचारिक ऐलान हुआ।
जदयू के वरिष्ठ नेता विजय चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, नई एनडीए सरकार के गठन के बावजूद अभी भी कैबिनेट में 33 मंत्री पद खाली हैं, जिससे आने वाले दिनों में विस्तार की संभावनाएं बनी हुई हैं। शपथ के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया। सम्राट चौधरी से मुलाकात के बाद चिराग पासवान ने इसे भावुक पल बताते हुए कहा कि बिहार ने लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व को देखा है, लेकिन अब एक नई जिम्मेदारी सम्राट चौधरी के कंधों पर है।
उन्होंने कहा कि सभी सहयोगियों के बीच इस बात पर सहमति थी कि राज्य को आगे बढ़ाने के लिए नया नेतृत्व जरूरी है। चिराग पासवान ने यह भी कहा कि भले ही उनके और नीतीश कुमार के बीच पहले राजनीतिक मतभेद रहे हों, लेकिन वह केवल विचारों का अंतर था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उनके पिता और नीतीश कुमार वर्षों तक सहयोगी रहे हैं। ऐसे में यह बदलाव भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है। नई सरकार के सामने कई चुनौतियां भी हैं। बिहार जैसे बड़े और सामाजिक रूप से जटिल राज्य में विकास, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे हमेशा से प्राथमिकता में रहे हैं। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और जनता की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है।
साधारण पृष्ठभूमि से सत्ता के शिखर तक, सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा का परिणाम है। उनकी राजनीति में एंट्री पारिवारिक विरासत से जरूर जुड़ी रही, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान खुद के दम पर बनाई है। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से की थी। राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें मंत्री बनने का मौका मिला, जिससे उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी प्राप्त हुआ। हालांकि, 2005 में राजद के सत्ता से बाहर होने के बाद भी वह लंबे समय तक पार्टी से जुड़े रहे। वर्ष 2014 में उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए जदयू का दामन थाम लिया। उस समय जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे और राज्य की राजनीति में बदलाव का दौर चल रहा था। लेकिन उनका यह सफर यहां भी ज्यादा लंबा नहीं चला और 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का रुख कर लिया।
भाजपा में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी ने तेजी से अपनी पहचान बनाई। एक प्रभावशाली वक्ता और कोइरी समुदाय के मजबूत नेता के रूप में उन्होंने संगठन में अपनी जगह मजबूत की। पार्टी ने उन्हें राज्य इकाई का उपाध्यक्ष बनाया और बाद में विधान परिषद का सदस्य भी बनाया गया। 2020 के विधानसभा चुनावों के बाद बनी सरकार में उन्हें मंत्री पद मिला, जहां उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन किया। मार्च 2023 में उन्हें भाजपा की बिहार इकाई का अध्यक्ष बनाया गया, जो उनके राजनीतिक कद में एक बड़ा उछाल साबित हुआ।
सम्राट चौधरी की राजनीति का एक दिलचस्प पहलू उनका वह संकल्प भी रहा, जिसमें उन्होंने पगड़ी पहनने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से नहीं हटेंगे, वह अपनी पगड़ी नहीं उतारेंगे। हालांकि, बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ उन्होंने अपने रुख में भी बदलाव किया और नीतीश कुमार के भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हो गए। उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विजय कुमार सिन्हा के साथ पद साझा किया, लेकिन उनकी वास्तविक ताकत तब सामने आई जब उन्हें गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह वही विभाग था जिसे लंबे समय तक नीतीश कुमार अपने पास रखते थे, जिससे सम्राट चौधरी की बढ़ती राजनीतिक अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सम्राट चौधरी की खासियत यह भी रही है कि उन्होंने संगठन के शीर्ष नेतृत्व के साथ तालमेल बनाए रखा, जबकि उनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नहीं रही। यही संतुलन और राजनीतिक समझ उन्हें आज इस मुकाम तक लेकर आई है। अब मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बिहार को विकास के नए पथ पर आगे बढ़ाना और जनता के विश्वास को कायम रखना है। आने वाला समय ही बताएगा कि वह इस नई जिम्मेदारी को किस तरह निभाते हैं और राज्य की राजनीति में क्या नए अध्याय लिखते हैं।

