किशोर दा के गीतों से सजी महफिल

मानव सेवा क्लब के तत्वावधान में सदा बहार गायक किशोर कुमार की याद में रामपुर बाग के एक सभागार में कार्यक्रम आयोजित किया गया। गीत-संगीत की शाम किशोर कुमार के नाम महफ़िल का प्रारंभ मां शारदे की वंदना से अरुणा सिन्हा द्वारा किया गया।किशोर कुमार के गीत प्रस्तुत करने वाले बेहतरीन कलाकार अजय कुमार को किशोर कुमार स्मृति संगीत सम्मान दिया गया।यह सम्मान क्लब के अध्यक्ष सुरेन्द्र बीनू सिन्हा,महासचिव मुकेश सक्सेना तथा अजय कुमार ने प्रदान किया। गीत-संगीत की महफिल में सुरेन्द्र बीनू सिन्हा ने तेरी भीगी-भीगी सी सुनाकर लोगों की खूब वाहवाही लूटी। प्रकाश चंद्र सक्सेना का कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना,अरुणा सिन्हा का गीत मेरे दिल में आज क्या है जो कहे तो मैं बता दूं और जितेंद्र सक्सेना गीत तेरा जैसा यार तेरा कहाँ श्रोताओं ने बहुत पसंद किया।
सत्येंद्र सक्सेना का गीत चला जाता हूं किसी की धुन में ने वातावरण आनंदमय कर दिया।मुकेश सक्सेना ने पल भर के लिये कोई मुझे प्यार कर ले ,बेबी शर्मा ने कोरा कागज था यह मन मेरा और अजय कुमार ने किशोर कुमार के हिट गीत ज़िन्दगी के सफर में प्रस्तुत करके समा बांध दिया,प्रसिद्ध गायक डा. असित रंजन ने आपकी आंखों में कुछ महके हुए से राज हैं की शानदार प्रस्तुति दी। गायिका शकुन सक्सेना ने रिमझिम गिरे सावन पेश करके वातावरण गुंजायमान कर दिया। अनिल गुप्ता का गीत यह शाम मस्तानी ने खूब तालियां बटोरी। सभी का आभार महासचिव मुकेश कुमार ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में असित रंजन,गंगा राम पाल, ब्रजेश कुमार और सोनी शामिल रहे। संचालन सुरेन्द्र बीनू सिन्हा ने किया।

हिन्दू सनातन बोर्ड’ के गठन को लेकर, संतों का राष्ट्रीय आह्वान

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी प्रेस वार्ता में ‘श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास’ द्वारा 7 जून को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित होने वाली ‘अंतरराष्ट्रीय धर्म संसद’ की घोषणा की गई। इस आयोजन के माध्यम से न्यास ने सनातन संस्कृति की रक्षा और श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए एक व्यापक राष्ट्रव्यापी अभियान की रूपरेखा प्रस्तुत की है।

इस पूरे आयोजन और मांग पत्र का सबसे प्रमुख केंद्र ‘हिन्दू सनातन बोर्ड’ का गठन करना है। न्यास का मानना है कि सनातन धर्म की संपत्तियों, प्राचीन मंदिरों और धार्मिक व्यवस्थाओं के सुचारू व सुरक्षित संचालन के लिए एक सशक्त और स्वतंत्र ‘हिन्दू सनातन बोर्ड’ का होना समय की मांग है। इसके साथ ही, हिन्दुस्तान को आधिकारिक रूप से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने, देश में गौ माता के कत्लेआम को पूरी तरह रोकने और गौरवशाली सनातन संस्कृति के संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण मांगों को इस धर्म संसद के मुख्य एजेंडे में शामिल किया गया है। न्यास का संकल्प समाज को जाति-पाति के बंधनों से मुक्त कर एक अटूट सूत्र में पिरोना है।

प्रेस वार्ता में मौजूद संगठन के सभी प्रमुख पदाधिकारियों और प्रबुद्ध जनों ने इस धर्म संसद के उद्देश्यों को लेकर अपनी बात रखी। न्यास के अंतरराष्ट्रीय मुख्य संरक्षक श्री रूप सिंह नागर ने कहा कि हमारा उद्देश्य देशव्यापी संपर्क अभियान और धार्मिक यात्राओं के माध्यम से संतों, अखाड़ों और धार्मिक संगठनों को राष्ट्रहित में एक मंच पर लाना है। मुख्य याचिकाकर्ता श्री दिनेश फलाहारी जी महाराज ने न्यायपालिका पर अटूट भरोसा जताते हुए कहा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद में हमारे पक्ष ने न्यायालय में सभी पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं और कानूनी रूप से हमारी जीत सुनिश्चित है।

कार्यक्रम की सह-प्रभारी एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमती सोनिया ठाकुर ने इसे संपूर्ण सनातन समाज की सामूहिक आस्था का प्रश्न बताते हुए दिल्ली, मथुरा, आगरा और वृंदावन सहित पूरे देश से लाखों लोगों को शामिल होने का आह्वान किया। वहीं, महन्त श्री हर्षिल गिरी गोस्वामी जी ने प्राचीन धार्मिक मूल्यों के संरक्षण पर बल दिया, तो श्री महीपाल बिधूड़ी जी ने गौ माता की रक्षा के लिए देशव्यापी जन-जागरण फैलाने की बात कही।

राष्ट्रीय महामन्त्री डॉ. सिद्धांत भट्टाचार्य ने संगठन के ध्येय को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिंदुओं को जात-पात के भेदों में बंटने से रोकना और समाज को जागरूक करना ही हमारा मुख्य लक्ष्य है। श्री बिट्टू बजरंगी जी ने कहा कि समाज को पूरी तरह संगठित करके ही हम एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना को साकार कर सकते हैं। मुम्बई से आईं राष्ट्रीय ब्रैंड एम्बेसडर आराधना सोलंकी ने कहा कि महानगरों के युवाओं और मातृशक्ति को इस पावन अभियान से जोड़कर इसे एक ऐतिहासिक जनआंदोलन का रूप दिया जाएगा। उन्होंने “एकजुट हिंदू – सशक्त राष्ट्र” के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि यह धर्म संसद देश की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नई दिशा देने में मील का पत्थर साबित होगी।

ब्रह्माकुमारीज ने वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण का लिया संकल्प

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज संस्थान द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं हरित भारत के निर्माण हेतु विभिन्न स्थानों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी क्रम में डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क, मनोहर भूषण इंटर कॉलेज तथा ड्राइविंग ट्रेनिंग एवं टेस्टिंग इंस्टीट्यूट, बरेली में छायादार, फलदार एवं फूलदार पौधों का रोपण किया गया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क एवं मनोहर भूषण इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान यहां संस्थान के सदस्यों एवं नागरिकों ने विभिन्न प्रकार के पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। मनोहर भूषण इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य मनोज कुमार सक्सेना एवं विद्यालय के स्टाफ ने भी पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हुए पौधारोपण किया तथा अधिक से अधिक वृक्ष लगाने और उनकी नियमित देखभाल करने का संदेश दिया। सभी ने प्रकृति को सुरक्षित रखने, अधिक से अधिक वृक्ष लगाने तथा उनकी नियमित देखभाल करने का संकल्प लिया।
वहीं ड्राइविंग ट्रेनिंग एवं टेस्टिंग इंस्टीट्यूट, बरेली में आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारीज की क्षेत्रीय संचालिका बीके पार्वती दीदी, बीके नीता दीदी, बीके पारुल दीदी एवं संस्थान के सदस्यों के साथ उप परिवहन आयुक्त कमल गुप्ता, संभागीय परिवहन अधिकारी पंकज सिंह तथा प्राविधिक निरीक्षक हारुन सैफी ने सहभागिता करते हुए फलदार एवं फूलदार पौधों का रोपण किया।
इस अवसर पर बीके पार्वती दीदी ने कहा कि प्रकृति ईश्वर की अनुपम देन है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस तक सीमित न रहकर हमारी जीवनशैली का हिस्सा बनना चाहिए। अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर और उनकी नियमित देखभाल करके ही हम आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण प्रदान कर सकते हैं।
उप परिवहन आयुक्त कमल गुप्ता ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए वृक्षारोपण अत्यंत आवश्यक है। संभागीय परिवहन अधिकारी पंकज सिंह ने वृक्षारोपण को पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का प्रभावी माध्यम बताया, जबकि प्राविधिक निरीक्षक हारुन सैफी ने पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल पर भी विशेष बल दिया।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी भाई-बहनों, अधिकारियों एवं नागरिकों ने पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक रहने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन हरित, स्वच्छ, स्वस्थ एवं समृद्ध भारत के निर्माण के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

अभ्युदय एक नई शुरुआत द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून पर स्वच्छता अभियान एवं वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन

5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में एनजीओ अभ्युदय एक नई शुरुआत द्वारा आज एक वृहद स्वच्छता एवं जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। केंद्रीय विद्यालय के सैकड़ों छात्र-छात्राओं तथा विभिन्न क्षेत्रों से आए स्वयंसेवकों के सहयोग से लगभग 2000 किलोग्राम कचरा एकत्र कर साफ किया गया।
स्वच्छता अभियान की शुरुआत केंद्रीय विद्यालय से होकर नांगल देवत परिसर स्थित मंदिर प्रांगण तक की गई। छात्रों ने प्लेकार्ड पर पर्यावरण जागरूकता संबंधी स्लोगन लिखकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया।
यह अभियान अभ्युदय संस्था के तत्वाधान में केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य श्री गुरुपद दास के नेतृत्व में, सहयोगी शिक्षकों एवं बच्चों द्वारा लगभग दो घंटे तक चलाया गया। इसके पश्चात नांगल देवत के सेक्टर-बी स्थित पार्क में वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
वृक्षारोपण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव सभरवाल (सेवानिवृत्त) तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। अभ्युदय संस्था की प्रमुख सदस्य, अध्यक्ष निधि उनियाल डंगवाल, सचिव मैत्रेयी उनियाल, रीना टोकस, हर्षिता कुनियाल, मनोज्ञा तथा अंकित शर्मा इस अवसर पर उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के सफल संचालन में क्षेत्र के पार्षद श्री इंद्रजीत सहरावत का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ, जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण के प्रति चेतना बढ़ाना तथा स्वच्छ एवं हरित भविष्य के निर्माण में सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करना था।

लोकतंत्र और पत्रकारिता के प्रहरी थे स्वर्गीय हेमंत विश्नोई

मनोज वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार संसद टीवी
स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई भारतीय पत्रकारिता के उन चुनिंदा नामों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों, साहस और सत्यनिष्ठा से पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया। उनका पूरा जीवन सच के पक्ष में खड़े रहने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित रहा। वे ऐसे दौर में पत्रकारिता कर रहे थे जब सत्ता के दबाव के सामने झुकना आसान था लेकिन हेमंत विश्नोई ने कभी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उनकी लेखनी में निर्भीकता, स्पष्टता और जनसरोकारों की गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। वे मानते थे कि पत्रकार का पहला दायित्व जनता, समाज और राष्ट्र के प्रति होता है न कि सत्ता के लिए। हेमंत बिश्नोई की पत्रकारिता में आम जनता की समस्याओं, सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को विशेष महत्व मिलता था। वे पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता के साथ साथ सत्ता से सवाल पूछने का साहस भी दिखाई देता था। यही कारण है कि वे लोगों के बीच अत्यंत सम्मानित रहे।

आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र का एक कठिन काल था। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति की आवाजों को दबाने का प्रयास किया गया। ऐसे कठिन समय में भी हेमंत विश्नोई ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 1975-77 में आपातकाल और छात्र आंदोलन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के साथ हेमंत विश्नोई भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में सक्रिय थे। उस समय अरुण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और उन्होंने आपातकाल विरोधी गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। 19 माह तक जेल में रहना पड़ा लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि यह लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था। जेल की यातनाएं और कठिन परिस्थितियाँ भी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकीं। वे अंत तक सच और न्याय के पक्षधर बने रहे।

आज जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों और दबावों का सामना कर रही है तब हेमंत विश्नोई का जीवन और कार्य नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि सच्ची पत्रकारिता वही है जो निष्पक्ष, ईमानदार और निर्भीक हो। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई का जीवन लोकतंत्र, सत्य और पत्रकारिता की गरिमा के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ने पत्रकार समाज को संगठित करने का कार्य किया। वे मानते थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत हो सकता है जब पत्रकार आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर रूप से सुरक्षित हों। इसी सोच के साथ उन्होंने पत्रकारों की कार्य स्थितियों, वेतन, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों को लगातार उठाया। बिश्नोई जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड की मांग को लेकर किए गए संघर्ष में रहा। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन अत्यंत आवश्यक था। उन्होंने देखा कि अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं लेकिन उन्हें उचित वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसी कारण उन्होंने श्रम कानूनों में सुधार और पत्रकारों के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया। उन्होंने विभिन्न मंचों, संगठनों और विचार गोष्ठियों के माध्यम से पत्रकारों की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनका स्पष्ट मत था कि पत्रकारों को भी अन्य कर्मचारियों की तरह सम्मानजनक वेतन स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, पेंशन तथा सुरक्षित कार्य वातावरण मिलना चाहिए। वे पत्रकारों के शोषण के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाते थे और मीडिया संस्थानों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की वकालत करते थे। हेमंत बिश्नोई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और पत्रकार संगठनों को एकजुट कर आंदोलन को मजबूत बनाया।स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का व्यक्तित्व संघर्षशील होने के साथ साथ प्रेरणादायक भी था। वे संवाद और संगठन की शक्ति में विश्वास रखते थे। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर उन्होंने अनेक मंचों पर आवाज उठाई और यह साबित किया कि संगठित प्रयासों से बदलाव संभव है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई की नेतृत्व क्षमता का प्रभाव यह था कि वे केवल वरिष्ठ पत्रकारों तक सीमित नहीं रहे बल्कि युवा पत्रकारों को भी संगठन से जोडते रहे। वे हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है। इसी कारण वे पत्रकारों के अधिकारों के साथ साथ पत्रकारिता की गरिमा और नैतिक मूल्यों की भी बात करते थे।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल समाचार लिखने तक सीमित नहीं रहते बल्कि अपने विचारों, लेखनी और वैचारिक प्रतिबद्धता से समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता को केवल एक विचार नहीं बल्कि जन चेतना का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया। हेमंत बिश्नोई का मानना था कि पत्रकारिता केवल सत्ता से प्रश्न पूछने का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रहित और समाज हित के पक्ष में जनमत निर्माण का दायित्व भी है। यही कारण था कि उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। उन्होंने पत्रकारिता को पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव से हटाकर भारतीय दृष्टिकोण से देखने और समझने का प्रयास किया। जब देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस होती थी तब स्व हेमंत विश्नोई ने निर्भीक होकर अपनी बात रखी। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ राष्ट्रहित की मर्यादा को भी उतना ही आवश्यक माना। उनकी लेखनी में संतुलन, तर्क और राष्ट्र के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई देता था। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है जिसकी रक्षा प्रत्येक जागरूक नागरिक और पत्रकार का कर्तव्य है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय भी उनके चिंतन और लेखन का प्रमुख हिस्सा रहा। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को केवल धार्मिक मुद्दा नहीं माना बल्कि भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न बताया। अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भगवान श्रीराम भारत की आस्था, आदर्श और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ा विषय था। हेमंत विश्नोई ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से यह सिद्ध किया कि राष्ट्रवादी विचारधारा संकीर्णता नहीं बल्कि भारत की विविधता, संस्कृति और परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ने की भावना है। उन्होंने हमेशा भारतीयता को केंद्र में रखकर लेखन किया और युवा पत्रकारों को भी राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। हेमंत विश्नोई ने सदैव उन विषयों को प्रमुखता दी जो देश की अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े थे। चाहे आतंकवाद का प्रश्न हो सीमा सुरक्षा का विषय हो या कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा , उन्होंने बिना किसी दबाव या भय के अपनी बात रखी। उनका मानना था कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सत्ता से प्रश्न पूछना ही नहीं बल्कि राष्ट्रहित के पक्ष में जनमत तैयार करना भी है।उनका कहना था कि धारा 370 ने वर्षों तक कश्मीर को मुख्यधारा से दूर रखा और अलगाववाद को बढ़ावा दिया। वे अपने लेखों और वक्तव्यों में यह तर्क देते थे कि जब देश के अन्य राज्यों के नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो कश्मीर भी समान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए। असल में हेमंत बिश्नोई की लेखनी में राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा नहीं था बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समन्वय था। वे मानते थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देना नहीं हो सकता। इसी कारण उनकी पत्रकारिता में स्पष्टता, तर्क और राष्ट्र प्रेम का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से गहरा आत्मीय रिश्ता था। बरेली की गलियों, वहां की संस्कृति और अपने लोगों की चर्चा वे अक्सर बड़े अपनत्व के साथ किया करते थे। उनके शब्दों में हमेशा अपने शहर के प्रति सम्मान और लगाव झलकता था। वे अपनी पारिवारिक जड़ों से पूरी तरह जुड़े हुए व्यक्ति थे जिन्होंने जीवन भर रिश्तों और मूल्यों को सर्वोपरि रखा। खुद भी बरेली का रहने वाला हूं और जब दिल्ली आया तो 1992 में सर्व प्रथम स्वर्गीय हेमंत जी से परिचय हुआ तब पता चला कि उनके रिश्तों की डोर बरेली के बडे बाजार से भी जुड़ी है। हेमंत जी ने एक बडे भाई के रूप में सदैव मार्गदर्शन मिला। सही मानों में वे केवल एक पत्रकार नहीं बल्कि संवेदनशील इंसान और सच्चे मार्गदर्शक थे। पत्रकारिता जगत में भी उनका व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायी रहा। कठिन परिस्थितियों में वे अपने पत्रकार साथियों के साथ मजबूती से खड़े रहते थे। चाहे किसी साथी पर संकट हो या किसी युवा पत्रकार को मार्गदर्शन की आवश्यकता। हेमंत विश्नोई हमेशा एक संरक्षक और शुभचिंतक की भूमिका में दिखाई देते थे। उनका व्यवहार सहज, सहयोगी और आत्मीय था जिसने उन्हें सभी के बीच विशेष सम्मान दिलाया। आज जब पत्रकारिता कई बार वैचारिक भ्रम और बाजारवाद के दबाव में दिखाई देती है तब स्व हेमंत विश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनकी लेखनी हमें यह संदेश देती है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य समाज को सत्य संस्कार और राष्ट्रचेतना से जोड़ना होना चाहिए। स्व. हेमंत विश्नोई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार, उनकी लेखनी और राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण सदैव प्रेरणा देता रहेगा। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।आज भले ही हेमंत विश्नोई हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पत्रकारों के अधिकारों और श्रम कानूनों को लेकर उनकी सोच और संघर्ष प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए पत्रकारों का सम्मान और सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। पत्रकार हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सदैव स्मरणीय रहेगी।

आज जब मीडिया जगत नई चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है तब हेमंत विश्नोई जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन पत्रकार एकता, अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का संदेश देता है। पत्रकार समाज हमेशा उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करेगा। आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग सनसनी और राजनीतिक पक्षधरता के आरोपों से घिरा दिखाई देता है तब हेमंत बिश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने दिखाया कि निष्पक्षता का अर्थ राष्ट्रहित से विमुख होना नहीं बल्कि सत्य और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होना है। स्व हेमंत विश्नोई की राष्ट्रवादी पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन और लेखन यह संदेश देता है कि कलम की शक्ति तब सबसे प्रभावशाली होती है जब वह राष्ट्र और समाज के हित में समर्पित हो। उनकी निर्भीक आवाज भले ही आज हमारे बीच न हो लेकिन उनके विचार और सिद्धांत सदैव भारतीय पत्रकारिता को दिशा देते रहेंगे।

चारधाम यात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब, 11वें दिन 4 लाख पार, केदारनाथ मंदिर में सबसे ज्यादा पहुंच रहे श्रद्धालु

उत्तराखंड की वादियों में एक ओर जहां मौसम ने करवट लेकर गर्मी से राहत दी है, वहीं दूसरी ओर आस्था का ज्वार अपने चरम पर है। चारधाम यात्रा के 11वें दिन श्रद्धालुओं की संख्या ने नया रिकॉर्ड छू लिया है। अब तक 4 लाख से अधिक भक्त बाबा केदार, बद्रीविशाल, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन कर चुके हैं। जिला प्रशासन के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस बार भी केदारनाथ धाम श्रद्धालुओं की पहली पसंद बना हुआ है। यहां अब तक 2 लाख 7 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। कठिन चढ़ाई और मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ है। 

प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां लगातार व्यवस्थाओं को दुरुस्त बनाए रखने में जुटी हैं। वहीं बद्रीनाथ धाम में भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। अब तक यहां 1 लाख 58 हजार से अधिक लोग दर्शन कर चुके हैं। सड़क मार्ग से सुगम पहुंच और बेहतर व्यवस्थाओं के कारण बद्रीनाथ में भी भीड़ लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में भी श्रद्धालुओं की संख्या 1 लाख के पार पहुंच चुकी है, जो इस बार यात्रा की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।चारधाम यात्रा के दौरान इस बार प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। यात्रा मार्गों पर मेडिकल कैंप, सुरक्षा बलों की तैनाती, ट्रैफिक मैनेजमेंट और रजिस्ट्रेशन सिस्टम को पहले से ज्यादा मजबूत किया गया है। हेलीकॉप्टर सेवाओं के जरिए भी श्रद्धालुओं को सुविधा दी जा रही है, जिससे बुजुर्ग और अस्वस्थ यात्री भी आसानी से दर्शन कर पा रहे हैं। हालांकि, बढ़ती भीड़ के साथ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। 

खासकर केदारनाथ मार्ग पर पैदल यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण भीड़ प्रबंधन एक बड़ी जिम्मेदारी बन गया है। प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि वे तय नियमों का पालन करें और मौसम की जानकारी लेकर ही यात्रा करें। स्थानीय कारोबारियों के लिए भी यह यात्रा आर्थिक संजीवनी लेकर आई है। होटल, ढाबे, टूर ऑपरेटर और स्थानीय दुकानदारों की आमदनी में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। वहीं सरकार भी इस यात्रा को सुरक्षित और सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

उत्तराखंड में बदला मौसम, बारिश-ओलावृष्टि और बर्फबारी का अलर्ट

भीषण गर्मी से जूझ रहे उत्तराखंड के लोगों को अब राहत मिली है। राज्य के कई जिलों में हुई बारिश ने तापमान में गिरावट ला दी है और मौसम सुहावना हो गया है। मौसम विज्ञान केंद्र ने आने वाले दिनों में और भी तेज बदलाव के संकेत दिए हैं। मौसम विभाग के अनुसार, नैनीताल, देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में कहीं-कहीं भारी बारिश और ओलावृष्टि का ‘तीव्र दौर’ देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और आकाशीय बिजली गिरने की भी संभावना जताई गई है। ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम और ज्यादा सख्त हो सकता है। 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी की प्रबल संभावना है, जिससे तापमान में अचानक गिरावट आ सकती है। 

इसका असर चारधाम यात्रा मार्गों पर भी देखने को मिल सकता है, खासकर केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों के लिए मौसम विभाग ने यलो अलर्ट जारी किया है। यहां तेज हवाओं के साथ हल्की बारिश और बिजली चमकने की संभावना है। प्रशासन ने लोगों को सतर्क रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है। मंगलवार को राज्य के 9 जिलों में बारिश दर्ज की गई। इनमें अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और देहरादून शामिल हैं। वहीं चंपावत और पौड़ी जिलों में ओलावृष्टि भी हुई, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। 

बागेश्वर जिले में आए आंधी-तूफान ने खासा नुकसान पहुंचाया है। तेज हवाओं के चलते कई पेड़ उखड़ गए और टीन की छतें उड़ गईं। इस घटना में तीन लोग घायल हो गए, जिन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मौसम विभाग और प्रशासन ने खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और यात्रियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। अचानक बदलते मौसम के कारण भूस्खलन और रास्तों के बाधित होने का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में यात्रा से पहले मौसम की जानकारी लेना बेहद जरूरी हो गया है। जहां एक तरफ बारिश ने गर्मी से राहत दी है, वहीं दूसरी ओर यह बदलता मौसम सावधानी की भी मांग कर रहा है, खासकर उन लोगों के लिए जो चारधाम यात्रा पर निकले हुए हैं या जाने की योजना बना रहे हैं।

इरफान खान की 6वीं पुण्यतिथि : पर्दे का वो सितारा, जिसकी चमक आज भी बरकरार है, प्रशंसकों ने अपने चहेते अभिनेता को दी श्रद्धांजलि 

29 अप्रैल भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक गहरी खाली जगह का एहसास भी है। आज महान अभिनेता इरफान खान की छठी पुण्यतिथि है। साल 2020 में इसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा था, लेकिन उनका काम, उनकी अदाकारी और उनका व्यक्तित्व आज भी करोड़ों दिलों में सांस ले रहा है। सोशल मीडिया पर आज सुबह से ही उनके प्रशंसक उन्हें याद कर भावुक हो रहे हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।इरफान खान उन कलाकारों में से थे, जिन्होंने अभिनय को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक सच्चाई की तरह जिया। उन्होंने अपने करियर में करीब 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और हर किरदार को इस तरह निभाया कि वह हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में बस गया। उनकी खासियत यह थी कि वह किसी भी भूमिका में खुद को पूरी तरह ढाल लेते थे, चाहे वह आम आदमी का किरदार हो या फिर कोई जटिल और गहरा व्यक्तित्व।

राजस्थान के टोंक में जन्मे इरफान खान का सफर आसान नहीं रहा। 

उन्होंने नेशनल स्कूल ड्रामा से अभिनय की पढ़ाई की और इसके बाद टीवी से अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्हें छोटे-छोटे रोल मिले, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। धीरे-धीरे अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर उन्होंने बॉलीवुड में एक अलग पहचान बनाई। उनकी फिल्म पान सिंह तोमर ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इस फिल्म में उनके अभिनय को इतना सराहा गया कि उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा The Lunchbox, Maqbool, Hindi Medium, Life of Pi और Haider जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई। 

इरफान खान की अदाकारी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी और गहराई थी। वह बिना ज्यादा संवाद बोले ही अपने चेहरे के भाव और आंखों से पूरी कहानी कह देते थे। उनके अभिनय में एक सच्चाई होती थी, जो सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंचती थी। यही वजह है कि वह हर उम्र और हर वर्ग के दर्शकों के पसंदीदा बन गए। साल 2018 में इरफान खान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारी का पता चला। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इलाज के दौरान भी अपने काम के प्रति समर्पित रहे। उनकी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम थी, जो उनके निधन से कुछ समय पहले ही रिलीज हुई थी।

संघर्ष से शिखर तक, इरफान खान की जिंदगी और अभिनय की विरासत

इरफान खान का पूरा नाम साहबजादे इरफान अली खान था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत छोटे पर्दे से की, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों में काम किया। लेकिन उनका सपना हमेशा बड़े पर्दे पर अपनी पहचान बनाने का था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने अभिनय से यह साबित कर दिया कि एक कलाकार की असली ताकत उसके हुनर में होती है, न कि उसकी पृष्ठभूमि में। इरफान खान ने सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं, बल्कि हॉलीवुड में भी अपनी छाप छोड़ी। Slumdog Millionaire, Jurassic World और Inferno जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में उन्होंने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। 

वह उन चुनिंदा भारतीय कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने विश्व सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बीमारी से जूझते हुए भी उन्होंने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया, वह लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। 29 अप्रैल 2020 को मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फैंस उनके डायलॉग, सीन और तस्वीरें साझा कर उन्हें याद कर रहे हैं। 

कई लोगों के लिए इरफान खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक भावना थे, एक ऐसा कलाकार, जिसने सिनेमा को नई ऊंचाई दी। इरफान खान की विरासत उनके काम में हमेशा जिंदा रहेगी। उन्होंने यह साबित किया कि सच्चा कलाकार वही होता है, जो अपने अभिनय से लोगों के दिलों को छू ले। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनका अभिनय हमेशा हमें उनकी याद दिलाते रहेंगे।

Ganga Expressway : यूपी का सबसे लंबा 594 किलोमीटर गंगा एक्सप्रेसवे का आज पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन, 12 जिलों से होकर गुजरेगा

इंतजार खत्म । आखिरकार उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे आज शुरू होने जा रहा है। यूपी आज एक ऐतिहासिक बुनियादी ढांचा उपलब्धि का साक्षी बनने जा रहा है, जब नरेंद्र मोदी हरदोई में यूपी के सबसे लंबे और आधुनिक एक्सप्रेसवे में से एक गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना सिर्फ एक सड़क नहीं बल्कि प्रदेश के आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास की नई धुरी मानी जा रही है। 594 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्वी हिस्सों से जोड़ते हुए एक हाई-स्पीड कॉरिडोर का निर्माण करता है, जो प्रदेश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने की क्षमता रखता है। कार्यक्रम को लेकर हरदोई में व्यापक तैयारियां की गई हैं और जनसभा स्थल को भव्य रूप दिया गया है।

इस एक्सप्रेसवे का 99 किलोमीटर हिस्सा हरदोई जिले से होकर गुजरता है, जिससे यह क्षेत्र सीधे विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। 

कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहेंगे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं एसपीजी के साथ हजारों पुलिसकर्मी तैनात हैं। बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मियों की भी ड्यूटी लगाई गई है, जिससे आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया जा सके। इस कार्यक्रम में करीब डेढ़ लाख लोगों के जुटने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सीधे हरदोई पहुंचेंगे, जहां वे इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लोकार्पण करेंगे और जनसभा को संबोधित करेंगे। यह दौरा राजनीतिक और विकासात्मक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया गंगा एक्सप्रेसवे 6-लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे है, जिसे भविष्य में 8-लेन तक विस्तारित किया जा सकता है। 

यह मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जैसे 12 जिलों को जोड़ता है। इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने से मेरठ से प्रयागराज के बीच यात्रा समय में भारी कमी आएगी – जहां पहले 10 से 12 घंटे लगते थे, अब यह दूरी लगभग 6 घंटे में तय की जा सकेगी। इससे यात्रियों को समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। परियोजना की एक खास विशेषता शाहजहांपुर में बनी 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन हवाई पट्टी है, यह देश का पहला ऐसा एक्सप्रेसवे है जहां जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान भी उतर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। गंगा एक्सप्रेसवे को एक बड़े आर्थिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है । इसके किनारे करीब 2,635 हेक्टेयर क्षेत्र में औद्योगिक और लॉजिस्टिक हब बनाए जाएंगे, जिससे उद्योगों को नई गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

गंगा एक्सप्रेसवे से प्रदेश की बदलेगी विकास की तस्वीर

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने से उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है। यह परियोजना सिर्फ यात्रा को आसान बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम करेगी। सबसे बड़ा फायदा लॉजिस्टिक्स सेक्टर को होगा । माल ढुलाई तेज और सस्ती होगी, जिससे उद्योगों की लागत घटेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे प्रदेश में निवेश आकर्षित होगा और नए उद्योग स्थापित होंगे। किसानों के लिए भी यह एक्सप्रेसवे बेहद फायदेमंद साबित होगा । उन्हें अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने में कम समय लगेगा और बेहतर कीमत मिलेगी। 

इससे उनकी आय में वृद्धि होगी। पर्यटन के क्षेत्र में भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा । मेरठ से प्रयागराज तक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंच आसान होगी, जिससे पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलेगा। रोजगार के लिहाज से भी यह परियोजना अहम है, निर्माण के दौरान हजारों लोगों को काम मिला और आगे भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर बनेंगे। 

यह एक्सप्रेसवे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, जेवर लिंक एक्सप्रेसवे और प्रस्तावित मेरठ-हरिद्वार कॉरिडोर से जुड़कर एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनेगा। इससे उत्तर प्रदेश में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी मजबूत होगी। गंगा एक्सप्रेसवे एक परिवर्तनकारी पहल के रूप में उभर रहा है । यह न केवल आवागमन को आसान बनाएगा बल्कि औद्योगिक विकास, कृषि उन्नति और क्षेत्रीय संतुलन को भी नई दिशा देगा। आने वाले समय में यह परियोजना प्रदेश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ साबित हो सकती है।

गंगा एक्सप्रेसवे शुरू होते ही यूपी में हो जाएंगे आठ बड़े एक्सप्रेसवे

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने के साथ उत्तर प्रदेश का एक्सप्रेसवे नेटवर्क और मजबूत हो गया है। इस नए कॉरिडोर के जुड़ने के बाद अब प्रदेश में कुल 8 प्रमुख एक्सप्रेसवे हो गए हैं, जो राज्य को देश के सबसे बेहतर सड़क नेटवर्क वाले राज्यों में शामिल करते हैं। इनमें यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे (आंशिक रूप से चालू), दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और अब गंगा एक्सप्रेसवे शामिल हैं। 

इन सभी परियोजनाओं ने मिलकर उत्तर प्रदेश में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी का मजबूत जाल तैयार किया है। जिससे यात्रा समय में भारी कमी आएगी। साथ ही यह एक्सप्रेसवे पश्चिम, मध्य और पूर्वी यूपी को एक साथ जोड़कर आर्थिक गतिविधियों को नई गति देगा। इन एक्सप्रेसवे के जरिए औद्योगिक निवेश बढ़ेगा, लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और किसानों को बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। आने वाले समय में प्रस्तावित और निर्माणाधीन एक्सप्रेसवे भी जुड़ने से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे हब बनता जा रहा है।

हिमाचल में पंचायत चुनाव का हुआ एलान, तीन चरणों में होंगे मतदान, गांव-गांव में लोकतंत्र का महापर्व शुरू

हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव का बिगुल बज चुका है और इसके साथ ही पूरे प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मंगलवार को राज्य चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा करते हुए आचार संहिता लागू कर दी, जिससे अब शासन-प्रशासन पूरी तरह चुनावी मोड में आ गया है। मंगलवार को राज्य चुनाव आयुक्त अनिल कांची ने प्रेस वार्ता में बताया कि इस बार प्रदेश की 3,754 ग्राम पंचायतों में चुनाव कराए जाएंगे। मतदान तीन चरणों में 26, 28 और 30 मई को संपन्न होगा। 

मतदान का समय सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक तय किया गया है, ताकि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले मतदाताओं को भी सुविधा मिल सके। चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए आयोग ने व्यापक इंतजाम किए हैं। पंचायत स्तर के पदों की मतगणना मतदान समाप्त होते ही संबंधित पंचायत मुख्यालयों में की जाएगी, जिससे परिणाम जल्द सामने आ सकें। वहीं, बीडीसी और जिला परिषद सदस्यों के मतों की गिनती 31 मई को सुबह 9 बजे से ब्लॉक मुख्यालयों में होगी। चुनाव की निगरानी को सख्त बनाने के लिए हर मतगणना केंद्र पर वीडियोग्राफी अनिवार्य की गई है। 

इसके अलावा संवेदनशील और अति-संवेदनशील मतदान केंद्रों पर वेबकास्टिंग की व्यवस्था भी की जाएगी, ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके। इससे चुनावी पारदर्शिता और विश्वसनीयता को और मजबूती मिलेगी। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सबसे मजबूत आधार गांव को सशक्त करने का अवसर है। इस बार आयोग की तैयारियां और सख्ती यह संकेत देती हैं कि चुनाव को निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। गांव-गांव में अब चुनावी हलचल तेज होगी और आने वाले दिनों में राजनीतिक तापमान और बढ़ने की पूरी संभावना है।

हिमाचल में आदर्श आचार संहिता लागू, सरकारी कामकाज पर सख्ती 

हिमाचल में पंचायत चुनाव की घोषणा के साथ ही पूरे राज्य में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो गई है। इसके लागू होते ही सरकार और प्रशासन के कामकाज पर कई तरह की पाबंदियां लग गई हैं। अब चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक कोई भी नई योजना की घोषणा, शिलान्यास या सरकारी संसाधनों का राजनीतिक उपयोग नहीं किया जा सकेगा। अधिकारियों को भी सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे निष्पक्षता बनाए रखें और किसी भी तरह के दबाव में न आएं। चुनाव प्रक्रिया का पूरा शेड्यूल भी विस्तार से तय कर दिया गया है। नामांकन प्रक्रिया 7, 8 और 11 मई को सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक चलेगी। इसके बाद 12 मई को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी, जिसमें उम्मीदवारों के दस्तावेजों की पड़ताल होगी। 14 और 15 मई को नाम वापसी का समय रखा गया है, जबकि 15 मई को ही अंतिम उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जाएगी और चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। मतदान केंद्रों की सूची 7 मई या उससे पहले सार्वजनिक कर दी जाएगी, जिससे मतदाताओं को समय रहते जानकारी मिल सके। 

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश के 51 शहरी निकायों के चुनाव पहले ही घोषित किए जा चुके हैं और उनके लिए 17 मई को मतदान होगा।मतदाताओं की भागीदारी इस बार काफी अहम रहने वाली है। राज्य में कुल 50 लाख 79 हजार 48 मतदाता पंजीकृत हैं, जिनमें 25 लाख 67 हजार 777 पुरुष और 25 लाख 11 हजार 249 महिलाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि इस बार करीब 52 हजार युवा पहली बार मतदान करेंगे, जिनमें लगभग 23 हजार महिलाएं हैं। यह आंकड़ा बताता है कि युवा वर्ग इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। पूरे प्रदेश में 21,678 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जिनमें भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। लाहौल-स्पीति के काजा क्षेत्र के लांगजा स्थित कामो पाठशाला में 4,587 मीटर की ऊंचाई पर सबसे ऊंचा मतदान केंद्र बनाया गया है, जो इस चुनाव की खास पहचान बनेगा।वहीं, मतदाताओं की संख्या के लिहाज से भी काफी विविधता देखने को मिलती है। सिरमौर जिले के पांवटा साहिब क्षेत्र की एक पंचायत में सबसे अधिक मतदाता हैं, जबकि किन्नौर के पूह क्षेत्र के सुमरा गांव में मात्र 178 मतदाता दर्ज किए गए हैं। इन चुनावों में कुल 31,182 पदों पर मतदान होगा, जिनमें 3,754 प्रधान, 3,754 उपप्रधान, 21,654 वार्ड सदस्य, 1,769 बीडीसी सदस्य और 251 जिला परिषद सदस्य शामिल हैं। हर पद के लिए अलग-अलग बैलेट पेपर की व्यवस्था की गई है, जिससे मतदान प्रक्रिया स्पष्ट और व्यवस्थित रहे।

मतदाताओं को इस बार पांच अलग-अलग रंगों के मतपत्र दिए जाएंगे वार्ड सदस्य के लिए सफेद, उपप्रधान के लिए पीला, प्रधान के लिए हल्का हरा, बीडीसी सदस्य के लिए गुलाबी और जिला परिषद सदस्य के लिए हल्का नीला रंग निर्धारित किया गया है। इससे मतदाताओं को मतदान के दौरान किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं होगी। डिजिटल सुविधा को बढ़ावा देते हुए आयोग ने मतदाताओं को ‘वोटर सारथी’ ऐप और निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के जरिए अपना नाम जांचने की सुविधा भी दी है। इससे मतदाता घर बैठे ही अपनी जानकारी सत्यापित कर सकते हैं और मतदान के दिन किसी परेशानी से बच सकते हैं।

यूपी के चर्चित और तेजतर्रार आईपीएस बंगाल चुनाव ड्यूटी में सुर्खियों में, सख्त कार्यशैली से भड़के विपक्ष ने भाजपा का एजेंट कहा

उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं। सख्त छवि और तेज-तर्रार कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले शर्मा इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनावी ड्यूटी पर तैनात हैं, जहां उनकी सक्रियता और बयानबाजी ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। चुनावी हिंसा पर काबू पाने के लिए सख्ती दिखा रहे इस अधिकारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे कथित तौर पर एक उम्मीदवार का नाम लेकर चेतावनी देते दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो ने न सिर्फ राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत भी इससे अछूती नहीं रही। बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में चुनाव आयोग ने अजय पाल शर्मा को पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया है। 

उनकी जिम्मेदारी चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी तरह की हिंसा या मतदाताओं को डराने-धमकाने की घटनाओं को रोकना है। इसी क्रम में सामने आए एक वीडियो में वह टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान के घर के बाहर खड़े होकर सख्त लहजे में चेतावनी देते नजर आते हैं। वीडियो में वह स्पष्ट कहते सुनाई देते हैं कि यदि किसी ने मतदाताओं को प्रभावित करने या डराने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, इस वीडियो के सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। टीएमसी की ओर से इस पर आपत्ति जताई गई है और इसे सत्ता के दबाव में की गई कार्रवाई बताया जा रहा है। वहीं, उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को लेकर सीधे अजय पाल शर्मा और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। 

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए अजय पाल शर्मा पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह अधिकारी निष्पक्ष भूमिका निभाने के बजाय भाजपा के “एजेंट” के रूप में काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, चुनाव जैसे संवेदनशील समय में किसी अधिकारी द्वारा इस तरह का व्यवहार लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। अखिलेश यादव ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि जब उनकी सरकार सत्ता में आएगी, तो ऐसे अधिकारियों को “खोजकर और खोदकर निकाला जाएगा” और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल चुनाव की निष्पक्षता पर असर डालती हैं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की साख को भी नुकसान पहुंचाती हैं। 

अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के संरक्षण में कुछ अधिकारी अपनी सीमाओं को लांघ रहे हैं और राजनीतिक एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि ऐसे “अनरजिस्टर्ड अंडरग्राउंड एलिमेंट्स” को चिन्हित कर कार्रवाई जरूरी है। अखिलेश यादव का हमला यहीं नहीं रुका। उन्होंने इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश सरकार की छवि से भी जोड़ा और ‘नारी वंदन’ जैसे अभियानों पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का इस तरह का “अभद्र वीडियो” सार्वजनिक होता है, तो इससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासन की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल किया कि क्या ऐसे माहौल में महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस कर सकती हैं।

बंगाल चुनाव में राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया

इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है। एक ओर जहां टीएमसी इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर हमला करार दे रहे हैं। भाजपा की ओर से हालांकि इस मुद्दे पर सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत ही अधिकारी काम कर रहे हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। चुनाव के दौरान इस तरह के विवाद नई बात नहीं हैं, लेकिन किसी अधिकारी का नाम लेकर चेतावनी देना और उसका वीडियो वायरल होना स्थिति को और संवेदनशील बना देता है। इससे न केवल संबंधित अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस शुरू हो जाती है। 

दूसरी ओर प्रशासनिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। कुछ पूर्व अधिकारियों का कहना है कि चुनाव ड्यूटी के दौरान सख्ती जरूरी होती है, लेकिन भाषा और तरीके पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि किसी तरह की गलत व्याख्या की गुंजाइश न रहे। वहीं, कुछ लोग इसे महज कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं। फिलहाल, यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच उलझता जा रहा है। 

सोशल मीडिया पर भी इस वीडियो को लेकर बहस जारी है, जहां लोग अपने-अपने नजरिए से इसे देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है और क्या किसी तरह की आधिकारिक जांच या कार्रवाई होती है। इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि चुनाव के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका कितनी संवेदनशील होती है और उन्हें किस तरह संतुलन बनाए रखना चाहिए। निष्पक्षता और सख्ती के बीच की यह महीन रेखा ही ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।