Ganga Expressway : यूपी का सबसे लंबा 594 किलोमीटर गंगा एक्सप्रेसवे का आज पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन, 12 जिलों से होकर गुजरेगा

इंतजार खत्म । आखिरकार उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे आज शुरू होने जा रहा है। यूपी आज एक ऐतिहासिक बुनियादी ढांचा उपलब्धि का साक्षी बनने जा रहा है, जब नरेंद्र मोदी हरदोई में यूपी के सबसे लंबे और आधुनिक एक्सप्रेसवे में से एक गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना सिर्फ एक सड़क नहीं बल्कि प्रदेश के आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास की नई धुरी मानी जा रही है। 594 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्वी हिस्सों से जोड़ते हुए एक हाई-स्पीड कॉरिडोर का निर्माण करता है, जो प्रदेश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने की क्षमता रखता है। कार्यक्रम को लेकर हरदोई में व्यापक तैयारियां की गई हैं और जनसभा स्थल को भव्य रूप दिया गया है।

इस एक्सप्रेसवे का 99 किलोमीटर हिस्सा हरदोई जिले से होकर गुजरता है, जिससे यह क्षेत्र सीधे विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। 

कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहेंगे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं एसपीजी के साथ हजारों पुलिसकर्मी तैनात हैं। बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मियों की भी ड्यूटी लगाई गई है, जिससे आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया जा सके। इस कार्यक्रम में करीब डेढ़ लाख लोगों के जुटने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सीधे हरदोई पहुंचेंगे, जहां वे इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लोकार्पण करेंगे और जनसभा को संबोधित करेंगे। यह दौरा राजनीतिक और विकासात्मक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया गंगा एक्सप्रेसवे 6-लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे है, जिसे भविष्य में 8-लेन तक विस्तारित किया जा सकता है। 

यह मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जैसे 12 जिलों को जोड़ता है। इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने से मेरठ से प्रयागराज के बीच यात्रा समय में भारी कमी आएगी – जहां पहले 10 से 12 घंटे लगते थे, अब यह दूरी लगभग 6 घंटे में तय की जा सकेगी। इससे यात्रियों को समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। परियोजना की एक खास विशेषता शाहजहांपुर में बनी 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन हवाई पट्टी है, यह देश का पहला ऐसा एक्सप्रेसवे है जहां जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान भी उतर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। गंगा एक्सप्रेसवे को एक बड़े आर्थिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है । इसके किनारे करीब 2,635 हेक्टेयर क्षेत्र में औद्योगिक और लॉजिस्टिक हब बनाए जाएंगे, जिससे उद्योगों को नई गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

गंगा एक्सप्रेसवे से प्रदेश की बदलेगी विकास की तस्वीर

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने से उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है। यह परियोजना सिर्फ यात्रा को आसान बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम करेगी। सबसे बड़ा फायदा लॉजिस्टिक्स सेक्टर को होगा । माल ढुलाई तेज और सस्ती होगी, जिससे उद्योगों की लागत घटेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे प्रदेश में निवेश आकर्षित होगा और नए उद्योग स्थापित होंगे। किसानों के लिए भी यह एक्सप्रेसवे बेहद फायदेमंद साबित होगा । उन्हें अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने में कम समय लगेगा और बेहतर कीमत मिलेगी। 

इससे उनकी आय में वृद्धि होगी। पर्यटन के क्षेत्र में भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा । मेरठ से प्रयागराज तक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंच आसान होगी, जिससे पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलेगा। रोजगार के लिहाज से भी यह परियोजना अहम है, निर्माण के दौरान हजारों लोगों को काम मिला और आगे भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर बनेंगे। 

यह एक्सप्रेसवे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, जेवर लिंक एक्सप्रेसवे और प्रस्तावित मेरठ-हरिद्वार कॉरिडोर से जुड़कर एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनेगा। इससे उत्तर प्रदेश में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी मजबूत होगी। गंगा एक्सप्रेसवे एक परिवर्तनकारी पहल के रूप में उभर रहा है । यह न केवल आवागमन को आसान बनाएगा बल्कि औद्योगिक विकास, कृषि उन्नति और क्षेत्रीय संतुलन को भी नई दिशा देगा। आने वाले समय में यह परियोजना प्रदेश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ साबित हो सकती है।

गंगा एक्सप्रेसवे शुरू होते ही यूपी में हो जाएंगे आठ बड़े एक्सप्रेसवे

गंगा एक्सप्रेसवे के शुरू होने के साथ उत्तर प्रदेश का एक्सप्रेसवे नेटवर्क और मजबूत हो गया है। इस नए कॉरिडोर के जुड़ने के बाद अब प्रदेश में कुल 8 प्रमुख एक्सप्रेसवे हो गए हैं, जो राज्य को देश के सबसे बेहतर सड़क नेटवर्क वाले राज्यों में शामिल करते हैं। इनमें यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे (आंशिक रूप से चालू), दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और अब गंगा एक्सप्रेसवे शामिल हैं। 

इन सभी परियोजनाओं ने मिलकर उत्तर प्रदेश में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी का मजबूत जाल तैयार किया है। जिससे यात्रा समय में भारी कमी आएगी। साथ ही यह एक्सप्रेसवे पश्चिम, मध्य और पूर्वी यूपी को एक साथ जोड़कर आर्थिक गतिविधियों को नई गति देगा। इन एक्सप्रेसवे के जरिए औद्योगिक निवेश बढ़ेगा, लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और किसानों को बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। आने वाले समय में प्रस्तावित और निर्माणाधीन एक्सप्रेसवे भी जुड़ने से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे हब बनता जा रहा है।

हिमाचल में आज बजेगी पंचायत चुनाव की डुगडुगी, तारीखों के एलान के साथ ही लागू होगी आचार संहिता

पहाड़ों की ठंडी हवा के बीच आज हिमाचल की सियासत में हलचल तेज है। गांव-गांव तक लोकतंत्र का रंग चढ़ने जा रहा है। लोग चौपालों में बैठकर इसी चर्चा में जुटे हैं कि आखिर चुनाव कब होंगे। कहीं चाय की दुकानों पर बहस चल रही है तो कहीं संभावित उम्मीदवार अपने समीकरण साधने में लगे हैं। आज दोपहर बाद सब कुछ साफ हो जाएगा, जब पंचायत चुनाव का आधिकारिक एलान होगा। राज्य चुनाव आयोग ने दोपहर 3:40 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है, जिसमें चुनावी तारीखों की घोषणा की जाएगी। जैसे ही तारीखों का एलान होगा, पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी। इसका मतलब साफ है कि सरकार अब कोई नई योजना, भर्ती, टेंडर या उद्घाटन-शिलान्यास नहीं कर पाएगी। 

इस बार पंचायत चुनाव कई मायनों में खास रहने वाले हैं। प्रदेश के करीब 51 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इनमें 85 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 50 हजार बुजुर्ग भी शामिल हैं, जो लोकतंत्र के इस महापर्व में अपनी भागीदारी निभाने को तैयार हैं। गांवों में चुनाव को लेकर उत्साह साफ देखा जा सकता है। पंचायती राज व्यवस्था की बात करें तो इस बार कुल 31,214 पदों पर चुनाव होना है। 

इसमें पंचायत सदस्य, प्रधान-उपप्रधान से लेकर जिला परिषद सदस्य तक शामिल हैं। यही वजह है कि यह चुनाव सिर्फ गांव की सरकार बनाने का ही नहीं, बल्कि स्थानीय विकास की दिशा तय करने का भी बड़ा मौका माना जा रहा है। चुनाव आयोग की ओर से तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। मतदाता सूचियां अधिसूचित कर दी गई हैं और वार्ड स्तर पर उनकी प्रतियां भी उपलब्ध करा दी गई हैं। इससे चुनावी प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा करने का रास्ता साफ हो गया है।

शहरी निकायों में पहले ही लग चुकी है आचार संहिता

पिछले दिनों हिमाचल में नगर निकाय चुनाव का एलान किया जा चुका है, जिसके चलते कई शहरी क्षेत्रों में पहले ही आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है। जिला शिमला के रोहड़ू नगर परिषद और नारकंडा नगर पंचायत के चुनाव कार्यक्रम भी जारी किए जा चुके हैं। इन दोनों जगहों पर 22 मई को मतदान होना तय है। चुनावी कार्यक्रम के अनुसार 5, 6 और 7 मई को नामांकन पत्र दाखिल किए जाएंगे। इसके बाद 11 मई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। मतदान का समय सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक रखा गया है। शहरी निकायों में चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही प्रदेश के 53 नगर निकायों में आचार संहिता लागू हो चुकी है। 

अब पंचायत चुनाव की घोषणा के बाद यह दायरा पूरे प्रदेश में फैल जाएगा। पंचायत चुनावों का असर सीधे तौर पर गांवों के विकास पर पड़ता है। सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का जिम्मा काफी हद तक पंचायत प्रतिनिधियों पर ही होता है। ऐसे में यह चुनाव आम लोगों के लिए बेहद अहम हो जाते हैं।राजनीतिक नजरिए से भी यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। 

हालांकि पंचायत चुनाव गैर-दलीय आधार पर होते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की नजर इन पर रहती है। यही वजह है कि गांव स्तर पर भी चुनावी सरगर्मी तेज हो जाती है। आने वाले दिनों में हिमाचल के गांवों में चुनावी रंग और गहरा होगा। उम्मीदवार अपने-अपने तरीके से जनता को रिझाने की कोशिश करेंगे। कहीं वादों की बारिश होगी तो कहीं विकास कार्यों का हिसाब दिया जाएगा। आज का दिन हिमाचल प्रदेश के लिए बेहद अहम है। जैसे ही चुनाव की तारीखों का ऐलान होगा, पूरे प्रदेश में लोकतंत्र का पर्व शुरू हो जाएगा। गांव-गांव में चुनावी शोर गूंजेगा और जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए तैयार हो जाएगी।

हिमाचल में पंचायत चुनाव का हुआ एलान, तीन चरणों में होंगे मतदान, गांव-गांव में लोकतंत्र का महापर्व शुरू

हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव का बिगुल बज चुका है और इसके साथ ही पूरे प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मंगलवार को राज्य चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा करते हुए आचार संहिता लागू कर दी, जिससे अब शासन-प्रशासन पूरी तरह चुनावी मोड में आ गया है। मंगलवार को राज्य चुनाव आयुक्त अनिल कांची ने प्रेस वार्ता में बताया कि इस बार प्रदेश की 3,754 ग्राम पंचायतों में चुनाव कराए जाएंगे। मतदान तीन चरणों में 26, 28 और 30 मई को संपन्न होगा। 

मतदान का समय सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक तय किया गया है, ताकि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले मतदाताओं को भी सुविधा मिल सके। चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए आयोग ने व्यापक इंतजाम किए हैं। पंचायत स्तर के पदों की मतगणना मतदान समाप्त होते ही संबंधित पंचायत मुख्यालयों में की जाएगी, जिससे परिणाम जल्द सामने आ सकें। वहीं, बीडीसी और जिला परिषद सदस्यों के मतों की गिनती 31 मई को सुबह 9 बजे से ब्लॉक मुख्यालयों में होगी। चुनाव की निगरानी को सख्त बनाने के लिए हर मतगणना केंद्र पर वीडियोग्राफी अनिवार्य की गई है। 

इसके अलावा संवेदनशील और अति-संवेदनशील मतदान केंद्रों पर वेबकास्टिंग की व्यवस्था भी की जाएगी, ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके। इससे चुनावी पारदर्शिता और विश्वसनीयता को और मजबूती मिलेगी। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सबसे मजबूत आधार गांव को सशक्त करने का अवसर है। इस बार आयोग की तैयारियां और सख्ती यह संकेत देती हैं कि चुनाव को निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। गांव-गांव में अब चुनावी हलचल तेज होगी और आने वाले दिनों में राजनीतिक तापमान और बढ़ने की पूरी संभावना है।

हिमाचल में आदर्श आचार संहिता लागू, सरकारी कामकाज पर सख्ती 

हिमाचल में पंचायत चुनाव की घोषणा के साथ ही पूरे राज्य में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो गई है। इसके लागू होते ही सरकार और प्रशासन के कामकाज पर कई तरह की पाबंदियां लग गई हैं। अब चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक कोई भी नई योजना की घोषणा, शिलान्यास या सरकारी संसाधनों का राजनीतिक उपयोग नहीं किया जा सकेगा। अधिकारियों को भी सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे निष्पक्षता बनाए रखें और किसी भी तरह के दबाव में न आएं। चुनाव प्रक्रिया का पूरा शेड्यूल भी विस्तार से तय कर दिया गया है। नामांकन प्रक्रिया 7, 8 और 11 मई को सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक चलेगी। इसके बाद 12 मई को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी, जिसमें उम्मीदवारों के दस्तावेजों की पड़ताल होगी। 14 और 15 मई को नाम वापसी का समय रखा गया है, जबकि 15 मई को ही अंतिम उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जाएगी और चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। मतदान केंद्रों की सूची 7 मई या उससे पहले सार्वजनिक कर दी जाएगी, जिससे मतदाताओं को समय रहते जानकारी मिल सके। 

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश के 51 शहरी निकायों के चुनाव पहले ही घोषित किए जा चुके हैं और उनके लिए 17 मई को मतदान होगा।मतदाताओं की भागीदारी इस बार काफी अहम रहने वाली है। राज्य में कुल 50 लाख 79 हजार 48 मतदाता पंजीकृत हैं, जिनमें 25 लाख 67 हजार 777 पुरुष और 25 लाख 11 हजार 249 महिलाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि इस बार करीब 52 हजार युवा पहली बार मतदान करेंगे, जिनमें लगभग 23 हजार महिलाएं हैं। यह आंकड़ा बताता है कि युवा वर्ग इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। पूरे प्रदेश में 21,678 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जिनमें भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। लाहौल-स्पीति के काजा क्षेत्र के लांगजा स्थित कामो पाठशाला में 4,587 मीटर की ऊंचाई पर सबसे ऊंचा मतदान केंद्र बनाया गया है, जो इस चुनाव की खास पहचान बनेगा।वहीं, मतदाताओं की संख्या के लिहाज से भी काफी विविधता देखने को मिलती है। सिरमौर जिले के पांवटा साहिब क्षेत्र की एक पंचायत में सबसे अधिक मतदाता हैं, जबकि किन्नौर के पूह क्षेत्र के सुमरा गांव में मात्र 178 मतदाता दर्ज किए गए हैं। इन चुनावों में कुल 31,182 पदों पर मतदान होगा, जिनमें 3,754 प्रधान, 3,754 उपप्रधान, 21,654 वार्ड सदस्य, 1,769 बीडीसी सदस्य और 251 जिला परिषद सदस्य शामिल हैं। हर पद के लिए अलग-अलग बैलेट पेपर की व्यवस्था की गई है, जिससे मतदान प्रक्रिया स्पष्ट और व्यवस्थित रहे।

मतदाताओं को इस बार पांच अलग-अलग रंगों के मतपत्र दिए जाएंगे वार्ड सदस्य के लिए सफेद, उपप्रधान के लिए पीला, प्रधान के लिए हल्का हरा, बीडीसी सदस्य के लिए गुलाबी और जिला परिषद सदस्य के लिए हल्का नीला रंग निर्धारित किया गया है। इससे मतदाताओं को मतदान के दौरान किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं होगी। डिजिटल सुविधा को बढ़ावा देते हुए आयोग ने मतदाताओं को ‘वोटर सारथी’ ऐप और निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के जरिए अपना नाम जांचने की सुविधा भी दी है। इससे मतदाता घर बैठे ही अपनी जानकारी सत्यापित कर सकते हैं और मतदान के दिन किसी परेशानी से बच सकते हैं।

प्रधानमंत्री का काशी प्रवास : चुनावी रैलियों और सिक्किम दौरे के बाद आज पीएम मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचेंगे

दो दिन के सिक्किम दौरे के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी की धरती पर कदम रखने जा रहे हैं। काशी में उनके आगमन को लेकर उत्साह अपने चरम पर है। शहर की गलियों से लेकर घाटों तक हर जगह हलचल है और लोग अपने सांसद के स्वागत के लिए तैयार हैं। पिछले 11 वर्षों में पीएम मोदी का यह 54वां दौरा होगा, जो यह दिखाता है कि काशी उनके दिल के कितने करीब है। इससे पहले वह नवंबर 2025 में यहां आए थे। इस बार का दौरा खास इसलिए भी है क्योंकि यह 2026 का उनका पहला काशी प्रवास है। 

प्रधानमंत्री के आगमन से पहले ही भाजपा संगठन पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन वाराणसी पहुंच चुके हैं, जहां उनका स्वागत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। इस दौरान डिप्टी सीएम बृजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य भी मौजूद रहे। काशी के चौसठी घाट पर बंगाली महिलाओं ने शंखनाद कर माहौल को और भी खास बना दिया। महिलाओं ने पश्चिम बंगाल चुनाव में जीत का भरोसा जताते हुए इस आयोजन को उत्सव का रूप दिया। प्रधानमंत्री इस दौरे में काशीवासियों को 6,332.08 करोड़ रुपये की 163 परियोजनाओं की सौगात देंगे। इनमें 1,054.69 करोड़ रुपये की 50 परियोजनाओं का लोकार्पण और 5,277.39 करोड़ रुपये की 113 परियोजनाओं का शिलान्यास शामिल है। 

इन परियोजनाओं में रेल और सड़क से जुड़े बड़े कामों के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने पर खास जोर दिया गया है। खास तौर पर सिग्नेचर ब्रिज और कबीरचौरा मंडलीय चिकित्सालय में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की आधारशिला को इस दौरे की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। प्रधानमंत्री का कार्यक्रम भी काफी व्यस्त रहने वाला है। वह शाम 4 बजे के बाद वाराणसी पहुंचेंगे और एयरपोर्ट से हेलीकॉप्टर के जरिए बरेका हेलीपैड पर उतरेंगे। इसके बाद वह बीएलडब्ल्यू ग्राउंड में आयोजित एक बड़ी सभा को संबोधित करेंगे, जिसमें करीब 40 हजार महिलाएं शामिल होंगी। इस सभा में पीएम मोदी ‘नारी शक्ति वंदन’ से जुड़े मुद्दों पर महिलाओं से संवाद करेंगे और उनकी राय भी जानेंगे। इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी का विकास, महिला सशक्तिकरण और पूर्वांचल पर फोकस

प्रधानमंत्री का यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि विकास और जनसंवाद दोनों का बड़ा मंच बनने जा रहा है। जिन परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास होगा, उनका सीधा फायदा न सिर्फ वाराणसी बल्कि पूरे पूर्वांचल और पड़ोसी बिहार के लोगों को भी मिलेगा।

कबीरचौरा अस्पताल में बनने वाला सुपर स्पेशियलिटी सेंटर स्वास्थ्य सेवाओं को नई ऊंचाई देगा। इससे गंभीर बीमारियों का इलाज अब स्थानीय स्तर पर ही संभव हो सकेगा और लोगों को बड़े शहरों की ओर नहीं भागना पड़ेगा। वहीं रेल और सड़क परियोजनाओं से कनेक्टिविटी बेहतर होगी, जिससे व्यापार, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। रामनगरी अयोध्या से मुम्बई के लिए अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेन का शुभारंभ पीएम मोदी वाराणसी से वर्चुअल रूप से हरी झंडी दिखाकर करेंगे। 

यह ट्रेन अयोध्या धाम जंक्शन से शाम 04.45 बजे रवाना होगी। अयोध्या से मुम्बई के बीच आधुनिक सुविधाओं से युक्त अमृत भारत एक्सप्रेस का नियमित रूप से (ट्रेन संख्या- 22111/22112) के रूप में परिचालन किया जाएगा। हालांकि अभी समय सारिणी और किराया नहीं तय हुआ है। मंगलवार को पहले फेरे में ट्रेन नंबर- 02212 अयोध्या धाम- लोकमान्य तिलक टर्मिनस अमृत भारत इनॉगरल स्पेशल के रूप में चलेगी। इस ट्रेन में स्लीपर और जनरल कोच के साथ आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होगी। उल्लेखनीय है कि काशी पहले ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जानी जाती है, ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होने से यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में और इजाफा होगा। राजनीतिक नजरिए से भी यह दौरा अहम माना जा रहा है। 

हाल ही में प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी रैलियां की हैं। ऐसे में काशी का यह दौरा संगठन और कार्यकर्ताओं के लिए ऊर्जा का काम करेगा। भाजपा कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। जगह-जगह स्वागत की तैयारियां की गई हैं और शहर को सजाया गया है। दो दिन के इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे और लोगों से सीधे संवाद करेंगे। यह दौरा एक बार फिर यह संदेश देगा कि काशी और उसके विकास को लेकर केंद्र सरकार कितनी गंभीर है। पीएम मोदी का यह काशी दौरा विकास, जनभागीदारी और राजनीतिक संदेश तीनों का संगम बनने जा रहा है।

यूपी के चर्चित और तेजतर्रार आईपीएस बंगाल चुनाव ड्यूटी में सुर्खियों में, सख्त कार्यशैली से भड़के विपक्ष ने भाजपा का एजेंट कहा

उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं। सख्त छवि और तेज-तर्रार कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले शर्मा इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनावी ड्यूटी पर तैनात हैं, जहां उनकी सक्रियता और बयानबाजी ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। चुनावी हिंसा पर काबू पाने के लिए सख्ती दिखा रहे इस अधिकारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे कथित तौर पर एक उम्मीदवार का नाम लेकर चेतावनी देते दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो ने न सिर्फ राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत भी इससे अछूती नहीं रही। बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में चुनाव आयोग ने अजय पाल शर्मा को पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया है। 

उनकी जिम्मेदारी चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी तरह की हिंसा या मतदाताओं को डराने-धमकाने की घटनाओं को रोकना है। इसी क्रम में सामने आए एक वीडियो में वह टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान के घर के बाहर खड़े होकर सख्त लहजे में चेतावनी देते नजर आते हैं। वीडियो में वह स्पष्ट कहते सुनाई देते हैं कि यदि किसी ने मतदाताओं को प्रभावित करने या डराने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, इस वीडियो के सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। टीएमसी की ओर से इस पर आपत्ति जताई गई है और इसे सत्ता के दबाव में की गई कार्रवाई बताया जा रहा है। वहीं, उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को लेकर सीधे अजय पाल शर्मा और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। 

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए अजय पाल शर्मा पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह अधिकारी निष्पक्ष भूमिका निभाने के बजाय भाजपा के “एजेंट” के रूप में काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, चुनाव जैसे संवेदनशील समय में किसी अधिकारी द्वारा इस तरह का व्यवहार लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। अखिलेश यादव ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि जब उनकी सरकार सत्ता में आएगी, तो ऐसे अधिकारियों को “खोजकर और खोदकर निकाला जाएगा” और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल चुनाव की निष्पक्षता पर असर डालती हैं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की साख को भी नुकसान पहुंचाती हैं। 

अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के संरक्षण में कुछ अधिकारी अपनी सीमाओं को लांघ रहे हैं और राजनीतिक एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि ऐसे “अनरजिस्टर्ड अंडरग्राउंड एलिमेंट्स” को चिन्हित कर कार्रवाई जरूरी है। अखिलेश यादव का हमला यहीं नहीं रुका। उन्होंने इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश सरकार की छवि से भी जोड़ा और ‘नारी वंदन’ जैसे अभियानों पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का इस तरह का “अभद्र वीडियो” सार्वजनिक होता है, तो इससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासन की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल किया कि क्या ऐसे माहौल में महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस कर सकती हैं।

बंगाल चुनाव में राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया

इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है। एक ओर जहां टीएमसी इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर हमला करार दे रहे हैं। भाजपा की ओर से हालांकि इस मुद्दे पर सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत ही अधिकारी काम कर रहे हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। चुनाव के दौरान इस तरह के विवाद नई बात नहीं हैं, लेकिन किसी अधिकारी का नाम लेकर चेतावनी देना और उसका वीडियो वायरल होना स्थिति को और संवेदनशील बना देता है। इससे न केवल संबंधित अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस शुरू हो जाती है। 

दूसरी ओर प्रशासनिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। कुछ पूर्व अधिकारियों का कहना है कि चुनाव ड्यूटी के दौरान सख्ती जरूरी होती है, लेकिन भाषा और तरीके पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि किसी तरह की गलत व्याख्या की गुंजाइश न रहे। वहीं, कुछ लोग इसे महज कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं। फिलहाल, यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच उलझता जा रहा है। 

सोशल मीडिया पर भी इस वीडियो को लेकर बहस जारी है, जहां लोग अपने-अपने नजरिए से इसे देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है और क्या किसी तरह की आधिकारिक जांच या कार्रवाई होती है। इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि चुनाव के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका कितनी संवेदनशील होती है और उन्हें किस तरह संतुलन बनाए रखना चाहिए। निष्पक्षता और सख्ती के बीच की यह महीन रेखा ही ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।

केंद्र सरकार ने दी पेंशनभोगियों को बड़ी राहत, अब बिना कागजी झंझट सीधे खाते में मिलेगा चिकित्सा भत्ता

देश के लाखों पेंशनभोगियों के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो उनकी रोजमर्रा की परेशानियों को काफी हद तक कम कर देगा। उम्र के इस पड़ाव में जहां लोगों को आराम और सुविधा की जरूरत होती है, वहीं अब उन्हें बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने या कागजी प्रक्रिया से गुजरने की मजबूरी नहीं रहेगी। सरकार ने चिकित्सा भत्ते से जुड़ी व्यवस्था को इतना आसान बना दिया है कि अब यह सुविधा लगभग स्वतः ही मिलने लगेगी। Ministry of Finance द्वारा जारी आदेश में National Pension System से जुड़े पेंशनभोगियों के लिए फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस (चिकित्सा भत्ता) की प्रक्रिया को सरल और स्वचालित बना दिया गया है। इसका सीधा फायदा यह होगा कि अब बुजुर्गों को न तो बार-बार चिकित्सा बिल जमा करने होंगे और न ही किसी कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ेंगे। नई व्यवस्था के तहत अब यह भत्ता सीधे पेंशनभोगियों के बैंक खाते में जमा होगा। पूरी प्रक्रिया बैंकिंग सिस्टम के जरिए संचालित की जाएगी, जिससे पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जा सके। 

सरकार का यह कदम खासतौर पर उन बुजुर्गों के लिए राहत लेकर आया है, जिन्हें स्वास्थ्य कारणों से बाहर जाना मुश्किल होता है। इस नई प्रक्रिया में सबसे अहम भूमिका Central Pension Accounting Office निभाएगा, जो पहले लाभार्थी की पात्रता की जांच करेगा। पात्र पाए जाने पर बैंक को स्पेशल सील अथॉरिटी जारी की जाएगी। इसके बाद बैंक का सेंट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेंटर तय दर के अनुसार हर तीन महीने में चिकित्सा भत्ते की राशि सीधे खाते में जमा कर देगा। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब पेंशनभोगियों को किसी प्रकार का दावा या बिल प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह पूरी प्रक्रिया स्वतः संचालित रहेगी, जिससे समय की बचत के साथ-साथ पारदर्शिता भी बढ़ेगी। 

यह बदलाव डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही, पेंशनभोगियों को यह विकल्प भी दिया गया है कि वे चिकित्सा भत्ते के स्थान पर Central Government Health Scheme की बाह्य रोगी सुविधा का लाभ ले सकते हैं। इस व्यवस्था के तहत पहले बैंक भुगतान करेंगे और बाद में सरकार उन्हें इसकी प्रतिपूर्ति करेगी। हालांकि सरकार ने प्रक्रिया को आसान जरूर बना दिया है, लेकिन कुछ आवश्यक नियम अब भी लागू रहेंगे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है हर साल नवंबर में जीवन प्रमाण पत्र जमा करना। यह प्रमाण पत्र यह सुनिश्चित करता है कि पेंशनभोगी जीवित है और भुगतान जारी रहना चाहिए।

नए नियमों से बदली व्यवस्था के तहत परिवार को भी मिलेगा लाभ

नई व्यवस्था के तहत न केवल पेंशनभोगियों को राहत मिली है, बल्कि उनके परिवारों के लिए भी प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। अगर किसी पेंशनभोगी की मृत्यु हो जाती है और परिवार के पात्र सदस्य का नाम पहले से रिकॉर्ड में दर्ज है, तो उन्हें सिर्फ मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ बैंक में आवेदन करना होगा। इसके बाद चिकित्सा भत्ता मिलना शुरू हो जाएगा। यदि परिवार के सदस्य का नाम पहले से दर्ज नहीं है, तो उन्हें संबंधित विभाग के माध्यम से स्वीकृति लेनी होगी। इस प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में सरल बनाया गया है, ताकि परिवार को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े। 

सरकार ने यह भी साफ किया है कि यदि कोई पेंशनभोगी अपना बैंक या शाखा बदलता है, तो उसकी प्रक्रिया पहले की तरह ही रहेगी और उसे निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। हालांकि, नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया गया है कि इस बदलाव से भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आए। सबसे महत्वपूर्ण अपडेट यह है कि अब चिकित्सा भत्ता पूरी तरह से त्रैमासिक आधार पर स्वतः जमा होगा। इससे पेंशनभोगियों को नियमित रूप से आर्थिक सहायता मिलती रहेगी और उन्हें किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सामना नहीं करना पड़ेगा। जीवन प्रमाण पत्र को लेकर भी सरकार ने डिजिटल विकल्प उपलब्ध कराया है, जिससे बुजुर्ग घर बैठे ही अपना प्रमाण पत्र जमा कर सकते हैं। 

इसके अलावा, बैंक जाकर भी यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। लेकिन अगर नवंबर में यह प्रमाण पत्र जमा नहीं किया गया, तो दिसंबर से भुगतान प्रभावित हो सकता है। केंद्र सरकार का यह कदम पेंशनभोगियों के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा सुधार है। इससे न केवल उनकी आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी राहत मिलेगी। डिजिटल और सरल प्रक्रिया के माध्यम से अब पेंशन और चिकित्सा भत्ते का लाभ अधिक पारदर्शी और तेज तरीके से लोगों तक पहुंच सकेगा।

शिमला के चियोग में विकास की नई रफ्तार, मुख्यमंत्री सुक्खू ने पुल समेत करोड़ों की योजनाओं का किया लोकार्पण

शिमला के चियोग में आज का दिन लोगों के लिए बेहद खास रहा। सुबह से ही इलाके में उत्साह का माहौल था और बड़ी संख्या में लोग जनसभा में पहुंचे। हर कोई अपने मुख्यमंत्री का स्वागत करने के लिए उत्सुक नजर आया। जैसे ही मुख्यमंत्री पहुंचे, लोगों ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया और पूरा माहौल उत्सव जैसा बन गया।

स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विकास की नई शुरुआत का दिन था। लंबे समय से जिन सुविधाओं का इंतजार किया जा रहा था, आज उनमें से कई का सपना पूरा होता नजर आया। खासकर चियोग बाजार में बने नए पुल को लेकर लोगों में काफी खुशी देखी गई। 

शिमला के कसुम्प्टी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चियोग और धरेच में प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने करोड़ों रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इस दौरान उन्होंने चियोग बाजार में लगभग 3 करोड़ रुपये की लागत से बने नए पुल को जनता को समर्पित किया। यह पुल लंबे समय से स्थानीय लोगों की जरूरत बना हुआ था। इसके बनने से अब क्षेत्र में आने-जाने की सुविधा काफी आसान हो जाएगी। पहले जहां लोगों को खराब रास्तों और जोखिम भरे हालातों का सामना करना पड़ता था, वहीं अब उन्हें सुरक्षित और सीधा रास्ता मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार का उद्देश्य गांव-गांव तक विकास पहुंचाना है। उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में अब तक सुविधाएं नहीं पहुंच पाई थीं, वहां तेजी से काम किया जा रहा है। चियोग और धरेच में शुरू की गई परियोजनाएं इसी दिशा में एक अहम कदम हैं।

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने अन्य योजनाओं की भी जानकारी दी और कहा कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में और भी विकास कार्य किए जाएंगे। उन्होंने लोगों की समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को तुरंत समाधान के निर्देश भी दिए। जनसभा में उमड़ी भीड़ यह दर्शा रही थी कि लोगों को इन योजनाओं से काफी उम्मीदें हैं। स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि इन परियोजनाओं से उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आएगा।

चियोग बाजार में बने इस नए पुल के बनने से लोगों को आवाजाही में मिलेगी राहत 

चियोग बाजार में बने इस नए पुल के बनने से लोगों को सबसे बड़ी राहत आवाजाही में मिलेगी। अब उन्हें लंबा या जोखिम भरा रास्ता तय नहीं करना पड़ेगा। खासकर बरसात के मौसम में जब पानी का बहाव तेज होता था, तब लोगों को काफी परेशानी होती थी, लेकिन अब यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए भी यह पुल काफी फायदेमंद रहेगा। पहले जहां उन्हें मुश्किल रास्तों से होकर गुजरना पड़ता था, अब वे सुरक्षित तरीके से स्कूल पहुंच सकेंगे। इसके अलावा, बीमार या बुजुर्ग लोगों को अस्पताल ले जाने में भी आसानी होगी। किसानों के लिए भी यह एक बड़ी सुविधा साबित होगा। 

अब वे अपने खेतों से उपज को आसानी से बाजार तक पहुंचा सकेंगे, जिससे उनकी आमदनी बढ़ने की संभावना है। साथ ही, स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा क्योंकि परिवहन की सुविधा बेहतर हो जाएगी।

सरकार की ओर से सड़क, पानी और बिजली से जुड़ी अन्य योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने से पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि सभी काम समय पर पूरे किए जाएं, ताकि लोगों को जल्द से जल्द लाभ मिल सके। 

आने वाले समय में चियोग और आसपास के क्षेत्रों में और भी विकास योजनाएं शुरू की जाएंगी। इनमें पर्यटन को बढ़ावा देने, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर खास ध्यान दिया जाएगा। चियोग में हुआ यह कार्यक्रम विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न सिर्फ लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी आसान होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र को आगे बढ़ने का नया रास्ता भी मिलेगा।

President visit Himachal देवभूमि में राष्ट्रपति का गरिमामय आगमन : द्रौपदी मुर्मु के स्वागत में सजी राजधानी शिमला, कई कार्यक्रमों में होंगी शामिल 

देवभूमि हिमाचल प्रदेश की वादियों में एक बार फिर संवैधानिक गरिमा और राष्ट्रीय महत्व का माहौल देखने को मिल रहा है। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास के तहत 27 अप्रैल से 1 मई 2026 तक हिमाचल प्रदेश के दौरे पर पहुंच चुकी हैं। सोमवार को उनका शिमला आगमन बेहद खास और औपचारिक रहा, जहां राज्य के शीर्ष नेतृत्व और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। शिमला के कल्याणी हेलीपैड पर राष्ट्रपति के पहुंचते ही पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया गया। इस दौरान हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू समेत कई वरिष्ठ अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। पारंपरिक हिमाचली अंदाज में उनका स्वागत किया गया, जिसमें स्थानीय संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। 

राष्ट्रपति अपने इस दौरे के दौरान शिमला के समीप स्थित मशोबरा में राष्ट्रपति निवास में ठहरेंगी। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है, जो ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए उपयुक्त माना जाता है। राष्ट्रपति का यह दौरा न केवल औपचारिक कार्यक्रमों से जुड़ा है, बल्कि यह राज्य के साथ केंद्र के संबंधों को भी और मजबूत करने का प्रतीक है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के आगमन को लेकर पूरे शिमला शहर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। वीवीआईपी मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने ट्रैफिक व्यवस्था में भी अस्थायी बदलाव किए हैं। शहर में जहां-जहां से राष्ट्रपति का काफिला गुजरेगा, वहां ट्रैफिक को करीब आधा घंटा पहले ही रोक दिया जाएगा। 

इससे आम लोगों को थोड़ी असुविधा हो सकती है, लेकिन प्रशासन का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है। प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे केवल आवश्यक कार्य होने पर ही घर से बाहर निकलें और ट्रैफिक नियमों का पालन करें। इसके साथ ही, वैकल्पिक और कम भीड़भाड़ वाले मार्गों का उपयोग करने की सलाह दी गई है। पर्यटकों को भी आश्वस्त किया गया है कि उनके सफर में किसी तरह की बड़ी बाधा नहीं आने दी जाएगी और सभी व्यवस्थाएं संतुलित तरीके से संचालित की जाएंगी।राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, द्रौपदी मुर्मु 28 अप्रैल को राज्यपाल द्वारा लोक भवन, शिमला में आयोजित एक औपचारिक भोज में शामिल होंगी। इसके बाद 29 अप्रैल को उनका प्रसिद्ध अटल टनल का दौरा प्रस्तावित है, जो देश की महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं में से एक है।

शैक्षणिक, सैन्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भरपूर रहेगा राष्ट्रपति का दौरा

राष्ट्रपति का यह दौरा केवल औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शिक्षा, सैन्य और सामाजिक कार्यक्रमों की भी अहम भूमिका है। 30 अप्रैल को द्रौपदी मुर्मु पालमपुर स्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल होंगी। इस दौरान वह छात्रों को संबोधित करेंगी और उन्हें उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रेरित करेंगी। शाम को मशोबरा स्थित राष्ट्रपति निवास में ‘एट होम’ स्वागत समारोह का आयोजन किया जाएगा, जिसमें प्रदेश के प्रमुख गणमान्य व्यक्ति शामिल होंगे। यह कार्यक्रम सामाजिक और औपचारिक संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है।

दौरे के अंतिम दिन, यानी 1 मई को, राष्ट्रपति शिमला में स्थित सेना प्रशिक्षण कमान का दौरा करेंगी। 

यह दौरा भारतीय सेना के प्रशिक्षण और तैयारियों को समझने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके बाद वह दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगी। इस दौरान प्रदेश के राजनीतिक नेताओं ने भी राष्ट्रपति के दौरे को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए इसे प्रदेश के लिए गौरव का क्षण बताया। उन्होंने लिखा कि हिमाचल की पावन धरा पर राष्ट्रपति का आगमन प्रदेशवासियों के लिए सम्मान और प्रेरणा का विषय है।वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने भी राष्ट्रपति के आगमन का स्वागत करते हुए इसे देवभूमि के लिए गौरवपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का यह दौरा प्रदेश के विकास और पहचान को नई दिशा देगा।

राष्ट्रपति का यह दौरा हिमाचल प्रदेश के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इससे जहां एक ओर राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर और पहचान मिलेगी, वहीं प्रशासनिक और विकासात्मक गतिविधियों को भी नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।

आईटी सेक्टर की दिग्गज Infosys बुरे दौर में : मार्केट कैप में भारी गिरावट, टॉप 10 से बाहर हुई कंपनी

कभी भारतीय आईटी सेक्टर की मजबूती का प्रतीक मानी जाने वाली Infosys इस समय कठिन दौर से गुजर रही है। कुछ ही समय पहले तक देश की सबसे मूल्यवान कंपनियों की सूची में मजबूती से बनी रहने वाली यह कंपनी अब उस सूची से बाहर हो चुकी है। हाल के दिनों में कंपनी के मार्केट कैप में करीब 2 लाख करोड़ रुपये की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिसने निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों दोनों को चौंका दिया है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इंफोसिस का मार्केट कैप अब घटकर लगभग 4,74,954 करोड़ रुपये रह गया है। यह गिरावट सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उस भरोसे में आई कमी का संकेत है जो निवेशकों ने लंबे समय से इस कंपनी पर जताया था। इसके मुकाबले Reliance Industries 18 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के मार्केट कैप के साथ देश की सबसे मूल्यवान कंपनी बनी हुई है। 

अन्य बड़ी कंपनियों की बात करें तो HDFC Bank, Bharti Airtel, State Bank of India और ICICI Bank लगातार टॉप पोजिशन पर बनी हुई हैं। वहीं आईटी सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनी Tata Consultancy Services अभी भी टॉप 10 में अपनी जगह बनाए हुए है, जो इस सेक्टर के भीतर भी असमान प्रदर्शन को दर्शाता है। इंफोसिस के शेयरों में आई गिरावट ने इस पूरी कहानी को और गंभीर बना दिया है। पिछले एक हफ्ते में कंपनी के शेयर करीब 11 प्रतिशत तक गिर चुके हैं। अगर थोड़ा लंबा समय देखें तो एक महीने में 8 प्रतिशत, तीन महीने में करीब 30 प्रतिशत और छह महीने में लगभग 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यही नहीं, एक साल के भीतर भी कंपनी के शेयर करीब 21 प्रतिशत नीचे आ चुके हैं। साल 2026 की शुरुआत से अब तक यह गिरावट लगभग 28 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। हालांकि, सोमवार को बाजार में हल्की राहत जरूर देखने को मिली। दोपहर करीब 1:45 बजे बीएसई पर इंफोसिस का शेयर 1,171.50 रुपये के आसपास ट्रेड करता दिखा, जिसमें करीब 1.48 प्रतिशत की मामूली बढ़त दर्ज की गई। लेकिन यह उछाल अभी उस बड़ी गिरावट की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं। 

सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर आईटी सेवाओं की मांग में आई सुस्ती है। अमेरिका और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में कंपनियां खर्च को लेकर सतर्क हो गई हैं, जिससे नए प्रोजेक्ट्स की संख्या कम हो रही है। इसके अलावा, आर्थिक अनिश्चितता और महंगाई के दबाव ने भी आईटी सेक्टर को प्रभावित किया है। निवेशकों की बदलती रणनीति भी इस गिरावट का एक अहम कारण मानी जा रही है। जहां पहले आईटी कंपनियों को स्थिर और सुरक्षित निवेश माना जाता था, वहीं अब निवेशक बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीकॉम जैसे सेक्टरों की ओर ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं। यही वजह है कि Bajaj Finance, Larsen & Toubro, Hindustan Unilever और Life Insurance Corporation of India जैसी कंपनियां टॉप 10 में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं।

आईटी सेक्टर में दबाव के बीच क्या इंफोसिस वापसी कर पाएगी?

इंफोसिस की मौजूदा स्थिति भले ही चुनौतीपूर्ण नजर आ रही हो, लेकिन इसे पूरी तरह नकारात्मक संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी हो सकती है। आईटी सेक्टर स्वभाव से चक्रीय होता है, यानी इसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता आएगी, आईटी सेवाओं की मांग फिर से बढ़ सकती है। इंफोसिस के पास मजबूत क्लाइंट बेस, वैश्विक मौजूदगी और तकनीकी विशेषज्ञता जैसी कई बड़ी ताकतें हैं। कंपनी लगातार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे क्षेत्रों में निवेश कर रही है, जो भविष्य में इसकी ग्रोथ को नई दिशा दे सकते हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान गिरावट एक अस्थायी चरण भी साबित हो सकती है।

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 

प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और Tata Consultancy Services जैसी कंपनियां बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। इसके अलावा, क्लाइंट्स की लागत घटाने की रणनीति और प्रोजेक्ट्स में देरी भी कंपनी के राजस्व पर असर डाल सकती है। निवेशकों के लिए यह समय सतर्कता के साथ अवसर तलाशने का हो सकता है। जो निवेशक लंबी अवधि के नजरिए से बाजार को देखते हैं, उनके लिए इंफोसिस जैसे मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनी में गिरावट के दौरान निवेश करना फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं, अल्पकालिक निवेशकों को बाजार की मौजूदा अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए सोच-समझकर फैसला लेना होगा। 

इंफोसिस का टॉप 10 से बाहर होना निश्चित रूप से एक बड़ा घटनाक्रम है, लेकिन यह कहानी का अंत नहीं है। आईटी सेक्टर में बदलाव और वैश्विक परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाकर कंपनी दोबारा मजबूती के साथ वापसी कर सकती है। आने वाले महीनों में कंपनी की रणनीति और बाजार की दिशा तय करेगी कि इंफोसिस फिर से शीर्ष कंपनियों की सूची में अपनी जगह बना पाती है या नहीं।

अशोक कुमार लाहिड़ी बने नीति आयोग के उपाध्यक्ष, केंद्र सरकार ने की नियुक्ति, ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य पर जोर

भारत सरकार ने नीति निर्माण के शीर्ष संस्थान नीति आयोग में अहम बदलाव करते हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री और भाजपा विधायक अशोक कुमार लाहिड़ी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। इस नियुक्ति के साथ आयोग की नई टीम भी सक्रिय हो गई है, जिसमें राजीव गौबा, प्रोफेसर केवी राजू, प्रोफेसर गोबर्धन दास, डॉ. एम. श्रीनिवास और प्रोफेसर अभय करंदीकर जैसे विशेषज्ञ पूर्णकालिक सदस्य के रूप में शामिल हैं। नियुक्ति के तुरंत बाद लाहिड़ी ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं और भरोसा जताया कि उनके अनुभव से देश की नीति निर्माण प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि अर्थशास्त्र और लोक नीति में लाहिड़ी की गहरी समझ भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार द्वारा शुक्रवार को की गई इस नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नीति आयोग देश की आर्थिक और सामाजिक नीतियों के निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री स्वयं इसके अध्यक्ष होते हैं, ऐसे में उपाध्यक्ष का पद नीति दिशा तय करने में अत्यंत प्रभावशाली होता है। 

अशोक कुमार लाहिड़ी ने प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल एक दृष्टि नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत कार्यों के माध्यम से हासिल किया जाने वाला उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि इसके लिए दीर्घकालिक और प्रभावी नीतियों की आवश्यकता होगी, जिनमें आर्थिक विकास के साथ सामाजिक समावेशन को भी प्राथमिकता दी जाएगी। लाहिड़ी ने अपनी सफलता का श्रेय पश्चिम बंगाल की मजबूत शैक्षणिक परंपरा को दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की पुरानी शिक्षा नीतियों और अकादमिक माहौल ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने में मदद की। उन्होंने इसे पश्चिम बंगाल के लिए गर्व का क्षण बताया, हालांकि राज्य की वर्तमान स्थिति पर चिंता भी जताई। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल अब तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों से पीछे रह गया है, जिसे सुधारने के लिए ठोस प्रयासों की जरूरत है।

अनुभव और नई टीम से नीति आयोग को मिलेगी गति

अशोक कुमार लाहिड़ी का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है और उन्हें देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में गिना जाता है। वे भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और 15वें वित्त आयोग के सदस्य के रूप में भी अपनी भूमिका निभा चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक संस्थानों में भी काम किया है, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य की गहरी समझ मिली है। शैक्षणिक रूप से भी उनका आधार मजबूत रहा है। वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं, जो देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाते हैं। 

यही अनुभव अब नीति आयोग के कार्यों में नई ऊर्जा और दृष्टिकोण लाने में सहायक माना जा रहा है। वहीं, आयोग के नए सदस्य गोबर्धन दास ने इस नियुक्ति को अपने जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि एक साधारण किसान परिवार से आने के बावजूद उन्हें यह अवसर मिला है, जो देश के आम नागरिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने भरोसा जताया कि वे ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों और आम लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए पूरी ईमानदारी से काम करेंगे। नई टीम के साथ नीति आयोग से अपेक्षा की जा रही है कि वह देश के विकास को नई दिशा देगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत ‘विकसित भारत 2047’ के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभवी नेतृत्व और विविध पृष्ठभूमि वाले सदस्यों के कारण आयोग की कार्यक्षमता और प्रभावशीलता में वृद्धि होगी। अशोक कुमार लाहिड़ी की नियुक्ति को न केवल एक प्रशासनिक बदलाव बल्कि भारत की विकास रणनीति को तेज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी अगुवाई में नीति आयोग किस तरह देश की आर्थिक और सामाजिक नीतियों को नई गति देता है।