हिमाचल में शहरी चुनाव का बजा बिगुल : 17 मई को 51 निकायों में होगी वोटिंग, निगमों पर सियासी संग्राम, प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज
हिमाचल प्रदेश में शहरी राजनीति का बड़ा मंच सज चुका है। राज्य चुनाव आयोग ने 17 मई को 51 नगर निकायों में चुनाव कराने की घोषणा कर दी है, जिससे पूरे प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। राज्य चुनाव आयुक्त अनिल खाची ने शिमला में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चुनाव कार्यक्रम का विस्तार से ऐलान किया। इस घोषणा के साथ ही प्रदेश के सभी शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है, जिसने प्रशासनिक गतिविधियों पर तुरंत असर डालना शुरू कर दिया है।
इस बार जिन निकायों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें चार नगर निगम मंडी, सोलन, धर्मशाला और पालमपुर सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। इनके अलावा 25 नगर परिषद और 22 नगर पंचायतों में भी मतदान कराया जाएगा। खास बात यह है कि केवल नगर निगमों के चुनाव ही राजनीतिक दलों के पार्टी चिन्हों पर होंगे, जबकि नगर परिषद और नगर पंचायत के चुनाव गैर-पार्टी आधार पर कराए जाएंगे। ऐसे में नगर निगम चुनाव सीधे तौर पर सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बनते दिख रहे हैं।
चुनाव प्रक्रिया को सुव्यवस्थित तरीके से पूरा करने के लिए आयोग ने विस्तृत कार्यक्रम जारी किया है। उम्मीदवार 29, 30 अप्रैल और 2 मई को नामांकन दाखिल कर सकेंगे। इसके बाद 4 मई को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 6 मई तक नाम वापसी की अंतिम तिथि तय की गई है। चुनाव आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराई जाएगी।
मतदान 17 मई को होगा, लेकिन मतगणना को लेकर अलग-अलग व्यवस्था बनाई गई है। नगर परिषद और नगर पंचायतों के परिणाम उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे, जबकि चारों नगर निगमों के वोटों की गिनती 31 मई को संबंधित निगम मुख्यालयों में होगी। इससे साफ है कि निगम चुनावों को लेकर उत्सुकता और राजनीतिक तापमान लंबे समय तक बना रहेगा। इन चुनावों में लगभग 3.59 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इनमें करीब 1.80 लाख पुरुष और 1.79 लाख महिला मतदाता शामिल हैं।
मतदान के लिए कुल 589 मतदान केंद्र बनाए जाएंगे, ताकि हर मतदाता को सुविधा के साथ मतदान का अवसर मिल सके। आयोग ने सभी जिलों के प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि मतदान केंद्रों पर सुरक्षा, पारदर्शिता और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखा जाए। राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अगले साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह एक तरह की सेमीफाइनल परीक्षा है, जिसमें दोनों प्रमुख दल अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करेंगे। नगर निगमों में जीत न केवल स्थानीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाएगी, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए माहौल भी तैयार करेगी। इस बीच, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि पंचायत चुनावों की घोषणा अभी नहीं की गई है, लेकिन अगले एक सप्ताह के भीतर उसका कार्यक्रम भी जारी किया जाएगा। गौरतलब है कि चारों नगर निगमों का कार्यकाल 12 अप्रैल को समाप्त हो चुका है, जिसके बाद अब नए प्रतिनिधियों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू की गई है।
आचार संहिता लागू, प्रशासन पर सख्ती चुनावी माहौल में विकास कार्यों पर ब्रेक
चुनाव की घोषणा के साथ ही हिमाचल प्रदेश के सभी शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो गई है। इसके लागू होते ही सरकार और प्रशासन के कामकाज पर कई तरह की पाबंदियां लग गई हैं। अब कोई भी नई विकास योजना, परियोजना या वित्तीय घोषणा बिना चुनाव आयोग की अनुमति के नहीं की जा सकेगी। इसका सीधा असर उन योजनाओं पर पड़ेगा जो अभी प्रस्तावित थीं या शुरू होने की प्रक्रिया में थीं। आचार संहिता के तहत सरकारी मशीनरी को पूरी तरह निष्पक्ष रहना होगा। अधिकारियों और कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग न लें और न ही किसी दल या उम्मीदवार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाएं। साथ ही सरकारी संसाधनों जैसे वाहन, भवन या कर्मचारियों का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
चुनावी माहौल को देखते हुए प्रशासन ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। संवेदनशील, अतिसंवेदनशील मतदान केंद्रों की पहचान की जा रही है, जहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए जाएंगे। इसके अलावा निगरानी टीमों का गठन किया गया है, जो आचार संहिता के उल्लंघन पर नजर रखेंगी और तुरंत कार्रवाई करेंगी।राजनीतिक दलों ने भी चुनावी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां सत्ता में रहते हुए अपने कामकाज को जनता के सामने रखेगी, वहीं भाजपा सरकार की नीतियों और फैसलों को मुद्दा बनाकर चुनावी मैदान में उतरेगी। नगर निगम चुनावों में पार्टी चिन्ह होने के कारण मुकाबला सीधा और तीखा होने की पूरी संभावना है। हिमाचल प्रदेश में 17 मई को होने जा रहे ये नगर निकाय चुनाव न केवल स्थानीय निकायों के गठन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि प्रदेश की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करने वाले साबित हो सकते हैं। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जनता किसे अपना समर्थन देती है और किसके हाथ में शहरी सत्ता की कमान सौंपती है।

