किशोर दा के गीतों से सजी महफिल

मानव सेवा क्लब के तत्वावधान में सदा बहार गायक किशोर कुमार की याद में रामपुर बाग के एक सभागार में कार्यक्रम आयोजित किया गया। गीत-संगीत की शाम किशोर कुमार के नाम महफ़िल का प्रारंभ मां शारदे की वंदना से अरुणा सिन्हा द्वारा किया गया।किशोर कुमार के गीत प्रस्तुत करने वाले बेहतरीन कलाकार अजय कुमार को किशोर कुमार स्मृति संगीत सम्मान दिया गया।यह सम्मान क्लब के अध्यक्ष सुरेन्द्र बीनू सिन्हा,महासचिव मुकेश सक्सेना तथा अजय कुमार ने प्रदान किया। गीत-संगीत की महफिल में सुरेन्द्र बीनू सिन्हा ने तेरी भीगी-भीगी सी सुनाकर लोगों की खूब वाहवाही लूटी। प्रकाश चंद्र सक्सेना का कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना,अरुणा सिन्हा का गीत मेरे दिल में आज क्या है जो कहे तो मैं बता दूं और जितेंद्र सक्सेना गीत तेरा जैसा यार तेरा कहाँ श्रोताओं ने बहुत पसंद किया।
सत्येंद्र सक्सेना का गीत चला जाता हूं किसी की धुन में ने वातावरण आनंदमय कर दिया।मुकेश सक्सेना ने पल भर के लिये कोई मुझे प्यार कर ले ,बेबी शर्मा ने कोरा कागज था यह मन मेरा और अजय कुमार ने किशोर कुमार के हिट गीत ज़िन्दगी के सफर में प्रस्तुत करके समा बांध दिया,प्रसिद्ध गायक डा. असित रंजन ने आपकी आंखों में कुछ महके हुए से राज हैं की शानदार प्रस्तुति दी। गायिका शकुन सक्सेना ने रिमझिम गिरे सावन पेश करके वातावरण गुंजायमान कर दिया। अनिल गुप्ता का गीत यह शाम मस्तानी ने खूब तालियां बटोरी। सभी का आभार महासचिव मुकेश कुमार ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में असित रंजन,गंगा राम पाल, ब्रजेश कुमार और सोनी शामिल रहे। संचालन सुरेन्द्र बीनू सिन्हा ने किया।

हिन्दू सनातन बोर्ड’ के गठन को लेकर, संतों का राष्ट्रीय आह्वान

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी प्रेस वार्ता में ‘श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास’ द्वारा 7 जून को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित होने वाली ‘अंतरराष्ट्रीय धर्म संसद’ की घोषणा की गई। इस आयोजन के माध्यम से न्यास ने सनातन संस्कृति की रक्षा और श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए एक व्यापक राष्ट्रव्यापी अभियान की रूपरेखा प्रस्तुत की है।

इस पूरे आयोजन और मांग पत्र का सबसे प्रमुख केंद्र ‘हिन्दू सनातन बोर्ड’ का गठन करना है। न्यास का मानना है कि सनातन धर्म की संपत्तियों, प्राचीन मंदिरों और धार्मिक व्यवस्थाओं के सुचारू व सुरक्षित संचालन के लिए एक सशक्त और स्वतंत्र ‘हिन्दू सनातन बोर्ड’ का होना समय की मांग है। इसके साथ ही, हिन्दुस्तान को आधिकारिक रूप से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने, देश में गौ माता के कत्लेआम को पूरी तरह रोकने और गौरवशाली सनातन संस्कृति के संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण मांगों को इस धर्म संसद के मुख्य एजेंडे में शामिल किया गया है। न्यास का संकल्प समाज को जाति-पाति के बंधनों से मुक्त कर एक अटूट सूत्र में पिरोना है।

प्रेस वार्ता में मौजूद संगठन के सभी प्रमुख पदाधिकारियों और प्रबुद्ध जनों ने इस धर्म संसद के उद्देश्यों को लेकर अपनी बात रखी। न्यास के अंतरराष्ट्रीय मुख्य संरक्षक श्री रूप सिंह नागर ने कहा कि हमारा उद्देश्य देशव्यापी संपर्क अभियान और धार्मिक यात्राओं के माध्यम से संतों, अखाड़ों और धार्मिक संगठनों को राष्ट्रहित में एक मंच पर लाना है। मुख्य याचिकाकर्ता श्री दिनेश फलाहारी जी महाराज ने न्यायपालिका पर अटूट भरोसा जताते हुए कहा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद में हमारे पक्ष ने न्यायालय में सभी पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं और कानूनी रूप से हमारी जीत सुनिश्चित है।

कार्यक्रम की सह-प्रभारी एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमती सोनिया ठाकुर ने इसे संपूर्ण सनातन समाज की सामूहिक आस्था का प्रश्न बताते हुए दिल्ली, मथुरा, आगरा और वृंदावन सहित पूरे देश से लाखों लोगों को शामिल होने का आह्वान किया। वहीं, महन्त श्री हर्षिल गिरी गोस्वामी जी ने प्राचीन धार्मिक मूल्यों के संरक्षण पर बल दिया, तो श्री महीपाल बिधूड़ी जी ने गौ माता की रक्षा के लिए देशव्यापी जन-जागरण फैलाने की बात कही।

राष्ट्रीय महामन्त्री डॉ. सिद्धांत भट्टाचार्य ने संगठन के ध्येय को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिंदुओं को जात-पात के भेदों में बंटने से रोकना और समाज को जागरूक करना ही हमारा मुख्य लक्ष्य है। श्री बिट्टू बजरंगी जी ने कहा कि समाज को पूरी तरह संगठित करके ही हम एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना को साकार कर सकते हैं। मुम्बई से आईं राष्ट्रीय ब्रैंड एम्बेसडर आराधना सोलंकी ने कहा कि महानगरों के युवाओं और मातृशक्ति को इस पावन अभियान से जोड़कर इसे एक ऐतिहासिक जनआंदोलन का रूप दिया जाएगा। उन्होंने “एकजुट हिंदू – सशक्त राष्ट्र” के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि यह धर्म संसद देश की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नई दिशा देने में मील का पत्थर साबित होगी।

ब्रह्माकुमारीज ने वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण का लिया संकल्प

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज संस्थान द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं हरित भारत के निर्माण हेतु विभिन्न स्थानों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसी क्रम में डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क, मनोहर भूषण इंटर कॉलेज तथा ड्राइविंग ट्रेनिंग एवं टेस्टिंग इंस्टीट्यूट, बरेली में छायादार, फलदार एवं फूलदार पौधों का रोपण किया गया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क एवं मनोहर भूषण इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान यहां संस्थान के सदस्यों एवं नागरिकों ने विभिन्न प्रकार के पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। मनोहर भूषण इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य मनोज कुमार सक्सेना एवं विद्यालय के स्टाफ ने भी पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हुए पौधारोपण किया तथा अधिक से अधिक वृक्ष लगाने और उनकी नियमित देखभाल करने का संदेश दिया। सभी ने प्रकृति को सुरक्षित रखने, अधिक से अधिक वृक्ष लगाने तथा उनकी नियमित देखभाल करने का संकल्प लिया।
वहीं ड्राइविंग ट्रेनिंग एवं टेस्टिंग इंस्टीट्यूट, बरेली में आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारीज की क्षेत्रीय संचालिका बीके पार्वती दीदी, बीके नीता दीदी, बीके पारुल दीदी एवं संस्थान के सदस्यों के साथ उप परिवहन आयुक्त कमल गुप्ता, संभागीय परिवहन अधिकारी पंकज सिंह तथा प्राविधिक निरीक्षक हारुन सैफी ने सहभागिता करते हुए फलदार एवं फूलदार पौधों का रोपण किया।
इस अवसर पर बीके पार्वती दीदी ने कहा कि प्रकृति ईश्वर की अनुपम देन है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस तक सीमित न रहकर हमारी जीवनशैली का हिस्सा बनना चाहिए। अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर और उनकी नियमित देखभाल करके ही हम आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण प्रदान कर सकते हैं।
उप परिवहन आयुक्त कमल गुप्ता ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए वृक्षारोपण अत्यंत आवश्यक है। संभागीय परिवहन अधिकारी पंकज सिंह ने वृक्षारोपण को पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का प्रभावी माध्यम बताया, जबकि प्राविधिक निरीक्षक हारुन सैफी ने पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल पर भी विशेष बल दिया।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी भाई-बहनों, अधिकारियों एवं नागरिकों ने पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक रहने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन हरित, स्वच्छ, स्वस्थ एवं समृद्ध भारत के निर्माण के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

अभ्युदय एक नई शुरुआत द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून पर स्वच्छता अभियान एवं वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन

5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में एनजीओ अभ्युदय एक नई शुरुआत द्वारा आज एक वृहद स्वच्छता एवं जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। केंद्रीय विद्यालय के सैकड़ों छात्र-छात्राओं तथा विभिन्न क्षेत्रों से आए स्वयंसेवकों के सहयोग से लगभग 2000 किलोग्राम कचरा एकत्र कर साफ किया गया।
स्वच्छता अभियान की शुरुआत केंद्रीय विद्यालय से होकर नांगल देवत परिसर स्थित मंदिर प्रांगण तक की गई। छात्रों ने प्लेकार्ड पर पर्यावरण जागरूकता संबंधी स्लोगन लिखकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया।
यह अभियान अभ्युदय संस्था के तत्वाधान में केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य श्री गुरुपद दास के नेतृत्व में, सहयोगी शिक्षकों एवं बच्चों द्वारा लगभग दो घंटे तक चलाया गया। इसके पश्चात नांगल देवत के सेक्टर-बी स्थित पार्क में वृहद वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
वृक्षारोपण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल राजीव सभरवाल (सेवानिवृत्त) तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। अभ्युदय संस्था की प्रमुख सदस्य, अध्यक्ष निधि उनियाल डंगवाल, सचिव मैत्रेयी उनियाल, रीना टोकस, हर्षिता कुनियाल, मनोज्ञा तथा अंकित शर्मा इस अवसर पर उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के सफल संचालन में क्षेत्र के पार्षद श्री इंद्रजीत सहरावत का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ, जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण के प्रति चेतना बढ़ाना तथा स्वच्छ एवं हरित भविष्य के निर्माण में सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करना था।

मानवता का महायज्ञ : नारायण सेवा संस्थान में 46वां दिव्यांग एवं निर्धन सामूहिक विवाह समारोह

विश्व स्तर पर दिव्यांगता आज एक गंभीर सामाजिक विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की लगभग 16% आबादी किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता के साथ जीवन जी रही है। विकासशील देशों में जब दिव्यांगता के साथ गरीबी और सामाजिक पूर्वाग्रह जुड़ जाते हैं, तो विवाह जैसे सामाजिक संस्कार उनके लिए लगभग असंभव हो जाते हैं। भारत में भी लाखों दिव्यांग युवक-युवतियाँ केवल आर्थिक अभाव, सामाजिक संकोच और भविष्य की असुरक्षा के कारण वैवाहिक जीवन से वंचित रह जाते हैं।
इसी वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौती के समाधान का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नारायण सेवा संस्थान आगामी दिनांक 6-7 जून को गोल्डन स्टार बैंक्वेट, रोहिणी डिपो-II, सेक्टर-12, रोहिणी, दिल्ली में 46वां दिव्यांग एवं निर्धन सामूहिक विवाह समारोह आयोजित कर रहा है। जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से चयनित 21 दिव्यांग एवं निर्धन वर-वधू, जोड़ों के रूप में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पवित्र अग्नि के सात फेरे लेकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करेंगे।
इन जोड़ों में कोई हाथों से वंचित है, कोई पैरों से, कोई दृष्टिहीन है, तो कोई श्रवण-वाक् बाधित। उल्लेखनीय है कि इनमें से अनेक वर-वधू ऐसे हैं जिनका निःशुल्क ऑपरेशन, कृत्रिम अंग/सहायक उपकरण, और कौशल प्रशिक्षण इसी संस्थान में हुआ और अब उनका विवाह भी यहीं संपन्न हो रहा है। यह केवल विवाह ही नहीं, बल्कि उपचार, पुनर्वास, आत्मनिर्भरता, विवाह गृहस्थी की संपूर्ण जीवन यात्रा का उत्सव भी है।
संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने बताया कि पिछले 22 वर्षों में संस्थान अब तक 2561 दिव्यांग युवक -युवतियों के विवाह संपन्न करा चुका है। संस्थान दिव्यांगजन को दया नहीं, बल्कि सम्मान, अवसर और सुरक्षित भविष्य देने के लिए संकल्पित है।

दिव्यांग विवाह में वास्तविक बाधाएँ – और उनका समाधान
सामाजिक पूर्वाग्रह, आर्थिक अभाव, शारीरिक निर्भरता, आत्मविश्वास की कमी, उपयुक्त जीवनसाथी न मिलना, और विवाह उपरांत गृहस्थी की असुरक्षा—ये वे प्रमुख कारण हैं जिनसे दिव्यांग विवाह रुक जाते हैं। संस्थान इन सभी बाधाओं को जड़ से समाप्त करता है:
• निःशुल्क चिकित्सा, ऑपरेशन, कृत्रिम अंग
• कौशल प्रशिक्षण व आजीविका मार्गदर्शन
• उपयुक्त जोड़ी का पारदर्शी चयन
• विवाह की संपूर्ण निःशुल्क व्यवस्था
• विवाह उपरांत गृहस्थी का पूरा सामान (बिस्तर, अलमारी, गैस, किचन सेट, पंखा, सिलाई मशीन/व्हीलचेयर आदि)
उक्त प्रकल्प विवाह के बाद जीवन को व्यवस्थित बनाने में सहायक होते हैं।
राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण
संस्थान अध्यक्ष ने बताया कि दिव्यांग जन के पुनर्वास को विवाह और आत्मनिर्भर गृहस्थ जीवन से जोड़ने का यह समग्र मॉडल विश्व में विरला ही है। देश-विदेश के दानदाता, समाजसेवी और शोधकर्ता इस मॉडल को समझने के लिए संस्थान से जुड़ते रहे हैं। यह पहल दिव्यांगों के प्रति दया-दान नहीं, बल्कि उन्हें गरिमापूर्ण पारिवारिक जीवन से जोड़ने का सशक्त उदाहरण है।
दो दिवसीय आयोजन वैदिक परंपरा, मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक गरिमा के साथ संपन्न होगा। देश-विदेश के अतिथि, संत-महात्मा, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि और दानदाता उपस्थित रहेंगे; कई स्वयं कन्यादान कर आशीर्वाद देंगे। यह आयोजन इन परिवारों के जीवन में नई आशा का संचार करेगा और समाज को यह संदेश देगा कि सेवा, संवेदना और समर्पण से ही सच्ची मानवता जीवित रहती है।
कांफ्रेंस के दौरान मीडिया एवं जन संपर्क प्रमुख भगवान प्रसाद गौड़ ने पत्रकारों को संबोधित किया। साथ ही मीडिया प्रमुख, संरक्षक सत्य भूषण जैन और दिल्ली आश्रम प्रभारी जतन सिंह भाटी, वेद प्रकाश शर्मा, भंवर सिंह राठौड़ ने सामूहिक विवाह का पोस्टर जारी किया।

मौसम विभाग का कमजोर मानसून का अलर्ट, सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान, जल संकट और गर्मी दोनों बढ़ा सकते हैं परेशानी

देश में इस वर्ष मानसून को लेकर मौसम विभाग का ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने नवीनतम पूर्वानुमान में कहा है कि वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देशभर में औसत वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। विभाग के अनुसार जून से सितंबर तक होने वाली कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। पूर्वानुमान में चार प्रतिशत तक की त्रुटि की संभावना भी जताई गई है, लेकिन इसके बावजूद संकेत यही हैं कि इस बार मानसून कमजोर रह सकता है। मौसम विभाग के इस अनुमान ने किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी आज भी खेती और पेयजल के लिए मानसून पर निर्भर है। विशेष रूप से वे इलाके जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहां कम बारिश का सीधा असर फसलों की बुआई और उत्पादन पर पड़ सकता है। सामान्य से कम वर्षा की स्थिति में धान, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका है। 

मौसम विभाग के अनुसार इस बार मानसून का असर देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में दिखाई देगा। उत्तर-पूर्वी भारत में वर्षा सामान्य रहने की संभावना जताई गई है। यहां वर्षा दीर्घकालिक औसत के 94 से 106 प्रतिशत के बीच रह सकती है। दूसरी ओर मध्य भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका व्यक्त की गई है। उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश औसत से नीचे रह सकती है। मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि मानसून कोर क्षेत्र, जहां देश की अधिकांश वर्षा आधारित खेती होती है, वहां भी बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना अधिक है।

देश के अधिकांश हिस्सों में जून से सितंबर के दौरान कमजोर मानसून की स्थिति देखने को मिल सकती है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में राहत के संकेत भी हैं। मौसम विभाग का अनुमान है कि उत्तर-पश्चिम भारत, उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्सों, दक्षिण भारत के सीमित इलाकों और पूर्वी-मध्य भारत के कुछ भागों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। 

इसके बावजूद व्यापक स्तर पर बारिश की कमी की आशंका बनी हुई है। जून महीने को लेकर भी मौसम विभाग का अनुमान ज्यादा उत्साहजनक नहीं है। विभाग के अनुसार जून 2026 में देशभर में वर्षा सामान्य से कम रह सकती है और यह दीर्घकालिक औसत के 92 प्रतिशत से नीचे रहने का अनुमान है। जून के दौरान अधिकतर क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना जताई गई है। वहीं न्यूनतम तापमान भी अधिकांश इलाकों में सामान्य से ज्यादा रह सकता है। इसका मतलब है कि दिन के साथ-साथ रातों में भी गर्मी से राहत मिलने की संभावना कम रहेगी। 

मौसम विभाग ने कई राज्यों में भीषण गर्मी और लू चलने की आशंका भी जताई है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक लू वाले दिन देखने को मिल सकते हैं। बढ़ते तापमान और कम वर्षा का संयुक्त प्रभाव जनजीवन पर भारी पड़ सकता है। बिजली की मांग बढ़ने, जल संकट गहराने और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि राजस्थान और झारखंड में लू वाले दिनों की संख्या सामान्य से कम रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

एल नीनो की सक्रियता से कमजोर पड़ सकता है मानसून

मौसम विभाग के अनुसार प्रशांत महासागर में इस समय तटस्थ स्थिति बनी हुई है, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां एल नीनो की ओर बढ़ रही हैं। विभाग का अनुमान है कि मानसून सत्र के दौरान एल नीनो विकसित होने की संभावना लगभग 92 प्रतिशत तक है। सामान्य तौर पर एल नीनो की स्थिति भारतीय मानसून को कमजोर करती है और वर्षा में कमी का कारण बनती है। यही वजह है कि इस बार मौसम वैज्ञानिक मानसून को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं। एल नीनो के प्रभाव से समुद्री तापमान बढ़ता है, जिससे मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है। इसका असर केवल बारिश की मात्रा पर ही नहीं बल्कि वर्षा के वितरण पर भी पड़ता है। कई बार कुछ क्षेत्रों में बहुत कम बारिश होती है जबकि कुछ इलाकों में अचानक भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इससे खेती और जल प्रबंधन दोनों प्रभावित होते हैं।

हिंद महासागर की स्थिति फिलहाल तटस्थ बनी हुई है। मौसम विभाग का कहना है कि पूरे मानसून सत्र के दौरान इसके तटस्थ बने रहने की संभावना है। 

हालांकि यदि समुद्री परिस्थितियों में बदलाव होता है तो मानसून के स्वरूप पर उसका असर पड़ सकता है। कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न उत्पादन, जलाशयों का स्तर और महंगाई पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। यदि वर्षा कम होती है तो खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है, जिससे बाजार में दाम बढ़ने की आशंका रहती है। साथ ही बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में जलविद्युत परियोजनाएं वर्षा पर निर्भर हैं। मौसम विभाग ने यह भी बताया कि वर्ष 2021 से मासिक और मौसमी पूर्वानुमान के लिए बहु-मॉडल प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। 

इस प्रणाली में दुनिया के विभिन्न जलवायु मॉडलों और भारतीय मानसून मॉडल से प्राप्त आंकड़ों को एक साथ मिलाकर विश्लेषण किया जाता है। इसके आधार पर मौसम की संभावित स्थिति का अनुमान तैयार किया जाता है। विभाग का कहना है कि नई तकनीक और उन्नत मॉडल के कारण पूर्वानुमान पहले की तुलना में अधिक सटीक हुए हैं। अब देशभर की नजरें मानसून की वास्तविक प्रगति पर टिकी हैं। यदि शुरुआती महीनों में पर्याप्त बारिश नहीं होती तो खेती और जल संकट की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकारों के लिए जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और राहत योजनाओं को लेकर पहले से तैयारी करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

वर्ष 2026 से प्रतिवर्ष आयोजित होगी न्यू इंडिया फाउंडेशन की प्रतिष्ठित बुक फेलोशिप

भारत में गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन और शोध संस्कृति को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए न्यू इंडिया फाउंडेशन (NIF) ने घोषणा की है कि उसकी प्रतिष्ठित बुक फेलोशिप अब वर्ष 2026 से द्विवार्षिक (दो वर्ष में एक बार) के बजाय प्रतिवर्ष आयोजित की जाएगी। इसके अंतर्गत आवेदन प्रक्रिया हर वर्ष खुलेगी और लगभग तीन माह तक जारी रहेगी।

पिछले लगभग दो दशकों से भारत की स्वतंत्रता-उपरांत यात्रा, सामाजिक परिवर्तन, राजनीति, संस्कृति और समकालीन विषयों पर गंभीर विमर्श को प्रोत्साहित करने वाली NIF बुक फेलोशिप अब और अधिक लेखकों, शोधकर्ताओं तथा विचारकों तक पहुंच बना सकेगी।

यह फेलोशिप केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि चयनित फेलोज़ को मासिक वित्तीय सहयोग, संपादकीय मार्गदर्शन, विशेषज्ञ परामर्श (मेंटरशिप) तथा बौद्धिक समुदाय का सहयोग भी प्रदान करती है। यही कारण है कि इसे भारत की सबसे प्रतिष्ठित लेखन फेलोशिपों में गिना जाता है।

फाउंडेशन के अनुसार, यह परिवर्तन भारत में उभरते विमर्शों, नए शोध विषयों और बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्यों के अनुरूप अधिक सक्रिय और समावेशी भूमिका निभाने की दिशा में उठाया गया कदम है। इससे वे लेखक भी लाभान्वित होंगे जो पूर्व चयन प्रक्रिया में मामूली अंतर से पीछे रह गए थे और जिन्हें पुनः आवेदन के लिए दो वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।

समय के साथ प्रतिवर्ष चयनित होने वाले फेलोज़ का विस्तृत नेटवर्क एक सशक्त बौद्धिक समुदाय का निर्माण करेगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लेखकों को सहयोग, संवाद और मार्गदर्शन प्रदान कर सकेगा। इससे भारत में गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन की सांस्कृतिक उपस्थिति भी अधिक सुदृढ़ होगी।

निराजा गोपाल जायल, न्यू इंडिया फाउंडेशन की गवर्निंग बोर्ड सदस्य ने कहा:

“प्रतिवर्ष फेलोशिप आयोजित करना NIF की स्वाभाविक अगली यात्रा है। हमारा मानना रहा है कि गंभीर गैर-काल्पनिक लेखन भारत को स्वयं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हम इस सहयोग को अधिक सुलभ, निरंतर और प्रभावी बनाना चाहते हैं।”

वहीं श्रीनाथ राघवन, गवर्निंग बोर्ड सदस्य ने कहा:

“हर वर्ष प्राप्त होने वाले बड़ी संख्या में आवेदन इस बात का संकेत हैं कि भारत में गैर-काल्पनिक लेखन का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। वार्षिक फेलोशिप चक्र इस क्षेत्र को विस्तार देने के साथ-साथ इसकी गुणवत्ता को भी समृद्ध करेगा।”

लगभग 20 वर्ष पूर्व स्थापित न्यू इंडिया फाउंडेशन का उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद के भारत के इतिहास और परिवर्तनशील समाज को समझने के लिए गंभीर शोध और लेखन को प्रोत्साहित करना था। वर्तमान में संस्था NIF Book Fellowship, Translation Fellowship, तथा Kamaladevi Chattopadhyay NIF Book Prize जैसे प्रमुख कार्यक्रम संचालित करती है।

पिछले दो दशकों में यह फेलोशिप लगभग 40 उच्च गुणवत्ता वाली गैर-काल्पनिक पुस्तकों को समर्थन प्रदान कर चुकी है, जिनमें राजनीतिक जीवनियों से लेकर सांस्कृतिक इतिहास और संस्मरण तक शामिल हैं।

प्रख्यात साहित्यकार, कवि एवं पत्रकार स्व. श्रीकांत वर्मा को भारत रत्न देने की माँग

देश के प्रख्यात साहित्यकार, कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि के अवसर पर सोमवार को नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में ‘विश्व हिंदी परिषद’ एवं ‘श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट’ द्वारा ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया।
इस अवसर पर साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने स्व. श्रीकांत वर्मा के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी वैचारिक विरासत पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का आरंभ संचालक डॉ. हर्षबाला शर्मा द्वारा स्व. श्रीकांत वर्मा के जीवन, साहित्यिक अवदान, पत्रकारिता तथा राजनीतिक योगदान के परिचय से हुआ। इसके उपरांत विशिष्ट अतिथियों, वरिष्ठ साहित्यकारों एवं वर्मा परिवार के सदस्यों द्वारा स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए स्व. श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान का स्मरण किया।
इस अवसर पर डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्रीकांत वर्मा की पुस्तक ‘मगध’ और मोती माला भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
डॉ. विपिन कुमार ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीकांत वर्मा ने अपने समय की पीड़ा, लोगों की वेदना और सत्ता की खामोशी को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। सत्ता के नजदीक रहते हुए भी उन्होंने सत्ता से सवाल करने का साहस दिखाया । वे अतीत में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखते थे। वे भारतीय संस्कृति में विश्वास करते थे और देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था। डॉ. विपिन कुमार ने श्रीकांत वर्मा को देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने की माँग करते हुए कहा कि इस संबंध में भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।
डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा से जुड़ी स्मृतियों तथा ‘श्रीकांत वर्मा सम्मान’ की जानकारी साझा की। उन्होंने अपने पिता श्रीकांत वर्मा के आखिरी दिनों को याद किया। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले चार पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता, कला के क्षेत्र में दिए जाएँगे। इसमें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक है।
इसके बाद आयोजित स्मृति एवं साहित्यिक विमर्श सत्र में अनेक वक्ताओं ने श्रीकांत वर्मा के जीवन और साहित्य के विविध पक्षों पर अपने विचार रखे।
मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री अशोक वाजपेयी ने स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साथ बिताए समय और उनसे जुड़ी अविस्मरणीय साहित्यिक यादों को जीवंत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा एक लड़ाकू कवि थे। किसी भी सभा में वे अपने वैचारिक और कविता के तेवर को स्थगित नहीं करते थे। वे जो कहना चाहते थे, कह देते थे। वे हिंदी के नाराज़ कवि थे। वे 20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे।
प्रख्यात साहित्यकार एवं कला समीक्षक श्री विनोद भारद्वाज ने ‘कला एवं आलोचना’ विषय पर अत्यंत सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा के तेवर अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिल्कुल अलग थे। श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए विनोद भारद्वाज ने कहा कि दुनिया बदल जाती है, लेकिन स्मृतियाँ रह जाती हैं।
वहीं जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी ने ‘श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर’ विषय पर केंद्रित व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने श्रीकांत वर्मा की वैचारिक प्रखरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, श्रीकांत जी बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। आज जिस तरह की पत्रकारिता है, उसके संदर्भ में जब दिनमान के दौर की पत्रकारिता को देखते हैं, तो श्रीकांत वर्मा बहुत याद आते हैं। वे पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे।
कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक श्री रवीन्द्र त्रिपाठी ने श्रीकांत वर्मा से अपनी मुलाकातों को याद किया और साहित्य तथा पत्रकारिता के अंतरसंबंधों को उजागर करते हुए “पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर अपनी बात रखी। उनकी दृष्टि में समाज में जो हो रहा है, उसको जानने का माध्यम पत्रकारिता है। पत्रकारिता और आधुनिक साहित्य का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा है।
एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार अदिति राजपूत ने समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा पर प्रकाश डालते हुए “वर्तमान पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया। उनके अनुसार श्रीकांत वर्मा पत्रकारिता को एक उद्योग नहीं, लोक चेतना मानते थे । उन्होंने कहा, “पहले पत्रकारिता मिशन थी, फिर प्रोफेशन में बदली और अब मार्केट में बदल गई है।”
प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने ‘श्रीकांत वर्मा के कथा एवं गद्य साहित्य’ विषय पर अकादमिक और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी और सहृदयता के साथ अपनी बात कहना बहुत कठिन होता है। श्रीकांत वर्मा के गद्य में उनका निष्पाप कवि मन प्रतिबिंबित होता है। उनके साहित्य में युगबोध और कालबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की पीड़ा और कुंठा को चित्रित किया है। उनका लेखन बहुत अनुशासित है, जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि रहा है।
कार्यक्रम के अंत में, प्रसिद्ध आलोचक प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया । उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, साहित्यकारों, सहयोगी संस्थाओं तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम साहित्य, पत्रकारिता और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के अमूल्य योगदान को स्मरण करने का एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ।

जानलेवा बनता जा रहा बढ़ता तापमान– ज्ञानेन्द्र रावत

बढ़ता तापमान अब जानलेवा बनता जा रहा है। देखा जाये तो मौजूदा दौर में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। असलियत में हीटवेव कहें, उष्ण लहर कहें या फिर लू कहें, की तीव्रता और घातकता में दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। दिन-ब-दिन बढ़ते तापमान और गर्म हवा के भीषण थपेड़ों ने दिन तो दिन रातों में भी जीना हराम कर दिया है। रातों में भी लू जैसे हालात से लोग चैन की नींद तक नहीं ले पा रहे हैं।मौसम विभाग भी कह रहा है कि अगले हफ्ते तक इस गर्मी से निजात मिल पाना संभव नहीं है।और तो और आने वाले दिनों में पारा 47-48 डिग्री को भी पार कर जायेगा, ऐसी आशंका है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सवाल है, वहां तापमान 45 डिग्री के ऊपर पहुंच गया है। वह तप रही है और आग की भट्टी बनकर रह गयी है। मौसम विभाग की मानें तो इस हफ्ते देश के उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत और देश के कई हिस्सों यथा- पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, विदर्भ, मराठवाडा,मध्य महाराष्ट्र,बिहार और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को भीषण लू का सामना करना पड़ेगा। यही नहीं तापमान में अगले दिनों में धीरे-धीरे दो से चार डिग्री तक की बढ़त हालात को और विषम बना देगी। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का बांदा जिला बीते दिनों सूरज के तीखे तेवरों का शिकार रहा और यहां के लोग 48 डिग्री सेल्सियस की गर्मी की तपिश में बेहाल झुलसते दिखे। फिर नौतपा के कहर जिसका असर 25 मई से 2 जून तक रहेगा और जिसमें तापमान 48 डिग्री सेल्सियस पहुंचने की चेतावनी दी गयी है, इस खतरे को और भयावह बना देगा।

इस बाबत हुए अध्ययनों से पता चलता है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। 1950 के बाद से अबतक हीटवेव की भयावहता और उसके कारणों का विश्लेषण करने के बाद खुलासा हुआ है कि जो हीटवेव साल 1950 और साल 2000 के बीच चलती थी, उसमें और मौजूदा हीटवेव में काफी अंतर आ चुका है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूरोपीय मौसम विज्ञान एजेंसी कापरनिक्स का कहना है कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री और ज्यादा गर्म हो चुकी है। इससे मानव स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए मानव जनित जलवायु परिवर्तन पूरी तरह जिम्मेदार है। गौरतलब है कि इसमें प्राकृतिक कारणों से उपजे जलवायु परिवर्तन की भूमिका लगभग नगण्य ही है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ-साथ मौसम में भी कई बदलाव देखे जाने का उल्लेख है। इनमें सतह के वायु दबाव में बढ़ोतरी, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न मैं हुए काफी बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट की मानें तो इन बदलावों में नमी का बढ़ना, हवाओं की गति में यकायक कमी और सर्दी प्रमुख है। इसके अलावा पिछले 80 वर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्याधिक गर्मी का अनुभव करने वाले दिनों की तादाद भी तीन गुणा हो गयी है। दरअसल 1940 के दशक में औसतन वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना लगभग 15 दिन अत्याधिक गर्मी देखी जाती थी लेकिन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष हो गया है। प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडेमी आफ साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अब समुद्री हीटवेव लम्बे समय तक सामान्य से काफी ऊपर रहती है। यह भी कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते अत्याधिक समुद्री गर्मी की घटनाएं लम्बे समय तक बनी रहती हैं।

असलियत में तापमान में बढ़ोतरी से घातक लू चलने की घटनाओं में बीते दशकों में तेजी से वृद्धि हुई है। बीते दो दशक तो लू से मरने वालों की तादाद में हुई बढ़ोतरी के जीते-जागते सबूत हैं। हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इसमें पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं। यहां करीब 14 फीसदी मौतें हुयी हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशक में हर साल कुल 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। यह भी कि हर साल गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया से और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में हुई हैं। फिर जलवायु परिवर्तन ने एशिया में हीटवेव की तीव्रता को काफी बढा़ने में अहम भूमिका निबाही है। इससे अरबों लोग प्रभावित हुए हैं। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।

ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के नये अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि इसी प्रकार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की घटनाओं में और बढ़ोतरी हुयी तो उससे लू सम्बन्धी मामलों में मृत्यु दर बढ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। गौरतलब है 2003 में यूरोप में 47.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पहुंच गया था जिससे लू लगने के दौरान 45 हजार लोगों की मौत हो गयी थी। बीते 20 सालों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। इसके अलावा 2013 से यूरोप, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा सहित दुनिया के 47 देशों के 748 शहरों में गर्मी से सम्बन्धित मृत्यु दर सम्बन्धी आंकडे़ के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि लू की घटनाओं में कहीं भी कमी नहीं आयी है और वहां लू से मरने वालों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुई रिकार्ड बढ़त और तापमान में लगातार होती बढ़ोतरी के चलते हीटवेव की भयावहता की आशंका व्यक्त की है।

दरअसल हीटवेव की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका व्यक्त की गयी है। विशेषज्ञों की मानें तो हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्याधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाईड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफडो़ं की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुडे़ लोग ज्यादा आते हैं। इन पर हीटवेव का जोखिम ज्यादा रहता है। फिर पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं है कि बीते बरसों में हर महाद्वीप को हीटवेव ने प्रभावित किया है। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी हुई। साल 1992 से लेकर अभी तक लू के चलते तकरीब 24 हजार लोगों की मौतें हुयी हैं। आने वाले सालों में 60 करोड़ लोग इससे सर्वाधिक प्रमावित होंगे। इससे 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी दर्ज की जायेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की मानें तो 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। चिंता की बात यह है कि यदि तापमान वृद्धि की दर पर अंकुश नहीं लगा तो सदी के अंत तक गर्मी से 1.5 करोड़ लोग मौत के मुहाने तक पहुंच जायेंगे।

कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस का उत्सर्जन स्तर यदि 2050 तक यही रहा तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर तक पहुंच जायेगी। उसका नतीजा लाखों लोगों की मौत होगा। यह भी कि प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में बढो़तरी से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव की घटनाओं में बढो़तरी होगी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार धरती के गर्म होने की रफ्तार अनुमान से कहीं ज्यादा है। अहम सवाल कार्बन उत्सर्जन कम करने का है, यदि ऐसा नहीं हुआ जिसकी संभावना अधिक है। उस दशा में सदी के आखिर तक धरती का तापमान बढ़कर चार डिग्री सेल्सियस पहुंच जायेगा। उस दशा में धरती रहने काबिल बची रह पायेगी?
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

लोकतंत्र और पत्रकारिता के प्रहरी थे स्वर्गीय हेमंत विश्नोई

मनोज वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार संसद टीवी
स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई भारतीय पत्रकारिता के उन चुनिंदा नामों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों, साहस और सत्यनिष्ठा से पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया। उनका पूरा जीवन सच के पक्ष में खड़े रहने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित रहा। वे ऐसे दौर में पत्रकारिता कर रहे थे जब सत्ता के दबाव के सामने झुकना आसान था लेकिन हेमंत विश्नोई ने कभी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उनकी लेखनी में निर्भीकता, स्पष्टता और जनसरोकारों की गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। वे मानते थे कि पत्रकार का पहला दायित्व जनता, समाज और राष्ट्र के प्रति होता है न कि सत्ता के लिए। हेमंत बिश्नोई की पत्रकारिता में आम जनता की समस्याओं, सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को विशेष महत्व मिलता था। वे पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता के साथ साथ सत्ता से सवाल पूछने का साहस भी दिखाई देता था। यही कारण है कि वे लोगों के बीच अत्यंत सम्मानित रहे।

आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र का एक कठिन काल था। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति की आवाजों को दबाने का प्रयास किया गया। ऐसे कठिन समय में भी हेमंत विश्नोई ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 1975-77 में आपातकाल और छात्र आंदोलन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के साथ हेमंत विश्नोई भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में सक्रिय थे। उस समय अरुण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और उन्होंने आपातकाल विरोधी गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। 19 माह तक जेल में रहना पड़ा लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि यह लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था। जेल की यातनाएं और कठिन परिस्थितियाँ भी उनके हौसले को कमजोर नहीं कर सकीं। वे अंत तक सच और न्याय के पक्षधर बने रहे।

आज जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों और दबावों का सामना कर रही है तब हेमंत विश्नोई का जीवन और कार्य नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि सच्ची पत्रकारिता वही है जो निष्पक्ष, ईमानदार और निर्भीक हो। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई का जीवन लोकतंत्र, सत्य और पत्रकारिता की गरिमा के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ने पत्रकार समाज को संगठित करने का कार्य किया। वे मानते थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत हो सकता है जब पत्रकार आर्थिक, सामाजिक और पेशेवर रूप से सुरक्षित हों। इसी सोच के साथ उन्होंने पत्रकारों की कार्य स्थितियों, वेतन, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों को लगातार उठाया। बिश्नोई जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड की मांग को लेकर किए गए संघर्ष में रहा। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन अत्यंत आवश्यक था। उन्होंने देखा कि अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं लेकिन उन्हें उचित वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पातीं। इसी कारण उन्होंने श्रम कानूनों में सुधार और पत्रकारों के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया। उन्होंने विभिन्न मंचों, संगठनों और विचार गोष्ठियों के माध्यम से पत्रकारों की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया। उनका स्पष्ट मत था कि पत्रकारों को भी अन्य कर्मचारियों की तरह सम्मानजनक वेतन स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, पेंशन तथा सुरक्षित कार्य वातावरण मिलना चाहिए। वे पत्रकारों के शोषण के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाते थे और मीडिया संस्थानों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की वकालत करते थे। हेमंत बिश्नोई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और पत्रकार संगठनों को एकजुट कर आंदोलन को मजबूत बनाया।स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का व्यक्तित्व संघर्षशील होने के साथ साथ प्रेरणादायक भी था। वे संवाद और संगठन की शक्ति में विश्वास रखते थे। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर उन्होंने अनेक मंचों पर आवाज उठाई और यह साबित किया कि संगठित प्रयासों से बदलाव संभव है। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई की नेतृत्व क्षमता का प्रभाव यह था कि वे केवल वरिष्ठ पत्रकारों तक सीमित नहीं रहे बल्कि युवा पत्रकारों को भी संगठन से जोडते रहे। वे हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि समाज और लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है। इसी कारण वे पत्रकारों के अधिकारों के साथ साथ पत्रकारिता की गरिमा और नैतिक मूल्यों की भी बात करते थे।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल समाचार लिखने तक सीमित नहीं रहते बल्कि अपने विचारों, लेखनी और वैचारिक प्रतिबद्धता से समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। स्वर्गीय हेमंत विश्नोई ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता को केवल एक विचार नहीं बल्कि जन चेतना का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया। हेमंत बिश्नोई का मानना था कि पत्रकारिता केवल सत्ता से प्रश्न पूछने का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रहित और समाज हित के पक्ष में जनमत निर्माण का दायित्व भी है। यही कारण था कि उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। उन्होंने पत्रकारिता को पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव से हटाकर भारतीय दृष्टिकोण से देखने और समझने का प्रयास किया। जब देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस होती थी तब स्व हेमंत विश्नोई ने निर्भीक होकर अपनी बात रखी। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ राष्ट्रहित की मर्यादा को भी उतना ही आवश्यक माना। उनकी लेखनी में संतुलन, तर्क और राष्ट्र के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई देता था। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है जिसकी रक्षा प्रत्येक जागरूक नागरिक और पत्रकार का कर्तव्य है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय भी उनके चिंतन और लेखन का प्रमुख हिस्सा रहा। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को केवल धार्मिक मुद्दा नहीं माना बल्कि भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न बताया। अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भगवान श्रीराम भारत की आस्था, आदर्श और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ा विषय था। हेमंत विश्नोई ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से यह सिद्ध किया कि राष्ट्रवादी विचारधारा संकीर्णता नहीं बल्कि भारत की विविधता, संस्कृति और परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ने की भावना है। उन्होंने हमेशा भारतीयता को केंद्र में रखकर लेखन किया और युवा पत्रकारों को भी राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। हेमंत विश्नोई ने सदैव उन विषयों को प्रमुखता दी जो देश की अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े थे। चाहे आतंकवाद का प्रश्न हो सीमा सुरक्षा का विषय हो या कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा , उन्होंने बिना किसी दबाव या भय के अपनी बात रखी। उनका मानना था कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सत्ता से प्रश्न पूछना ही नहीं बल्कि राष्ट्रहित के पक्ष में जनमत तैयार करना भी है।उनका कहना था कि धारा 370 ने वर्षों तक कश्मीर को मुख्यधारा से दूर रखा और अलगाववाद को बढ़ावा दिया। वे अपने लेखों और वक्तव्यों में यह तर्क देते थे कि जब देश के अन्य राज्यों के नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो कश्मीर भी समान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए। असल में हेमंत बिश्नोई की लेखनी में राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा नहीं था बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय कर्तव्यों का समन्वय था। वे मानते थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देना नहीं हो सकता। इसी कारण उनकी पत्रकारिता में स्पष्टता, तर्क और राष्ट्र प्रेम का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

स्वर्गीय हेमंत बिश्नोई का उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से गहरा आत्मीय रिश्ता था। बरेली की गलियों, वहां की संस्कृति और अपने लोगों की चर्चा वे अक्सर बड़े अपनत्व के साथ किया करते थे। उनके शब्दों में हमेशा अपने शहर के प्रति सम्मान और लगाव झलकता था। वे अपनी पारिवारिक जड़ों से पूरी तरह जुड़े हुए व्यक्ति थे जिन्होंने जीवन भर रिश्तों और मूल्यों को सर्वोपरि रखा। खुद भी बरेली का रहने वाला हूं और जब दिल्ली आया तो 1992 में सर्व प्रथम स्वर्गीय हेमंत जी से परिचय हुआ तब पता चला कि उनके रिश्तों की डोर बरेली के बडे बाजार से भी जुड़ी है। हेमंत जी ने एक बडे भाई के रूप में सदैव मार्गदर्शन मिला। सही मानों में वे केवल एक पत्रकार नहीं बल्कि संवेदनशील इंसान और सच्चे मार्गदर्शक थे। पत्रकारिता जगत में भी उनका व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायी रहा। कठिन परिस्थितियों में वे अपने पत्रकार साथियों के साथ मजबूती से खड़े रहते थे। चाहे किसी साथी पर संकट हो या किसी युवा पत्रकार को मार्गदर्शन की आवश्यकता। हेमंत विश्नोई हमेशा एक संरक्षक और शुभचिंतक की भूमिका में दिखाई देते थे। उनका व्यवहार सहज, सहयोगी और आत्मीय था जिसने उन्हें सभी के बीच विशेष सम्मान दिलाया। आज जब पत्रकारिता कई बार वैचारिक भ्रम और बाजारवाद के दबाव में दिखाई देती है तब स्व हेमंत विश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनकी लेखनी हमें यह संदेश देती है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य समाज को सत्य संस्कार और राष्ट्रचेतना से जोड़ना होना चाहिए। स्व. हेमंत विश्नोई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार, उनकी लेखनी और राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण सदैव प्रेरणा देता रहेगा। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।आज भले ही हेमंत विश्नोई हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पत्रकारों के अधिकारों और श्रम कानूनों को लेकर उनकी सोच और संघर्ष प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए पत्रकारों का सम्मान और सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। पत्रकार हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सदैव स्मरणीय रहेगी।

आज जब मीडिया जगत नई चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है तब हेमंत विश्नोई जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन पत्रकार एकता, अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण का संदेश देता है। पत्रकार समाज हमेशा उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करेगा। आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग सनसनी और राजनीतिक पक्षधरता के आरोपों से घिरा दिखाई देता है तब हेमंत बिश्नोई जैसे पत्रकारों की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने दिखाया कि निष्पक्षता का अर्थ राष्ट्रहित से विमुख होना नहीं बल्कि सत्य और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होना है। स्व हेमंत विश्नोई की राष्ट्रवादी पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन और लेखन यह संदेश देता है कि कलम की शक्ति तब सबसे प्रभावशाली होती है जब वह राष्ट्र और समाज के हित में समर्पित हो। उनकी निर्भीक आवाज भले ही आज हमारे बीच न हो लेकिन उनके विचार और सिद्धांत सदैव भारतीय पत्रकारिता को दिशा देते रहेंगे।