लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक संशोधन विफल, इस बार विपक्ष सदन में केंद्र सरकार पर पड़ गया भारी 

संसद के निचले सदन लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सका। केंद्र सरकार के लिए यह झटका तब लगा, जब बहुप्रतीक्षित संशोधन विधेयक सदन में आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका और अंततः गिर गया। यह पिछले एक दशक से अधिक समय में पहली बार है जब सरकार को इस तरह की संवैधानिक प्रक्रिया में स्पष्ट हार का सामना करना पड़ा है।इसमें संसद की 543 सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान था। सदन में इस विधेयक पर लंबी बहस के बाद मतदान कराया गया। कुल 528 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया, जिसमें विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में 230 सांसदों ने मतदान किया। हालांकि संख्या के लिहाज से पक्ष में अधिक वोट थे, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इस हिसाब से विधेयक को पास होने के लिए कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी, जो सरकार जुटा नहीं सकी। बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी। 528 का दो तिहाई 352 होता है। इस तरह बिल 54 वोट से गिर गया।

परिणामस्वरूप यह विधेयक गिर गया। सरकार की ओर से इस विधेयक को महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया था। इसे सामाजिक और राजनीतिक रूप से ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा था। लेकिन विपक्ष ने इस विधेयक के कई प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए इसे जल्दबाजी में लाया गया कदम बताया। कई विपक्षी दलों का कहना था कि इसमें पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान नहीं किए गए हैं, जिससे यह विधेयक अधूरा प्रतीत होता है। बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। सत्ता पक्ष के नेताओं ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक लाभ के लिए लाया गया कदम करार दिया। कुछ सांसदों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने पर्याप्त संवाद और सहमति बनाने की कोशिश नहीं की। यह परिणाम आने वाले समय में संसद की कार्यप्रणाली और सरकार की रणनीति पर असर डाल सकता है। खासकर ऐसे समय में जब सरकार को अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों को भी पारित कराना है, यह हार उसके लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर सकती है।

विपक्ष एकजुटता बनी मोदी सरकार की हार की वजह

महिला आरक्षण संशोधन विधेयक में सबसे अहम भूमिका विपक्ष की एकजुटता ने निभाई। कई ऐसे दल, जो सामान्य परिस्थितियों में अलग-अलग रुख अपनाते हैं, इस मुद्दे पर एक साथ नजर आए। विपक्ष ने रणनीतिक तरीके से मतदान में हिस्सा लिया और सरकार को आवश्यक संख्या जुटाने से रोक दिया। विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे चाहते हैं कि यह विधेयक अधिक समावेशी और व्यापक हो। उनका तर्क है कि जब तक इसमें सभी वर्गों की महिलाओं के लिए संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक इसका मौजूदा स्वरूप स्वीकार्य नहीं हो सकता। दूसरी ओर, सरकार ने इस हार को अस्थायी बताया है और संकेत दिए हैं कि वह भविष्य में इस विधेयक को नए सिरे से पेश कर सकती है। सरकार के कुछ मंत्रियों का कहना है कि वे विपक्ष से बातचीत कर सहमति बनाने की कोशिश करेंगे ताकि अगली बार यह विधेयक पारित हो सके। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और अधिक बहस और बयानबाजी देखने को मिल सकती है। 

महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सहमति न बन पाना यह दर्शाता है कि देश की राजनीति में अभी भी कई मुद्दों पर गहरी विभाजन रेखाएं मौजूद हैं। फिलहाल, यह स्पष्ट है कि लोकसभा में यह विधेयक गिरने से केंद्र सरकार को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है, जबकि विपक्ष ने इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में पेश किया है। विपक्ष ने महिला आरक्षण संशोधन बिल का विरोध नहीं किया लेकिन इससे जुड़े दोनों बिल के खिलाफ था। विपक्ष ने परिसीमन बिल के विरोध के दो कारण बताए। पहला इससे दक्षिणी राज्यों की संसद में ताकत कम हो जाएगी। दूसरा यह ओबीसी और एसटी-एससी तबके के खिलाफ है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि हमने संविधान पर हुए हमले को हरा दिया है। हमने साफ कहा है कि यह महिला आरक्षण बिल नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीतिक संरचना को बदलने का एक तरीका है।

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