महंगे स्मार्टफोन से डिजिटल समावेशन पर पड़ रहा असर, जीएसटी और बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता

पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था ने डिजिटल सुधारों के दम पर तेज रफ्तार पकड़ी है। जन धन योजना, आधार और मोबाइल की ‘जैम’ त्रयी ने करोड़ों लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को मजबूत बनाया। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने डिजिटल भुगतान को आम लोगों तक पहुंचाया, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। कम मोबाइल डेटा लागत और व्यापक इंटरनेट पहुंच ने इस बदलाव को और गति दी। इन प्रयासों के बीच भारत ने मजबूत डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना तैयार की, जिसकी रीढ़ स्मार्टफोन बन चुके हैं। लेकिन हाल के महीनों में स्मार्टफोन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है। 2025 की चौथी तिमाही में स्मार्टफोन शिपमेंट सालाना आधार पर लगभग 7 फीसदी घट गई। कच्चे माल की बढ़ती कीमत, रुपये का अवमूल्यन और 18 फीसदी जीएसटी ने खासकर सस्ते स्मार्टफोन को महंगा कर दिया है। मेमरी लागत में भारी उछाल भी कीमतों को ऊपर ले जा रहा है। वैश्विक डीआरएएम कीमतों में पहली तिमाही में 50 फीसदी से अधिक वृद्धि हुई, जबकि एनएएनडी फ्लैश की कीमतें 80-90 फीसदी तक बढ़ीं। इससे सस्ते स्मार्टफोन की उत्पादन लागत में एक ही तिमाही में करीब 25 फीसदी का इजाफा हुआ।

रुपये के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने से आयातित कंपोनेंट महंगे हुए हैं। इन सभी कारकों के चलते 10,000 रुपये से कम कीमत वाले स्मार्टफोन 25 से 35 फीसदी तक महंगे हो गए हैं। भारत में हर साल बड़ी संख्या में 20,000 रुपये से कम श्रेणी के फोन बनाए जाते हैं और मांग में गिरावट से उत्पादन पर भी असर पड़ने लगा है। इससे डिजिटल अर्थव्यवस्था की पहुंच पर भी प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि ग्रामीण और छोटे शहरों के उपयोगकर्ता इसी श्रेणी के स्मार्टफोन पर निर्भर रहते हैं। स्मार्टफोन अब केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण उपकरण बन चुका है। किसान मंडी भाव देखने, मजदूर मजदूरी प्राप्त करने, छात्र ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंचने और छोटे व्यापारी डिजिटल भुगतान के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों तथा ग्रामीण भारत में नए स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं का बड़ा हिस्सा इसी श्रेणी से आता है। स्वरोजगार करने वाले कामगार और किसान भी किफायती स्मार्टफोन पर निर्भर हैं।

जीएसटी संरचना और नीतिगत कदमों पर बढ़ी बहस

स्मार्टफोन पर 18 फीसदी जीएसटी को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दर प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है और इससे किफायती स्मार्टफोन की कीमतें बढ़ रही हैं। यदि पहली बार उपयोगकर्ता डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ते हैं तो यूपीआई लेनदेन, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं में खर्च बढ़ता है, जिससे कर राजस्व भी बढ़ता है। इसलिए कर दर में कमी से दीर्घकालिक राजस्व पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। उधर सरकार ने उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना लागू की है, जिससे भारत दुनिया का बड़ा स्मार्टफोन निर्माता बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2025 में स्मार्टफोन उत्पादन 5.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया और निर्यात 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा। हालांकि मांग कमजोर होने पर घरेलू विनिर्माण पर भी असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि 20,000 रुपये से कम कीमत वाले स्मार्टफोन पर जीएसटी दर घटाकर 5 फीसदी की जाए और घरेलू निर्माताओं के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) रिफंड व्यवस्था को तेज किया जाए। इससे कीमतों में राहत मिल सकती है और उद्योग को नुकसान भी नहीं होगा। 

इसके अलावा किफायती स्मार्टफोन श्रेणी में पीएलआई समर्थन बढ़ाने और डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देने के लिए उपभोक्ता सब्सिडी जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। नीतिगत स्तर पर यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि डिजिटल भारत निधि के माध्यम से किफायती स्मार्टफोन पर लक्षित सहायता दी जाए। इससे नई आबादी डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्मार्टफोन की कीमतों को नियंत्रित किया जाता है तो डिजिटल भुगतान, ई-लर्निंग, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार तेज हो सकता है। कुल मिलाकर स्मार्टफोन अब डिजिटल भारत की बुनियादी जरूरत बन चुके हैं। कीमतों में बढ़ोतरी से डिजिटल समावेशन की गति धीमी पड़ने का खतरा है। ऐसे में कर ढांचे में बदलाव, उत्पादन प्रोत्साहन और लक्षित समर्थन जैसे कदम डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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