आप के सांसदों के पाला बदलने पर केजरीवाल ने बताया ‘पंजाब के साथ धोखा’, मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा
आम आदमी पार्टी में सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह कदम पंजाब और पंजाबियों के साथ बड़ा धोखा है।केजरीवाल ने अपने संदेश में आरोप लगाया कि यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया गया है और इसका उद्देश्य पंजाब की राजनीति को प्रभावित करना है। उन्होंने साफ कहा कि जनता ऐसे कदम उठाने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। पार्टी की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि पंजाब के जनादेश के साथ विश्वासघात है। उन्होंने कहा कि जनता इसका जवाब समय आने पर जरूर देगी।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का समय मांगा है। मुख्यमंत्री मान सभी विधायकों के साथ दिल्ली जाकर राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात में पार्टी बदलने वाले सांसदों के खिलाफ ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग उठाई जाएगी। मुख्यमंत्री मान इस मुद्दे पर विस्तार से अपना पक्ष रखेंगे और संवैधानिक कार्रवाई की मांग करेंगे। दूसरी ओर, पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी उपराष्ट्रपति से मिलने की तैयारी में हैं। वह उन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग करेंगे, जिन्होंने पार्टी छोड़ी है। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं का दावा है कि सभी सात सांसदों ने अभी आधिकारिक रूप से पक्ष नहीं बदला है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और संजय सिंह ने कहा कि फिलहाल केवल तीन सांसद ही भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि बाकी चार अब भी आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी इसे विश्वासघात बता रही है, वहीं दूसरी ओर आगे की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के संकेत भी साफ नजर आ रहे हैं।
अंदरूनी नाराजगी, अनदेखी और टकराव ने बढ़ाई दूरी
आम आदमी पार्टी में हाल ही में हुए बड़े सियासी घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर असंतोष लंबे समय से पनप रहा था। अचानक सात राज्यसभा सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना कोई एक दिन का फैसला नहीं, बल्कि कई महीनों से चल रही नाराजगी, अनदेखी और नेतृत्व से टकराव का नतीजा है। पार्टी के भीतर संवाद की कमी, जिम्मेदारियों में बदलाव और व्यक्तिगत मतभेद धीरे-धीरे इतने गहरे हो गए कि आखिरकार यह बगावत के रूप में सामने आया। आप की तेजी से बढ़ती राजनीति के बीच संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया था। कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि उनकी भूमिका सीमित कर दी गई है और निर्णय प्रक्रिया में उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। यही कारण है कि अलग-अलग कारणों से नाराज चल रहे नेताओं ने एक साथ बड़ा कदम उठा लिया। राघव चड्ढा- राघव चड्ढा की नाराजगी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ रिश्तों में आई खटास से जुड़ी बताई जा रही है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय उनकी चुप्पी और विदेश में रहने को लेकर पहले ही सवाल उठे थे।
इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटा दिया और उन्हें बोलने का समय भी कम मिलने लगा। पार्टी के भीतर उनके खिलाफ माहौल बनने से वे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे, जिसने उनके फैसले को प्रभावित किया। संदीप पाठक- डॉ. संदीप पाठक लंबे समय तक पार्टी की रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाते रहे। पंजाब, गोवा और गुजरात में संगठन को मजबूत करने में उनका बड़ा योगदान रहा। लेकिन हाल के समय में उन्हें प्रमुख बैठकों और फैसलों से दूर रखा जाने लगा। पंजाब की जिम्मेदारी उनसे लेकर दूसरे नेता को सौंपना भी उनकी नाराजगी की बड़ी वजह बना। स्वाति मालीवाल- स्वाति मालीवाल का विवाद सीधे शीर्ष नेतृत्व से जुड़ा रहा। उन्होंने वैभव कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। इसके बाद से उनका पार्टी से मोहभंग बढ़ता गया और वे सार्वजनिक रूप से भी विरोध जताने लगीं। अशोक मित्तल- अशोक मित्तल को राज्यसभा में अहम जिम्मेदारी मिलने के बावजूद, जब उनके ठिकानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई हुई तो पार्टी का समर्थन न मिलना उनके लिए बड़ा झटका साबित हुआ।
इस दौरान खुद को अकेला महसूस करने की वजह से उन्होंने दूरी बना ली। हरभजन सिंह- हरभजन सिंह को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बाद भी पार्टी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं मिली। उन्हें निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया, जिससे वे लगातार अलग-थलग महसूस करते रहे। राजिंदर गुप्ता- राजिंदर गुप्ता, जो उद्योग जगत से जुड़े बड़े नाम हैं, पार्टी में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सके। राज्यसभा सदस्य बनने के बावजूद उन्हें संगठनात्मक स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारी नहीं दी गई, जिससे उनकी दूरी बढ़ती गई। विक्रमजीत सिंह साहनी- विक्रमजीत सिंह साहनी भी लंबे समय से पार्टी में सक्रिय थे, लेकिन उन्हें भी पार्टी फोरम में अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यही कारण रहा कि उन्होंने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया। कुल मिलाकर, इन सभी नेताओं के अलग-अलग कारण जरूर रहे, लेकिन एक बात समान रही, पार्टी के भीतर संवाद की कमी और नेतृत्व से बढ़ती दूरी। यही कारण है कि यह सामूहिक इस्तीफा आप के लिए अब तक का सबसे बड़ा सियासी झटका बन गया है।

